पीएम मोदी ने 3 अक्टूबर 2020 को सभी मौसम में खुली रहने वाली तथा सामरिक रूप से महत्वपूर्ण दुनिया की सबसे लंबी हाईवे सुरंग अटल सुरंग का उद्घाटन हिमाचल प्रदेश के रोहतांग में किया। इस अटल सुरंग के खुल जाने की वजह से मनाली और लेह के बीच की दूरी 46 किलोमीटर कम हो गई।

9.02 लंबी सुरंग मनाली से लाहौल-स्पिति वैली को जोड़ेगा
9.02 लंबी अटल सुरंग दुनिया में सबसे लंबी राजमार्ग सुरंग है, जो मनाली को सालभर लाहौल स्पीति घाटी से जोड़े रखेगी। पहले ये घाटी छह महीने तक भारी बर्फबारी के कारण देश के बाकी हिस्से से कटी रहती थी। इस सुरंग को हिमालय के पीर पंजाल की पर्वत श्रृंखलाओं के बीच अत्याधुनिक विशिष्टताओं के साथ समुद्र तल से करीब 3 हजार मीटर की ऊंचाई पर बनाया गया है। अटल सुरंग का दक्षिणी पोर्टल मनाली से 25 किलोमीटर की दूरी पर 3060 मीटर की ऊंचाई पर बना है, जबकि उत्तरी पोर्टल 3071 मीटर की ऊंचाई पर लाहौल घाटी में तेलिंग, सीसू गांव के नजदीक स्थित है। घोड़े की नाल के आकार वाली दो लेन वाली इस सुरंग में 8 मीटर चौड़ी सड़क है, तथा इसकी ऊंचाई 5.525 मीटर है।
सुरंग में निगरानी के व्यापक इंतजाम की है सुविधा
मोदी सरकार ने दिसंबर 2019 में पूर्व प्रधानमंत्री के सम्मान में सुरंग का नाम अटल सुरंग रखने का निर्णय किया था। इस सुरंग से हर रोज 3000 कार और 1500 ट्रक 80 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आ जा सकेंगे। सुरंग में अग्नि शमन, रोशनी और निगरानी के व्यापक इंतजाम किये गए हैं। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने रोहतांग दर्रे के नीचे सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इस सुरंग का निर्माण कराने का निर्णय किया था, तथा सुरंग के दक्षिणी पोर्टल पर 26 मई 2002 को इस संपर्क मार्ग की आधारशिला रखी गई थी।
3 जून 2000 में लिया गया था अटल सुरंग बनाने का निर्णय
रोहतांग दर्रे के नीचे यह ऐतिहासिक सुरंग बनाने का निर्णय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में तीन जून 2000 में लिया गया था। इसकी आधारशिला 26 मई 2002 को रखी गयी और इसके बाद से सीमा सड़क संगठन सभी प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद इसे पूरा करने में जुटा था। सेरी नाला फाल्ट जोन में 587 मीटर क्षेत्र में सुरंग बनाने का काम सबसे चुनौतीपूर्ण था और इसे 15 अक्टूबर 2017 को पूरा किया गया।

पीएम मोदी ने 2014 में लिया था जायजा
प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने 2014 में निमार्ण स्थल का दौरा कर निमार्ण कार्य का जायजा लिया था। पिछले 24 दिसम्बर को पीएम मोदी की अध्यक्षता में केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने वाजपेयी के इसमें योगदान के लिए इस सुरंग का नाम रोहतांग सुरंग के बजाय अटल सुरंग रखने को मंजूरी दी। सुरंग का 40 प्रतिशत कार्य पिछले दो सालों में पूरा किया गया है और इसके निमार्ण पर 3200 करोड़ रूपये की लागत आई है। इस सुरंग के दोनों द्वारों पर बैरियर लगे हैं। आपात स्थिति में बातचीत के लिए हर 150 मीटर पर टेलीफोन और हर 60 मीटर पर अग्निशमन यंत्र लगे हैं। घटनाओं का स्वत पता लगाने के लिए हर ढाई सौ मीटर पर सीसीटीवी कैमरा और हर एक किलोमीटर पर वायु गुणवत्ता निगरानी प्रणाली लगी है। हर 25 मीटर पर आपात निकास के संकेत है तथा पूरी सुरंग में ब्रोडकास्टिंग सिस्टम लगाया गया है। सुरंग में हर 60 मीटर की दूरी पर कैमरे भी लगाए गए हैं।
ऑस्ट्रेलियाई कंपनी ने किया दावा
सामरिक महत्व की दृष्टि से अटल सुरंग रोहतांग को बनाने का विचार करीब 140 साल पुराना है। सुरंग का डिजाइन तैयार करने वाली ऑस्ट्रेलियाई कंपनी स्नोई माउंटेन इंजीनियरिंग ने अपनी वेबसाइट में दावा किया है कि रोहतांग दर्रे पर सुरंग बनाने का पहला विचार 1860 में मोरावियन मिशन ने रखा था। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल में भी रोहतांग दर्रे पर रोप-वे बनाने का प्रस्ताव आया था। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार में मनाली-लेह के बीच साल भर कनेक्टिविटी को सड़क निर्माण की परियोजना बनी। इसे मूर्त रूप पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मिला। वर्ष 2019 में वाजपेयी के नाम पर ही इस सुरंग का नाम अटल सुरंग रखा गया।
इंजीनियरिंग के इतिहास में कई कीर्तिमान रचे
इस टनल का निर्माण कर रही कंपनी एफकॉन के हाइड्रो एंड अंडरग्राउंड कारोबार के निदेशक सतीश परेटकर ने कहा कि घोड़े के नाल के आकार की इस सुरंग ने देश के इंजीनियरिंग के इतिहास में कई कीर्तिमान रचे हैं। परेटकर ने कहा कि ये पहली ऐसी सुरंग है, जिसमें रोवा फ्लायर टेक्नालॉजी का उपयोग किया गया है। ये तकनीक विपरीत स्थिति में इंजीनियरों को काम करने में सक्षम बनाती है। सुरंग बनने में हुई देरी की मुख्य वजह 410 मीटर लंबा सेरी नाला है। यह नाला हर सेकेंड 125 लीटर से अधिक पानी निकालता है। सेरी नाला क्षेत्र में ही सुरंग का दक्षिणी द्वार पड़ता है। परिस्थितियों के चलते इंजीनियरों को इस क्षेत्र में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। इसकी वजह से बार-बार सुरंग का दरवाजा बंद हो जाता था।
इंजीनियरों और मजदूरों ने दस साल की कड़ी मेहनत
सीमा सड़क संगठन ने वर्ष 2009 में शापूरजी पोलोनजी समूह की कंपनी एफकॉन और ऑस्ट्रेलिया की कंपनी स्टारबैग के संयुक्त उपक्रम को इस टनल के निर्माण का ठेका दिया, इसके निर्माण कार्य में एक दशक से अधिक वक्त लगा। एफकॉन ने इस सुरंग के निर्माण में करीब 150 इंजीनियरों और 1000 श्रमिकों को लगाया था।






