मोसाद: “द किलिंग मशीन”

घटना 05 सितंबर,1972 के म्यूनिख (जर्मनी) के ओलंपिक गाँव की है। फिलीस्तीन के आतंकी समूह “ब्लैक सेप्टैंबर” के आठ आतंकी ट्रैक सूट पहने खिलाड़ियों के रंगढंग में ओलंपिक गाँव की ऊँची दीवार को फांदकर अंदर प्रवेश करते हैं। ये वाक्या सुबह तीन से चार बजे के बीच का है। कुछ अमेरिकी एथलीटों ने जो शराब के नशे में चूर थे,उन लोगों को अपने जैसा खिलाड़ी समझकर दीवार फानने में मदद करते हैं। अंदर आते ही आतंकी तेज चलते हुए इजरायली खिलाड़ियों की बिल्डिंग तक पहुंच जाते हैं,जहाँ खिलाड़ी गहरी नींद में सो रहे थे। सभी आंतकियों के बैग में आधुनिक हथियार थे, जो आपरेशन को कामयाब बनाने के लिए दिये गए थे।
इजरायली कुश्ती के रेफरी और मेंटोर योसेफ गतफ्रायंद की नींद खटपट से खुल जाती है, और वो ये देखते हैं, कि एक बंदूक की नाल दरवाजे के अंदर झांक रही है। उनकी छठी इंद्रियां उन्हें ये सचेत कर रही थी कि कुछ गड़बड़ होने वाला है। वो दौड़कर दरवाजे को पकड़कर खडे हो जाते हैं, और अपने एथलीटों से कहते हैं कि लडकों बचों। कुछ एथलीट खिडक़ी तोड़कर भाग निकलते हैं, मगर उनमें से एक को आतंकी दौड़ाकर गोली मार देता है और दूसरे को पकड़कर उसकी बिल्डिंग में ले आते हैं। इसी बीच बलपूर्वक दरवाजा तोड़कर योसेफ गतफ्रायंद को गोली मार दी जाती है। थोडे ही देर में सभी इजरायली खिलाड़ी ब्लैक सेप्टैंबर के आतंकियों के कब्जे में होते हैं।
ओलंपिक गाँव में गोली चलने से हड़कंप मच जाता है। आतंकी जर्मन अधिकारियों के समक्ष विभिन्न इजरायली जेलों में बंद 234 फिलीस्तीनियों की रिहाई की मांग करते हैं। जर्मनी के चासंलर विली ब्रांट इजरायली प्रधानमंत्री गोल्डा मईर से इस बाबत बात करतें हैं, मगर वो आतंकियों की मांग को मानने से मना कर देती हैं। गोल्डा मेयर जर्मनी के चांसलर से ये आग्रह करती हैं कि उनके कुछ खास कमांडो को खेलगांव भेजने दिया जाए, मगर जर्मनी के चांसलर इस बात से इंकार कर देते हैं।
जर्मनी के अधिकारियों से दूसरे दौर की वार्ता में आतंकी ये शर्त रखते हैं, कि उन्हें वहाँ से सुरक्षित निकलने दिया जाए। आतंकियों की ये शर्त जर्मनी के अधिकारी मान लेते हैं। रिहाई की बात मानने के बाद जर्मनी सरकार ये तय करती है कि आंतकियों को सैनिक कार्रवाई में मार गिराना है।आपरेशन तय हो जाता है, इजरायल को भी इसकी सूचना दे दी जाती है। इजराइल की प्रधानमंत्री गोल्डा मईर मोसाद चीफ ज्वी जमीर को तुरंत जर्मनी भेजती हैं। मोसाद के चीफ को आपरेशन केवल दूर से देखना था, वे कुछ कर नहीं सकते थे।
रात को ठीक दस बजकर बीस मिनट पर खेलगाँव के पास के हैलीपैड से दो हेलिकॉपटरों ने उड़ान भरी। इससे पहले एक बस में नौ बंधकों और आठ चरमपंथियों को हैलिपैड पर उतारा गया। दोनों हैलीकॉप्टर के लैंड करते ही जर्मनी के अप्रशिक्षित सैनिकों का अभियान शुरू हो जाता है। जर्मनी के स्नाइपरों ने अंधाधुंध फायरिंग करनी शुरू कर दी। ये स्नाइपर लक्ष्यहीन फायरिंग कर रहे थे, शायद उन्हें इस तरह के आपरेशनों की मुक्कमल ट्रेनिंग नहीं मिली थी।
अपने को चारों तरफ से घिरा देखकर चरमपंथी हेलिकॉप्टर में बैठे सभी इजरायली खिलाड़ियों को मार देते हैं। थोड़े संघर्ष के बाद सारे आतंकी भी मारे गए। इस आपरेशन में जर्मनी की सेना का एक अधिकारी भी मारा गया।
इस नरसंहार से इजरायल में काफी रोष था और वहाँ की सेना ने 48 घंटे के अंदर सीरिया और लेबनान में मौजूद फलिस्तीन लिबरेशन आँर्गेनाइजेशन के दस ठिकानों पर भारी बमबारी की और 200 आतंकियों और आम नागरिकों को मौत की घाट उतार दिया। लेकिन इतना काफी नहीं था वे म्यूनिख नरसंहार के जुड़े उन सभी चरमपंथियों का सफाया चाहते थे, जिन्होंने निर्दोष खिलाड़ियों की हत्या की थी। प्रधानमंत्री गोल्डा मईर ने मोसाद के चीफ को बुलाकर इस हत्या का बदला लेने को कहा। इस आपरेशन का नाम रखा गया “रैथ आफ गॉड”।
फिर शुरू हुई मोसाद के तेज तर्रार एजेंटों की भर्ती। उन्हें साफ कह दिया गया कि सालों तक परिवार से दूर रहना होगा और पकड़े जाने पर इजरायल उन्हें पहचानने से इंकार कर देगा। मोसाद के वरिष्ठ अधिकारियों ने कडी मशक्कत के बाद एक लिस्ट तैयार की, इस लिस्ट में उन चरमपंथियों का नाम था जिसका संबंध “म्यूनिख नरसंहार” से था।
आपरेशन “रैथ ऑफ गॉड” का शुभारंभ मोसाद के ऐजेंटों ने वेल ज्वेटर और महमूद हमशारी के कत्ल से की। इन्हें मारने से पहले इनके पास फूलों के गुलदस्ते भेजे गए थे। बुके में लगे कागज में लिखा था, कि हम अपने दुश्मनों को न भूलते हैं और न ही माफ करते हैं। मोसाद का दूसरा टारगेट फलीस्तीनी आतंकियों को हथियार मुहैया कराने वाले बेरूत के प्रोफेसर वासिल अल कुबैसी थे। प्रोफेसर साहब को मोसाद के दो ऐजेंटों ने करीब से 12 गोलियां मारी। अंजाम तय था प्रोफेसर साहब तुरंत अल्ला मियां को प्यारे हो गए। मोसाद की इन ताबड़तोड़ हत्याओं से चरमपंथियों में दहशत फैल गयी थी। वे कड़ी सुरक्षा में रहने लगे थे, मगर अब मौत की बारी उन तीन आतंकियों की थी जो लेबनान में भारी सुरक्षा के बीच रह रहे थे, और अभी तक के हत्याओं के तरीकों से उन तक पहुंचना नामुमकिन था। उन्हें मारने के लिए एक विशेष आपरेशन शुरू किया गया जिसका नाम “स्प्रिंग ऑफ यूथ” था। ये विशेष आपरेशन “रेथ ऑफ गॉड” का ही हिस्सा था। 09 अप्रैल,1973 को इजरायल के कुछ कमांडो लेबनान के समुद्री किनारे पर स्पीड बोट के जरिए पहुँचे। इन कमांडोज को मोसाद एजेंट्स ने कार से टारगेट के करीब पहुँचाया। कमांडो आम पोशाक में थे। इस आपरेशन के दौरान दो पुलिस अफसर और एक इटैलियन नागरिक भी मारे गये। इजरायल का भी एक कमांडो घायल हो गया। आपरेशन कामयाब रहा और तीनों आंतकी मौके पर ही ढेर हो गए।
इस कामयाब आपरेशन के तुरंत बाद साइप्रस निवासी जाइद मुचासी को एथेंस के एक होटल में बम से उडा दिया गया। मोसाद के एजेंट्स दूनिया भर में घूम घूमकर म्यूनिख कत्ल-ए-आम के गुनाहगारों को मौत बाँट रहे थे।
28 जून 1973 को ब्लैक सैपटेंबर से जुड़े मोहम्मद बउदिया को उसकी कार की सीट में बम लगाकर उडा दिया गया। 15 दिसंबर,1979 को दो फलीस्तीनी अली सलेम अहमद और इब्राहिम अब्दुल अजीज की साइप्रस में हत्या कर दी गई। 17 जून,1982 को पीएलओ के दो वरिष्ठ सदस्यों को इटली में अलग अलग हमलों में मार दिया गया। 23 जुलाई,1982 को पेरिस में पीएलओ के दफ्तर में उप-निदेशक फदल वानी को कार बम से उडा दिया गया।
21 अगस्त,1983 को पीएलओ का सदस्य ममून मोराइश एथेंस में मार दिया गया। 10 जून,1886 को ग्रीस की राजधानी एथेंस में पीएलओ के डीएफएलपी गुट का महासचिव खालिद अहमद नजल मारा गया। 21अक्टूबर,1986 को पीएलओ के सदस्य मंजूर अबु गजाला को कार बम विस्फोट से उडा दिया गया। म्यूनिख कत्ल-ए-आम का मास्टर माइंड था, अली हसन सलामेह। उसने ही इजरायली एथलीटों को बंधक बनाने का ब्लूप्रिंट तैयार किया था। उसके पीछे मोसाद के एजेंट खोजी कुत्तों की तरह लगे थे। वह दो हमलों में बाल बाल बच चुका था। 22 जनवरी,1979 को उसे उसकी कार में बम लगाकर उडा दिया गया। म्यूनिख नरसंहार का मास्टरमाइंड मारा गया मगर ये आपरेशन यहाँ रूका नहीं, बल्कि बीस सालों तक जारी रहा जब तक एक एक चरमपंथियों को खोजकर मारा नहीं गया।
मोसाद का दूसरा सबसे बड़ा और सफल “आपरेशन थंडरबोल्ट” था, जिसे युगांडा में अंजाम दिया गया था। हुआ यूँ कि 27 जून 1976 को इजरायल की राजधानी तेलअबीब के बेनुगुरियन इंटरनेशनल एयरपोर्ट से रात 12 बजे फ्रांस की एयरबस ए 300 वी 4-203 ने ग्रीस की राजधानी एथेंस के लिए उडान भरी। इस फ्लाइट में 246 यात्रियों के अलावा क्रू के 12 सदस्य सवार थे। डेढ घंटे की यात्रा के बाद यह फ्लाइट एथेंस पहुँची, जहाँ से इस प्लेन में 58 यात्रियों के साथ चार आतंकवादी भी सवार हो गए। इनमें से दो फलीस्तीनी लिबरेशन आर्मी से जुड़े थे, जबकि दो जर्मनी के रेवोल्यूशनरी ब्रिगेड से संबंधित थे। एथेंस से इस फ्लाइट ने जैसे हीं फ्रांस की राजधानी पेरिस के लिए उड़ान भरी, इन आतंकियों ने प्लेन को हाईजैक कर लिया। जहाज को लीबिया के शहर बेनगाजी ले जाया गया जहाँ प्लेन में ईंधन भरा गया। सात घंटे वहाँ रहने के बाद ये विमान युगांडा को उड़ चला। इजरायल से दुश्मनी के बावजूद अधिकांश मुस्लिम देशों ने  अपने देश में विमान के लैंडिंग से मना कर दिया।
28 जून को दोपहर तीन बजे अपहृत विमान युगांडा के एंतेबे हवाई अड्डा पर लैंड किया। युगांडा के तानाशाह ईदी अमीन ने अपहरणकर्ताओं को वो सारी सुविधाओं को उपलब्ध करा दिया, जिसकी मांग वे कर रहे थे। अपहृत यात्रियों पर निगरानी रखने के लिए कुछ सशस्त्र जवानों को लगा दिया गया। यात्रियों को पास के एक टर्मिनल में रखा गया जिसकी निगरानी युगांडा आर्मी के जवान कर रहे थे।
विमान अपहरण की सूचना जब इजरायल को लगी तो वहाँ हडकंप मच गया। सरकार और मोसाद के बीच कई दौर की मीटिंग हुई। निष्कर्ष ये निकाला गया कि पहले अपहरणकर्ताओं की मांग को सुना जाय फिर कोई प्रतिक्रिया दी जाय। आतंकियों ने ये मांग रखी कि इजरायल के विभिन्न जेलों में बंद सभी कैदियों की रिहाई सुनिश्चित हो। इतना हीं नहीं ये आतंकी पाँच मिलियन डाँलर की भी मांग कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने इजरायल को 48 घंटे का मोहलत दी। सरकार के नुमाइंदे अपहरणकर्ताओं से बात कर रहे थे, उधर मोसाद अपने आपरेशन में जुटा था। सारी जानकारी इकठ्ठा कर ली गई। युगांडा का एंतेबे एयरपोर्ट इजरायल की ही एक कंपनी ने बनाया था। उससे सारे नक्शे ले लिये गए। सारी तैयारी पूरी करने के बाद 03 जुलाई को इजरायली कैबिनेट ने आपरेशन थंडरबोल्ट को मंजूरी दे दी। 03 जुलाई को ही इजरायल से 100 कमांडो की टीम ने सी-130 सुपर हरकुलिस विमानों से युगांडा के एंतेबे के लिए उड़ान भरी। इन विमानों में उन्होंने काली मर्सिडीज कारों के एक दस्ते को भी लोड कर लिया था।उस समय तानाशाह ईदी अमीन काली मर्सिडीज से ही चलता था। युगांडा के सेना को भ्रम में डालने के लिए मोसाद ने ऐसा प्लान बनाया था। इन विमानों के साथ दो बोइंग 707 विमान भी थे, जिसमें से एक में मेडिकल टीम थी जबकि दूसरे में यात्रियों को वापस लाया जाना था।
रात के अंधेरे में जब इजरायल का विमान एंतेबे हवाई अड्डे पर उतरा। उतरते ही काले मर्सिडीज कारों का काफिला टर्मिनल बिल्डिंग की ओर बढ चला। कमांडो तुरंत कार्रवाई करना चाहते थे जो जरूरी भी था। योजना में थोडी चूक इस वजह से हो गई कि उस समय ईदी अमीन युगांडा में नहीं थे। सैनिकों को शक होने पर उन्होंने मर्सिडीज को रोकने की नाकाम कोशिश की, मोसाद के कमांडो ने उन्हें वहीं ढेर कर दिया। इस त्वरित कार्रवाई में सभी सात अपहरणकर्ता और पचास जवान मारे गए। इजरायली कमांडो ने एयरपोर्ट पर खडे सभी फायटर प्लेन को बम से उडा दिया। इस कार्रवाई में इजरायली यूनिट के कमांडर योनाथन नेतन्याहू की गोली लगने से मौत हो गई। योनाथन नेतन्याहू वर्तमान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सगे भाई थे।
इजरायल अपने सभी नागरिकों को सकुशल अपने देश ले आया था। संपूर्ण विश्व में इजरायल के इस कमांडो कार्रवाई की खूब प्रशंसा हुई। लोगों ने जान लिया था कि मोसाद से बचना लगभग असंभव है।
मोसाद के सभी आपरेशन सफल हो गए हों, ऐसा नहीं है। 1997 में मोसाद का एक आपरेशन जार्डन में फेल भी हुआ था। हुआ यूं कि मोसाद को सूचना मिली कि हमास का लीडर खालिद मशाल जार्डन आया हुआ है। मोसाद के दो एजेंट कनाडियन टूरिस्ट बनकर खालिद मशाल की हत्या करने जार्डन आए। मोसाद के एजेंट एक ऐसा जहर लेकर आए थे जो स्किन से होकर शरीर के अंदर दाखिल हो जाता था। खालिद मशाल के अंगरक्षकों ने हमला करते समय उन एजेंटों को पकड़ लिया। पूछताछ में पता चला कि चार और एजेंट जार्डन के इजरायली दूतावास में छिपे हुए हैं।
जार्डन के किंग ने इस बात पे जबरदस्त ऐतराज जताया तब इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को जार्डन आना पडा और उन्होंने ये माना कि इस कार्रवाई को मोसाद कर था, और उन्हें इसकी जानकारी थी। पहले तो जार्डन के किंग ने नेतन्याहू से मिलने से मना कर दिया फिर काफी मान मनौव्वल के बाद दोनों की बातचीत हुई। थोडे दिनों तक मोसाद खामोश रहा मगर फिर उसने विभिन्न देशों में आपरेशन शुरू कर दिया था।
मोसाद का एक और आपरेशन जो बेहद चर्चा में रहा वो ये था, कि मोसाद के एजेंट ने ईरान में घुसकर ईरान के एटमी प्रोग्राम से जुडे करीब पाँच क्विंटल दस्तावेज चुरा लिये थे। ये आपरेशन केवल छह घंटों में पूरा कर लिया गया। इन्हीं दस्तावेज के आधार पर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान पर परमाणु समझौते का उल्लंघन के आरोप लगाए थे। अमेरिकी अखबार “न्यूयॉर्क टाइम्स” ने इस आपरेशन पर एक विस्तृत रिपोर्ट को भी प्रकाशित किया था।
इजरायली खुफिया एजेंसी के बहुत से कारनामे हैं, जिसने समय समय पर सुर्खियां बटोरी हैं।
आपको बता दें मोसाद की स्थापना 13 दिसंबर 1949 को  एक केन्द्रीय संस्थान के रूप में की गई थी। इसका मकसद खुफिया संग्रह, गुप्त आपरेशन और आतंकवाद से मुकाबला करना था। मार्च 1951 में इसे पुनर्गठित किया गया, और प्रधानमंत्री कार्यालय का एक हिस्सा बनाया गया। आपको अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल किलंटन और उनकी सहयोगी मोनिका लेवेनेस्की सेक्स कांड तो याद ही होगा। उस केस में मोसाद अमेरिका के राष्ट्रपति को ब्लैकमेल कर रहा था। इससे आप उसकी ताकत और पहुंच के बारे में अच्छी तरह से समझ सकते हैं।

अजय श्रीवास्तव

संपादक 

दैनिक परिधि समाचार पत्र

विशिखा मीडिया

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