34 साल बाद मिला “इंसाफ”

31 अक्टूबर 1984 को देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा ही कर दी जाती है। उसी रात से “मानवता के खिलाफ अपराध राजनीतिक संरक्षण में सुनियोजित तरीके से शुरू हो जाता है। जिसे बाद में सिख नरसंहार का नाम दिया गया। 02 नवंबर 1984 को दक्षिण पश्चिम दिल्ली की पालम कालोनी में उन्मादी भीड़ एक सिख परिवार के घर में घुसकर परिवार के पाँच लोगों की निर्ममता पूर्वक हत्या कर देती है। उसके बाद भीड़ नारे लगाती हुई राज नगर पार्ट-2 के एक गुरूद्वारे में आग लगा देती है। उग्र भीड़ पूरी तरह बेकाबू थी, रास्ते में जो भी सिख मिला या उनके घर मिले इनके निशाने पर आ गए।

गैर सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश भर में करीब दस हजार सिखों का कत्ल किया गया जिसमें 2500 से ज्यादा सिख तो देश की राजधानी दिल्ली में ही मारे गए थे। दिल्ली के लाजपत नगर, जंगपुरा, डिफेंस कालोनी, फ्रेंड्स कालोनी, महारानी बाग, पटेल नगर, सफदरजंग एनक्लेव, पंजाबी बाग आदि कालोनियों में हिंसा का तावंड़ रचा गया। सिखों की दूकानों, घरों को खूब लूटा गया और आग के हवाले कर दिया गया।

ये क्षणिक आवेश में ली गई घटना न होकर “सुनियोजित अपराध” था, जिसे बडे हीं साजिशपूर्ण तरीके से अंजाम दिया गया। कांग्रेस पार्षद अर्जुनदास के क्षेत्र में बडी संख्या में भीड़ जुटी, वहाँ सिखों के विरुद्ध भडकाऊ भाषण दिये गए। कांग्रेस नेता सज्जन कुमार ने बकायदा भाषण दिया और लोगों को हिंसा करने के लिए उकसाया।

सिख दंगों की प्रमुख शिकायतकर्ता और प्रत्यक्षदर्शी जगदीश कौर बतातीं हैं, कि घटना के कुछ हीं समय पहले एक भीड उनके घर पर आती है जिसका नेतृत्व सज्जन कुमार कर रहे होते हैं। वे कहतीं हैं कि मैंने सुना सज्जन कुमार भीड़ से कह रहे थे कि भटको नहीं तुम्हें जो कार्य दिया गया है उसे करो। कुछ हीं मिनटों बाद उन्मादी भीड़ उनके घरों में धावा बोलकर उनके पति और बच्चे को मार डालती है। एक और अहम गवाह जगशेर सिंह जिन्होंने सज्जन कुमार की पहचान की थी उन्होंने भी कहा कि मैंने सज्जन कुमार को भीड़ को उकसाते हुऐ देखा है।

इन सारी बातों को संज्ञान में लेते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के विद्वान जस्टिस एस मुरलीधर और विनोद गोयल की पीठ ने वर्ष 2013 में दिये गए निचली अदालत के फैसले को पलट दिया, जिसमें सज्जन कुमार को बरी किया गया था। पीठ ने कहा कि ये दंगे राजनीतिक संरक्षण का आनंद लेने वाले लोगों द्वारा मानवता के खिलाफ अपराध थे। सज्जन कुमार को ताउम्र जेल में बितानी होगी।

अदालत ने आगे कहा सज्जन कुमार को हत्या, आपराधिक साजिश, अपराध के लिए उकसाने, सिखों के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देने और सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देने और सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने वाले भाषण देने के जुर्म में दोषी पाया।

कोर्ट रूम में उस समय सभी भावुक हो गए जब जजों ने फैसला सुनाया, पीडि़तों के वरिष्ठ वकील एच.एस फुल्का समेत इस केस से संबंधित सभी वकील रो पड़े। अनूमन जज किसी फैसले पर भावुक नहीं होते मगर इस बार उनकी भी आँखें नम थीं, गले रूँधे थे, तब भी उन्होंने कहा “सत्य हमेशा जीतेगा और न्याय कायम रहेगा।”

विद्वान न्यायधीशों ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि ये दंगे “मानवता के खिलाफ अपराध” थे और कानून लागू करने वाली ऐजेंसियों की मदद से उन लोगों द्वारा किये गए जिन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था। उनकी चिंता को इस तरह समझा जा सकता है कि उन्होंने एक जगह कहा कि “यह एक असाधारण केस था, जहाँ सामान्य हालत में सज्जन कुमार के खिलाफ कार्रवाई करना असंभव हो रहा था, क्योंकि ऐसा लग रहा था, जैसे उनके खिलाफ केसों को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास किये जा रहे थे, और उन्हें रिकॉर्ड तक नहीं किया जा रहा था।”

कांग्रेस दंगाईयों को सजा दिलाने में कितनी संवेदनशील थी ये पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बयान से ही स्पष्ट था जिसमें उन्होंने कहा था कि जब भारी भरकम बरगद का पेड़ गिरता है तो धरती हिलती हीं है। कांग्रेस हमेशा दंगों के आरोपी सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर, एच.के.एल भगत, धर्मदास शास्त्री को बचाती रही।

आपको बता दें सिख दंगों के अपराधी सज्जन कुमार ने कांग्रेस की टिकट पर 1991 में लोकसभा का चुनाव लडा और जीता, 2004 में वो फिर सांसद बने। कांग्रेस उन्हें 2009 लोकसभा चुनाव में भी टिकट देना चाहती थी मगर मनमोहन सिंह के हस्तक्षेप से उनका टिकट कट गया।

कोई कुछ भी कहे लेकिन मैं मानता हूँ कि 1984 के सिख नरसंहार में कांग्रेस की पूर्ण मौन सहमति थी, जो हर जगह परिलक्षित होता है। सरकारी मिशनरी पूरी तरह दंगाइयों को बचाने में लगी रही, पुलिस ने कई जगह तो एफआईआर तक दर्ज नहीं किया, जहाँ दर्ज किये गए उसे कमजोर कर दिये गए। गवाहों को रोज डराया धमकाया जाता था। लोअर कोर्ट में केस को कमजोर करने की तमाम कोशिशें की गईं, जो भी जज इस मामले में सुनवाई तेज करता, उसका तबादला कर दिया जाता।

साल 2005 में जब इस केस को सीबीआई को सौंपा गया तब सीबीआई ने जगदीश कौर की शिकायत और न्यायमूर्ति जी.टी.नानावटी आयोग की सिफारिश पर दिल्ली कैंट मामले में सज्जन कुमार, कैप्टन भागमल, पूर्व विधायक महेंद्र यादव, गिरधारी लाल, कृष्ण खोखर और पूर्व पार्षद बलवंत खोखर के खिलाफ मामला दर्ज किया था, सीबीआई ने सभी आरोपियों के खिलाफ 13 जनवरी 2010 को आरोप पत्र दाखिल किया।

2014 में एसआईटी का गठन हुआ जिससे इस मामले में सुनवाई तेजी से होने लगी और आखिरकार सज्जन कुमार दोषी करार दे दिये गए। अभी आरोपियों के पास सुप्रीमकोर्ट जाने का रास्ता बचा है और वे जायेंगे भी, मगर सर्वोच्च न्यायालय, हाईकोर्ट के निर्णय को बेहद बारीकी से समझेगा और उम्मीद है कि वह हाईकोर्ट के निर्णय को बहाल कर दे।

जजों ने भीड द्वारा अपराध के विषय में ये भी कहा कि भीड़ द्वारा सिखों का नरसंहार पहला मामला नहीं और न हीं ये अंतिम है, इस पर लगाम लगाये जाने की जरूरत है। इस मामले में कांग्रेस पुरी तरह दोषी है तो गोहत्या के नाम पर भीड द्वारा हिंसा करने पर किसे दोष दें? क्या इसके लिए भाजपा और उससे जुडे तमाम संगठन जिम्मेदार नहीं? एक तरह से देखा जाए तो हालात एक जैसे हीं है एक में सिख मारे गए दूसरे में मुसलमान मारे जा रहें हैं। हिंसा रूकना चाहिए, भारत वंशियों का खून बेकारण नहीं बहना चाहिए। किसी भी धर्म समुदाय के लोगों की अनाहक मौत सभ्य समाज के मुंह पर तमाचा है।

इंदिरा गांधी ने “स्वर्ण मंदिर” को आतंकवादियों से बचाने और उसकी पवित्रता बहाल करने के लिए सेना भेजी थी। भिंडरवाले ने एक तरह से स्वर्ण मंदिर पर कब्जा कर लिया था। उसकी मौत के बाद तलाशी में स्वर्ण मंदिर के कमरों से जो उसके कब्जे में थे भारी मात्रा में बम, बारूद, हथियार और कंडोम के पैकेट्स मिले थे।

मेरी सुप्रीमकोर्ट से गुजारिश है, कि इस मामले में आप या तो दिल्ली हाइकोर्ट के फैसले को बहाल रखें या और कड़ी सजा जैसे फांसी मुकर्रर करें, जिससे एक मिसाल कायम हो।

अजय श्रीवास्तव (संपादक)

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