खामोश-हम सरकार हैं! मतदाता मेरे ठेगे पर।

पिछले कुछ सालों से देश में सत्ताधारी राजनेता जनसेवा की आड़ में सिहासन पर काबिज हो गए । ना समझ, ना काबिलियत, लेने लगे देश निर्माण के फैसले। इन फैसलों ने इस देश को बर्बादी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया। परंतु मजाल है इन्हें रत्ती भर भी शर्म आ जाए। यह चिकने घड़े अपने आप को हर विषय का विशेषज्ञ समझ कर जनता के साथ निरंतर खिलवाड़ करते चले जा रहे हैं।
आश्चर्य तो इस बात का है कि ना तो इन्हें कोई टोकने वाला है,और ना ही कोई रोकने वाला। देश की अर्थव्यवस्था के फैसले हो अथवा स्वास्थ्य संबंधी महामारी को लेकर इनके निर्णय जिनके चलते देश की 130 करोड़ जनता त्राहिमाम कर रही है। ना तो इनकी पढ़ाई ही पूरी और ना समझदानी। बस धर्म के नाम पर अपने आप को स्थापित करते हुए पूरे देश के जनमानस का भविष्य अंधकार करते चले गए। यह कोई पहली बार नहीं है जब- जब बेअकल लोगों के हाथ में सत्ता आई है देश की संप्रभुता और संपन्नता पर कुठाराघात हुए हैं। काला धन देश से समाप्त कर देंगे इस पर बड़े जोर शोर से इन सत्ताधारियों ने जनता को बरगलाया था। अचानक से कर दी गई नोटबंदी की घोषणा ने गरीब से मध्यमवर्ग तक के सभी नागरिकों को अपना बैंक में पैसा होते हुए भी भिखारी की श्रेणी में लाकर रख दिया। जिन घरों में बच्चे- बच्चियों के विवाह होने थे वहां पैसे के अभाव में संबंध टूट गए। जिसके चलते कई परिवारों में आत्महत्या होने जैसे मामले भी सामने आए। बैंकों से मुद्रा बदलवाने की बात हो अथवा अपना पैसा निकालने के प्रयत्न में लाइनों में खड़े खड़े कईयों के प्राण निकल गए। परंतु सत्ता के यह जनता के ठेकेदार अपनी विषैली मुस्कान से मुस्कुराते रहे। इस बड़े आघात को जैसे तैसे जनता ने सहा तो उसके बाद महामारी के नाम पर विवेकहीन एक और फैसले ने देश के जनमानस की कमर तोड़ के रख दी। परंतु सत्ता के तानाशाहो ने अचानक लॉकडाउन की घोषणा कर दी।
सब कुछ बंद,जो जहां वही ठहर गया। दिन बीते ,खाने का सामान ,खत्म पैसा खत्म, हजारों मील दूर बेबस लाचार हजारों- हजार कामगार सड़कों पर चल दिए अपने घरों की ओर।
जिस रोटी को कमाने निकले थे घर से वह “रोटी अब दिव्य स्वप्न बनकर रह गई” और चलते चलते अनजान रास्तों पर अनचाही मौतों का शिकार हो गए। मौत गरीब- अमीर नहीं देखती है ,ना जाति धर्म देखती है। यहां तक कि उसे आयु से भी कोई मतलब नहीं। बस झपट्टा मार कर उस गिद्ध की तरह जो आकाश में मंडराते हुए भी जमीन पर पड़े छोटे से मांस के लौथडे को झपट कर अपने आगोश में ले जाता है। और वही हुआ ।
इंसानी सभ्यता पर सबसे बड़ा कलंक बनकर इन राजनेताओं के द्वारा अचानक दिया गया यह फैसला ।
आखरी इस सबका गुनाहगार कौन? जवाब कोई नहीं देता। जिन्होंने भोगा है वह आज भी सूनी आंखों से यह प्रश्न पूछते हैं ।
गुनाहगार कौन है? क्या हमारा रोटी कमाने के लिए अपने घर- गांव से दूर जाना अपराध था? कई तो सवाल पूछने के लिए भी जिंदा नहीं है। महलों में रहने वाले यह राजनेता क्या जाने गरीबी क्या होती है। भूख किसे कहते हैं। अपनों के खो जाने का दर्द क्या होता है। लेकिन तानाशाह मुस्कुरा रहे हैं। निर्लज्ज निसंकोच अपने को बड़ा सिद्ध करते चले गए। (हमने जो कहा जो फैसले लिए उसका अधिकार हमें था। आम आदमी की बिसात क्या है? जो हमसे सवाल करें)।
मुद्दों से भटकाने के लिए जनता के बीच रोज नए शगुफे छोड़े जा रहे हैं। मंदिर- मस्जिद के विवाद, देश की गंगा- जमुनी तहजीब पर खंजर बनकर धस रहे हैं। सब खामोश रहो। हम विश्व गुरु बनने जा रहे हैं
आखिर तो हम इस देश के राजनेता हैं। यह निर्णय करना हमारा अधिकार है कि तुम जिंदा रहो या ना रहो। हम और हमारे पूंजीपति दोस्त इस देश को चलाने के लिए बहुत है। तुम्हारी हमें जरूरत भी नहीं ,क्योंकि ईवीएम की सेटिंग हमें आती है। तुम मंदबुद्धि धर्म और जाति के नाम पर आपस में यूं ही लड़ते रहो इसी में हमारा फायदा है। आखिर हम इस देश के सिंहासन पर बैठे नेता है।

अशोक भटनागर “राष्ट्रध्वज”
स्वतंत्र पत्रकार राजनीतिक विश्लेषक

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