अहम के टकराव का परिणाम है यूक्रेन युद्ध

सोवियत संघ के विखंडन(सन्1991) के बाद से हीं रूस की टेढ़ी नजर यूक्रेन पर रही है।रूस कभी भी ये स्वीकार नहीं कर सका है कि यूक्रेन एक स्वतंत्र राष्ट्र है और वह अपना अच्छा-बुरा समझ सकता है।आपको याद होगा साल 2004 में यूस्चेन्को यूक्रेन के राष्ट्रपति बने थे जो पश्चिम के पक्षधर थे।उनका मानना था कि यूक्रेन का हित पश्चिम के साथ हीं है।भौगोलिक दृष्टि से भी यूक्रेन की पश्चिमी सीमा यूरोप के साथ मिलती है तथा उत्तर और पूर्वी हिस्से की एक लंबी सीमा रूस के साथ लगती है।साल 2005 में यूस्चेन्को ने रूस का दबदबा कम करने के लिए यूक्रेन को नाटो और यूरोपीय संघ(EU) में शामिल करने की बात उठाई।रूस ने इसका कडा विरोध किया मगर साल 2008 में नाटो ने यूक्रेन से ये वादा किया कि आप जल्द हीं हमारे गठबंधन का हिस्सा होंगे।नाटो ने रूस के विरोध को देखकर इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
साल 2013 में यूक्रेन के राष्ट्रपति बने “यानूकोविच”,जो रूस के बेहद करीबी थे।उन्होंने यू.एस के साथ ट्रेड वार्ता को सस्पेंड किया और रूस के साथ ट्रेड समझौते किए।यानूकोविच के इस निर्णय से यूक्रेन की राजधानी कीव में बडा प्रर्दशन हुआ।प्रर्दशनकारियों पर फायरिंग की गई और तकरीबन चौदह हजार से ज्यादा प्रर्दशनकारी काल के गाल में समा गए।इतनी मौतों के बाद भी ये प्रर्दशन कम न हुआ फिर यूक्रेन की संसद ने यानूकोविच को हटाने के लिए वोट किया।यानूकोविच समझ गए थे कि परिस्थितियां उनके अनुकूल नहीं है और यूक्रेन में कभी भी उनकी हत्या हो सकती है।रूस से आदेश मिलने के बाद वे यूक्रेन छोडकर मास्को भाग गए।
इस बीच रूस समर्थित आतंकियों ने क्रीमिया में संसद पर रूसी झंडा फहराया।16 मार्च 2014,मास्को ने क्रीमिया को एक रेफरेंडम के जरिए रूस में शामिल कर लिया।यूरोपीय देशों और क्रीमिया के कडे ऐतराज के बावजूद रूस टस से मस न हुआ और आज भी क्रीमिया पर रूस का कब्जा है।
रूस और क्रीमिया के बीच फिर रिश्तों के बिगडने की शुरुआत साल 2017 में यूक्रेन और यूरोपीय यूनियन के बीच फ्री मार्केट ट्रेड की डील से हुई।रूस ने इस डील का कडा विरोध किया।साल 2019 में यूक्रेन के आँर्थोडाँक्स चर्च को आधिकारिक मान्यता दे दी गई,जिससे रूस की भौहें फिर से तन गई।जून 2020 में आईएमएफ ने यूक्रेन को पाँच बिलियन डाँलर की वित्तीय सहायता दी,जो रूस को नागवार गुजरा।जनवरी 2021 में यूक्रेन ने एकबार फिर अमेरिका से नाटो में शामिल होने की अपील की।रूस ने यूक्रेन को कडी चेतावनी देते हुए कहा था कि रूस इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा।रूस ने यूक्रेन के रूख को देखते हुए नवंबर 2021को यूक्रेन की सीमा पर सेना की तैनाती बढा दी।
सीमा पर हलचल को भांपते हुए अमेरिका के राष्ट्रपति जो.बाइडेन ने रूस को चेतावनी दी मगर रूस टस से मस नहीं हुआ।19 फरवरी,2023 को रूस की सेना ने परमाणु हथियारों कि अभ्यास किया और इसके दो दिन बाद हीं यानि 21 फरवरी को रूस ने यूक्रेन के दो हिस्सों लोहान्स्क और दोनेत्स्क को मान्यता दे दी।तब ये तय हो गया था कि युद्ध निश्चित है।तमाम देशों के समझाने के बाद भी रूसी राष्ट्रपति ब्लामिदीर पुतिन ने 24 फरवरी,2022 को अपनी सेना यूक्रेन में भेजकर युद्ध का शंखनाद कर दिया।
इस युद्ध के लिए दोनों देशों के राष्ट्रपति बराबर के जिम्मेदार हैं।यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलीनेस्की की जिद्द वहां के निवासियों पर भारी पड रही है।ताकतवर रूस ने यूक्रेन के कई शहर को खंडहर में तब्दील कर दिया है।हजारों सैनिक और बेकसूर नागरिक इस युद्धोन्माद के भेंट चढ़ गए हैं।एक चींटी का हाथी से मुकाबले में जो अंजाम होता है,वही यूक्रेन में हो रहा है।जेलीनेस्की और पुतिन दोनों झुकने के लिए तैयार नहीं है।
रूस के राष्ट्रपति का कहना है कि हर हाल में यूक्रेन को नाटो और यूरोपियन यूनियन में शामिल होने की जिद्द छोडनी होगी और क्रीमिया को रूस का हिस्सा मानना होगा,जो जेलीनेस्की को मंजूर नहीं है।
रूस ये आरोप लगाता आया है कि यूक्रेन ने 2015 के शांति सौदे का सम्मान नहीं किया है और पश्चिमी देश यूक्रेन को इसका पालन कराने में नाकाम रहे हैं।इस सौदे के तहत रूस को एक कुटनीतिक जीत मिली थी और उसने यूक्रेन के विद्रोहियों के गढों को स्वायत्तता देने और उन्हें आम माफी देने के लिए बाध्य किया था।हलांकि इस सौदे पर अमल नहीं हो पाया।इस पर अमल न होने के लिए यूक्रेन रूस को जिम्मेदार ठहराता है।उनका कहना है कि रूस समर्थित अलगाववादियों ने संघर्ष विराम का उल्लंघन किया और पूर्व में विद्रोहियों के गढ़ में रूसी सैनिकों की मौजूदगी है,हलांकि,रूस इन दावों को खारिज करता रहा है।
इन आरोप-प्रत्यारोपों के बीच रूस ने यूक्रेन,फ्रांस और जर्मनी के साथ बैठक करने से इंकार कर दिया था और कहा था कि 2015 के शांति समझौते का यूक्रेन द्वारा न मानना व्यर्थ है।वहीं रूस लगातार अमेरिका और उसके नेटो सहयोगी देशों पर यूक्रेन की हथियारों से मदद करने और संयुक्त सैन्य अभ्यास करने की आलोचना करता रहा है।उसका कहना है कि ये यूक्रेन के सैनिकों को बलपूर्वक विद्रोहियों के इलाके को दोबारा कब्जा करने के लिए प्रेरित करता है।
21 वीं सदी के हिटलर रूसी राष्ट्रपति “पुतिन” लगातार रूसियों और यूक्रेनियो़ को “एक हीं लोग” कहते आए हैं और वो दावा करते हैं कि सोवियत समय में यूक्रेन को गलत तरीके से ऐतिहासिक रूसी जमीन मिल गई थी।कहने का लब्बोलुआब ये है कि रूस यूक्रेन के अधिकांश भू-भाग को अपनी सल्तनत में मिला लेना चाहता है।पुतिन अपने पुरखों की तथाकथित गलती को सुधारना चाहते है और इसके लिए वो परमाणु युद्ध से भी पीछे नहीं हटेंगे,ऐसा उनका मानना है।
दो हफ्ते पहले पुतिन ने जोर देते हुए कहा था कि रूस को अमेरिका और उसके सहयोगियों से विश्वसनीय और दीर्घकालिक सुरक्षा गारंटी चाहिए कि वे पूर्व की ओर नेटो के किसी भी कदम से वो खुद को दूर रखेंगे और रूसी क्षेत्र के नजदीक उसके लिए खतरा पैदा करनेवाले हथियारों की तैनाती से भी दूर रहेंगे।पुतिन ने यहां तक कह दिया है कि उसे इस पर कोई जुबानी भरोसा नहीं बल्कि कानूनी गारंटी चाहिए।
यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलीनेस्की अच्छी तरह जानते हैं कि वे अकेले रूस जैसी महाशक्ति का मुकाबला नहीं कर सकते फिर भी उनकी यूक्रेन को नाटो में शामिल कराने की जिद्द एक बचकानी हरकत जैसी है।क्या वे साल 2014 भूल गए हैं जब रूस ने बलपूर्वक क्रीमिया पर कब्जा कर लिया था।उस समय भी नाटो उसकी मदद करने नहीं आया था।अमेरिका और उसके मित्र देशों ने भी कोई मदद नहीं की थी।ये ताकतवर देश जेलीनेस्की को झाड पर चढा दिये हैं मगर अब उनकी कोई सैन्य मदद नहीं कर रहा है।यूक्रेन को लडाई लड़ने के लिए आधुनिक हथियार और प्रशिक्षित सैनिक चाहिए,जिसका यूक्रेन के पास अभाव है।जेलीनेस्की की बार बार मदद की अपील के बावजूद नेटो अपनी सेना नहीं भेज रहा है।अमेरिका तथा उसके मित्र देश जानते हैं कि इस युद्ध में सैन्य हस्तक्षेप का मतलब विश्वयुद्ध है और वो भी परमाणु हथियारों के साथ।
दो चार दिनों में पूरे यूक्रेन पर रूस का कब्जा हो जाएगा मगर उसके हाथ लगेगा खंडहर में तब्दील यूक्रेन।दूनिया स्तब्ध होकर देख रही है कि रूस किस प्रकार यूक्रेन में कत्लेआम कर रहा है,एक आबाद शहर को मलवे में तब्दील कर रहा है।इस विनाश के लिए जितने जिम्मेदार पुतिन हैं उतने हीं जेलीनेस्की भी है।

अजय श्रीवास्तव

विशिखा मीडिया

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