आपको याद होगा 07 जनवरी 2022,हलद्वानी में 1700 करोड़ रूपये से अधिक की 23 परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था “आपको सुख-सुविधा से वंचित रखनेवालों के कारण हीं मानसरोवर का प्रवेशद्वार “मानसखंड” सड़क मार्ग से जुडने से वंचित रहा।हमने न केवल टनकपुर-पिथौरागढ़ आँल वेदर रोड़ पर काम किया बल्कि हमने लिपुलेख में एक सड़क भी बनाई और आगे विस्तार का काम चल रहा है।”
भारतीय प्रधानमंत्री के इस बयान पर नेपाल सरकार ने तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दिया मगर बीते रविवार को नेपाल सरकार ने एकबार फिर दावा किया है कि लिंपियाधुरा,लिपुलेख और कालापानी उसके अभिन्न अंग हैं।इतना हीं नहीं नेपाल ने भारत से अपील की है कि इन क्षेत्रों में सभी निर्माण कार्य रोके जाएं।हलांकि,नेपाल ने साथ साथ हीं ये भु कहा है कि वह सीमा विवाद को राजनयिक स्तर पर सुलझाना चाहता है।
नेपाल की यह प्रतिक्रिया भारतीय दूतावास के उस बयान के बाद आई,जिसमें कहा गया है कि नेपाल के साथ अपनी सीमा पर भारत की स्थिति स्पष्ट है।इसकी सूचना नेपाल सरकार को दे दी गई है।भारत की तरफ से दिये बयान में कहा गया है कि पारस्परिक रूप से सहमत सीमा मुद्दे जो बनाया है उन्हें हमेशा हमारे घनिष्ठ और मैत्रीपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों से हल किया जा सकता है।नेपाल सरकार इस मुद्दे पर कितना गंभीर है ये इस बात से समझा जा सकता है कि इस विवादित मुद्दे पर बयान देने के लिए नेपाल के आईटी मंत्री ज्ञानेंद्र बहादुर कार्की जो सरकार के आधिकारिक प्रवक्ता भी हैं,उन्हें सामने आना पडा।उन्होंने कहा,नेपाल सरकार इस तथ्य के बारे में दृढ़ और स्पष्ट है कि महाकाली नदी के पूर्व में लिपुलेख,लिंपियाधुरा और कालापानी क्षेत्र नेपाल का एक अभिन्न अंग है।मंत्री महोदय ने मंत्रिपरिषद की बैठक में लिए गए फैसलों के बारे में बताते हुए कहा,नेपाल सरकार भारत सरकार से नेपाली क्षेत्र से गुजरने वाली किसी भी सडक के निर्माण और विस्तार जैसे सभी एकतरफा कदमों को रोकने की अपील करती है।नेपाल की सरकार दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक संधि,समझौतों,दस्तावेजों और मानचित्रों के आधार पर भी नेपाल और भारत के बीच धनिष्ठ और मैत्रीपूर्ण संबंधों की भावना सीमा विवाद को हल करने के लिए प्रतिबद्ध है।
भारत द्वारा इस क्षेत्र में रोड बनाने का नेपाल पहले से हीं विरोध करता आया है।दरअसल लिपुलेख से होकर हीं तिब्बत चीन के मानसरोवर जाने का रास्ता है जो स्थान भारत की आस्था का प्रतीक है।चीन से भारत ने वहां आने जाने की अनुमति ले ली है मगर नेपाल का दावा है कि लिपुलेख दर्रा उसका इलाका है।इस दावे के पक्ष में नेपाल ने 1816 की “सुगौली संधि” का हवाला भी दिया है।नेपाल का कहना है कि सुगौली संधि भारत के साथ उसकी पश्चिमी सीमा का निर्धारण करती है।संधि के तहत महाकाली नदी के पूरब का इलाका जिसमें लिंपियाधुरा,लिपुलेख और कालापानी शामिल हैं,नेपाल के क्षेत्र हैं।नेपाल का दावा भारत के लिए बेहद संवेदनशील कालापानी पर भी है,जो चीन से भारत की सुरक्षा में महत्वपूर्ण है।गौरतलब है कि सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद से हीं कालापानी में भारतीय सैनिक तैनात हैं।
कालापानी उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में 35 वर्ग किलोमीटर जमीन है।भारत सरकार ने यहां इंडो-तिब्बत बार्डर पुलिस के जवान तैनात कर रखें हैं।कालानदी का उद्गम स्थल कालापानी हीं है।भारत ने इस नदी को भी अपने नए नक्शे में शामिल किया है जो विवाद का कारण बना है।भारत द्वारा इस इलाके को अपने नक्शे में शामिल करने के बाद नेपाल में इसकी कडी प्रतिक्रिया हुई थी।भारतीय दूतावास के सामने प्रर्दशन हुआ था।
आपको याद होगा 09 अप्रैल 2018 को भारतीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह द्वारा धारचूला-लिपुलेख लिंक रोड का उद्घाटन करने के बाद नेपाल ने विरोध किया था।सडक उद्घाटन के तुरंत बाद काठमांडू में भारतीय राजदूत को विदेश मंत्रालय में बुलाकर एक राजनयिक नोट दिया गया,जिसमें भारत से नेपाली धरती पर किसी भी गतिविधियों में शामिल नहीं होने का आग्रह किया गया था।जब विवाद सतह पर आया तो भारत ने जवाब दिया कि उसने नेपाली धरती पर सड़कें नहीं बनाई हैं।
इससे पहले साल 2015 में भारत और चीन ने नेपाल की जानकारी के बिना लिपुलेख दर्रे को व्यापार मार्ग बनाने के लिए एक समझौता किया था।सहमति का विरोध करते हुए नेपाल ने दोनों पडोसी देशों को राजनयिक नोट भेजा था।नेपाल सरकार के वरिष्ठ राजनयिकों का कहना है कि सन् 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद भी नेपाल ने उत्तरी सीमा पर भारतीय चौकियों और सैनिकों को हटाने के लिए कहा था मगर भारत सरकार ने अनसुना कर दिया था।ये मुद्दा सन् 1994 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन अधिकारी की भारत यात्रा और सन् 1997 में उनके भारतीय समकक्ष आई.के.गुजराल की नेपाल यात्रा के दौरान भी उठा था मगर भारत की तरफ से कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
इस विवादास्पद मामले में नेपाल सरकार की बातों में भी दम है।ये सही है कि सन् 1816 की “सुगौली संधि” भारत के साथ उसकी पश्चिमी सीमा का निर्धारण करती है।संधि के तहत महाकाली नदी के पूरब का इलाका जिसमें लिंपियाधुरा,कालापानी और लिपुलेख शामिल है,नेपाल के क्षेत्र हैं।”सुगौली संधि” ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाली शासकों के बीच किया गया था।भारत का मानना है कि संधि में सीमारेखा स्पष्ट नहीं है और इसे बातचीत के माध्यम से परिभाषित किया जा सकता है।
नेपाल सरकार के इस दावे में भी दम है कि सन् 1961 में नेपाल सरकार ने यहां जनगणना करवाई थी,तब भारत की तरफ से कोई आपत्ति नहीं जताई गई,मगर 1962 के चीन युद्ध के बाद ये इलाका भारत के लिए सामरिक महत्व का बन गया,तब से भारत इस इलाके में जबर्दस्ती काबिज है।नेपाल का साफ मानना है कि कालापानी में भारत की मौजूदगी सुगौली संधि का खुलेआम उल्लंघन है।
कांग्रेस के जमाने में ये सारे मुद्दे महत्वहीन थे मगर नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद ये सारे विवाद सतह पर आ गए हैं।भारतीय प्रधानमंत्री की आस्था कैलाश मानसरोवर में है और वे चाहते हैं कि इस रास्ते से श्रद्धालु दर्शन करने केलिए जाएं जो बेहद शार्टकट रास्ता है।अगर देखा जाए तो ये इलाका नेपाल के लिए बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है मगर भारत की दृष्टि से ये सामरिक और आध्यात्मिक दोनों तरह से महत्वपूर्ण है।
भारत सरकार को डिप्लोमेसी के माध्यम से नेपाल सरकार को मनाना होगा नहीं तो एक और पडोसी से हमारे संबंध दाव पर लग जाएंगे।मद्धेशी आंदोलन के समय नेपाल में भारत की कितनी किरकिरी हुई थी,ये किसी से छूपा नहीं है।एक तरफ वो आंदोलन था,दूसरी तरफ भूकंप से बरबाद हुआ नेपाल।नेपाल ने आरोप लगाए थे कि भारत सरकार अप्रत्यक्ष रूप से आंदोलनकारियों की मदद कर रही है जबकि नेपाल भूकंप की विभीषिका से जुझ रहा है।इसके थोडे हीं दिनों बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल का दौरा किया था,जिसमें उन्हें कई जगह विरोध का सामना करना पडा था।
चीन की दखलअंदाजी जिस तरह बढ़ रही है,भारत को अपने पडोसियों से बेहतर संबंध बनाने होंगे।इस कडी में सबसे महत्वपूर्ण पडोसी नेपाल है,जिसके साथ हमारे रोटी और बेटी के संबंध हैं।नेपाल की कला-संस्कृति और रीति-रिवाज एक से हैं।नेपाल को भी ये सोचना होगा कि भारत कैलाश मानसरोवर तक रास्ता क्यों बना रहा है?भगवान शिव की अराधना भारत और नेपाल दोनों देशों में की जाती है और भारत का मकसद कैलाश मानसरोवर तक रास्ता बनाकर अपने श्रद्धालुओं के दर्शन को सुगम करना है और कुछ नहीं।
मुझे उम्मीद है दोनों देशों के लीडरान जब इस मुद्दे को लेकर आमने-सामने बैठेंगे तो रिश्तों में जमी बर्फ अवश्य पिघलेगी और एक समुचित समाधान सामने आएगा।
अजय श्रीवास्तव





