कल बीजेपी के वरिष्ठ नेता और योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने इस्तीफा देकर सनसनी मचा दी। उन्होंने अपने इस्तीफे में लिखा, “दलितों, पिछडों,किसानों,बेरोजगार नौजवानों एंव छोटे-लघु एंव मध्यम श्रेणी के व्यापारियों की घोर उपेक्षात्मक रवैये के कारण उत्तरप्रदेश के योगी मंत्रिमंडल से इस्तीफा देता हूँ।”
गौरतलब है कि कल हीं चुनाव संबंधी मीटिंग के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, प्रदेशाध्यक्ष स्वत्रंत देव सिंह, उप-मुख्यमंत्री केशव मौर्या समेत बहुत से लीडर दिल्ली में थे इसी बीच ये खेल हो गया। यद्यपि इसकी सुगबुगाहट थोडे दिन पहले से हीं सुनी जा रही थी।
स्वामी प्रसाद मौर्य का इस्तीफा लेकर उनके विश्वसनीय रोशन लाल वर्मा जो शाहजहांपुर के तिलहर से विधायक हैं,राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के पास गए थे। इसी बीच सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ मीटिंग की एक तस्वीर ट्वीट कर लिखा कि स्वामी प्रसाद मौर्य और उनके साथियों का समाजवादी पार्टी में स्वागत है। हंगामा मचना हीं था और मचा भी।लखनऊ से दिल्ली तक भाजपा में हडकंप का माहौल था। स्वामी प्रसाद के इस्तीफे से सभी भाजपाइयों का जायका खराब हो गया था।कोढ में खाज तब हुआ जब स्वामी प्रसाद मौर्या के तीन समर्थक विधायकों ने भारतीय जनता पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से अपना इस्तीफा दे दिया।खबर आने लगी कि तकरीबन एक दर्जन दलित और ओबीसी विधायक इस्तीफा देने के लिए तैयार हैं।
अब इस खबर में कितनी सच्चाई है ये तो समय बताएगा।देर शाम को राष्ट्रवादी कांग्रेस के प्रमुख और भारतीय राजनीति के चाणक्य शरद पवार ने ये कहकर सनसनी फैला दी कि भाजपा के एक दर्जन विधायक समाजवादी पार्टी में जाने के लिए तैयार है,मुझे इसकी पुख्ता जानकारी है।
आपको याद होगा आज से तकरीबन दो-ढाई साल पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ 200 से ज्यादा विधायक धरने पर बैठ गए थे।ये सारे विधायक भारतीय जनता पार्टी के थे और उनके समर्थन में सपा,बसपा और कांग्रेस के विधायक भी धरने पर आ गए थे।विधायक इस बात से बेहद खफा थे कि रात के समय लखनऊ पुलिस विधायक आवास पर माननीय विधायक से पूछताछ करने पहुँची थी जो दिन में भी हो सकती थी।सभी विधायक एकमत से इस विषय पर सदन में चर्चा कराने की मांग कर रहे थे,जबकि मुख्यमंत्री सदन में बहस के खिलाफ थे।मुख्यमंत्री को अपने विधायकों से जबरदस्त विरोध का सामना करना पडा था मगर अपने गरूर में रहनेवाले योगी आदित्यनाथ टस से मस नहीं हुए।दिल्ली को इस मामले में हस्तक्षेप करना पडा था तब मामले को शांत किया गया।विधायकों ने केन्द्रीय नेतृत्व से योगी के अख्खड रवैये और पूर्णकालिक मुख्य सचिव की तैनाती की मांग की थी।
समय समय पर योगी आदित्यनाथ के खिलाफ विरोध के स्वर सुनाई देते रहें हैं।उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के साथ उनके संबंध जगजाहिर हैं।दोनों में कई साल से बात बंद है।कुछ महीनों पहले दिल्ली दरबार के विशेष आग्रह पर मुख्यमंत्री अपने नायाब उप-मुख्यमंत्री केशव मौर्या के घर खाना खाने गए थे।अब दोनों के दामन में लिपटी सख्त कितनी पिघली ये तो कह नहीं सकते मगर जो खबर छन के आ रही है उससे तो नहीं लगता कि दोनों के संबंध सामान्य हैं।
कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक खास रिटायर्ड आईएएस को लखनऊ भेजा था और योगी से कहा था कि वे उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल करें और उनके लंबे प्रशासनिक अनुभव का लाभ लें मगर हठी योगी जी महाराज ने प्रधानमंत्री की बात को अनसुना कर दिया तब उस रिटायर्ड आईएएस को संगठन में संयोजित किया गया।मुख्यमंत्री के कार्यशैली से सभी निराश हैं केवल उनके स्वजातियों को छोडकर।उ.प्र में सर्वाधिक सशक्त ब्राह्मण तबका उनका खुलकर विरोध करता है क्योंकि उनका मानना है कि योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में ब्राह्मणों को सबसे ज्यादा प्रताड़ित किया गया है।दलित विधायकों का कहना है कि इस सरकार में उनके साथ वो इंसाफ नहीं हो रहा,जिसके वो हकदार हैं।कमोबेश यही हालत ओबीसी विधायकों का भी है।जब ओबीसी के सबसे बडे नेता केशव मौर्या की उपेक्षा मुख्यमंत्री द्वारा की जाती है तो और का क्या कहना।
2014 के आसपास भाजपा ने एक मिशन के तहत यादव बनाम गैर यादव पिछडी जातियों को एकजुट किया था और उसे इसका फायदा भी भरपूर मिला।गैर यादव ओबीसी विधायकों ने भाजपा को आशातीत सफलता दिलवाया मगर इस समीकरण के सूत्रधार केशव मौर्या को मुख्यमंत्री नहीं बनवा सके।संघ की दखलंदाजी के चलते केशव मौर्या का नाम मुख्यमंत्री की रेस से बाहर हो गया और संघ की हीं मेहरबानी से योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने मगर वे अपने दबंगता के चलते सभी को एकजुट नहीं कर सके।
अगर हम सीएसडीएस व राष्ट्रीय जनगणना के आंकड़ों को माने तो देश में हिंदू ओबीसी 41.47%और मुस्लिम ओबीसी 12.58% हैं जो कहीं भी सरकार बनाने और बिगाड़ने के लिए काफी हैं।यूपी में 30% वोट पर हीं सत्ता मिल जाती है ये हमने गैर यादव ओबीसी वोटों को भाजपा के साथ गोलबंद होते हुए देखा भी है।किसी भी सरकार को एक समुदाय का विरोध भारी पडता है,यहाँ तो योगी आदित्यनाथ जी से ब्राह्मण,ओबीसी और दलित सभी नाराज दिखते हैं।
इस बगावत को इस शायरी के माध्यम से समझा जा सकता है…
ये जरूरी तो नहीं साथ में लश्कर निकले,
कर्बला याद करो सिर्फ बहत्तर निकले।
ये जो नेता भारतीय जनता पार्टी छोड़कर जा रहे हैं वो मामूली नेता नहीं हैं।स्वामी प्रसाद मौर्य पाँच बार के विधायक रहें हैं और कुशवाहा बिरादरी में उनकी अच्छी-खासी पैठ है।ये कितने महत्वपूर्ण हैं वो इस बात से जाना जा सकता है कि उनकी पुत्री संघमित्रा बीजेपी की सांसद हैं।बेटा विधायक है और वे उ.प्र सरकार में वरिष्ठ मंत्री है।उनके इस्तीफे के बाद कुछ लोगों ने उन पर आरोप लगाया कि इस विधानसभा चुनाव में बीजेपी उनके बेटे को टिकट नहीं दे रही थी,इस वजह से स्वामी प्रसाद मौर्य ने बीजेपी छोड दी है तो उन्होंने पलटकर जवाब दिया कि “मैं परिवारवाद को बढावा देने का घोर-विरोधी रहा हूँ और साथ हीं साथ यहाँ बीजेपी ने बिना मांगे बेटे को भी टिकट दिया था।मैं पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं हूँ और न मैं पहले बहुजन समाज पार्टी का अध्यक्ष था।मैं टिकट दिलाने की हैसियत में न था और न हूँ।इसलिए मैं न अपने बेटे-बेटी को टिकट दिला सकता हूँ और न हीं किसी और को।मैं हमेशा उत्तर प्रदेश के दलितों और पिछडों की लडाई लडा हूँ।”
एक राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर मेरा मानना है कि ये बगावत भाजपा के खिलाफ कम योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली के खिलाफ ज्यादा है।केंद्रीय नेतृत्व अगर इस बगावत को संज्ञान में लेकर डैमेज कंट्रोल नहीं किया तो ये जख्म नासूर बन जाएगा।उ.प्र में हालात को देखकर भाजपा केंद्रीय नेतृत्व क्या निर्णय लेता है ये देखने वाली बात होगी।योगी आदित्यनाथ के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खडा है जो उ.प्र में नेतृत्व परिवर्तन के लिए कभी हामी नहीं भरेगा,क्योंकि बहुत दिनों बाद उन्हें वो प्यादा हाथ लगा है जो उनकी भावनाओं को खुलकर हवा देता है,प्रदेश में लागू करता है।
योगी आदित्यनाथ जी की कार्यशैली से प्रधानमंत्री भी खुश नहीं हैं मगर उनके पास अब अधिक विकल्प भी नहीं बचे हैं।योगी पर हाथ डालने का मतलब बर्रे के छत्ते पर पत्थर मारना जैसा है और मैं नहीं समझता कि मोदी ऐसा करेंगे।
अजय श्रीवास्तव






