
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच जहां पाकिस्तान खुद को मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, वहीं उसके दावों पर सवाल उठने लगे हैं। इस्राइल ने स्पष्ट संकेत दिया है कि आतंकवाद से जूझ रहा पाकिस्तान इस भूमिका में प्रभावी नहीं हो सकता, जबकि भारत एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। संघर्ष दूसरे महीने में प्रवेश कर चुका है। इसी दौरान इस्राइल के विदेश मंत्रालय की विशेष दूत फ्लेर हसन-नहूम ने अहम बयान देते हुए कहा कि यह टकराव शुरुआत से ही ‘मल्टी-फ्रंट’ यानी कई मोर्चों पर फैला क्षेत्रीय युद्ध रहा है। उन्होंने बताया कि 7 अक्टूबर को दक्षिण दिशा से हमास ने हमला किया, जिसे उन्होंने ईरान समर्थित संगठन बताया। इसके अगले ही दिन उत्तर दिशा से भी हमले शुरू हो गए, जिससे इस्राइल को एक साथ कई मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ी।
पाकिस्तान की मध्यस्थता की संभावना पर सवाल उठाते हुए नहूम ने कहा कि जो देश स्वयं आतंकवाद की चुनौती से जूझ रहा हो, उसके लिए ऐसी भूमिका निभाना कठिन होगा। इसके विपरीत, भारत की कूटनीतिक स्थिति को मजबूत बताते हुए उन्होंने कहा कि भारत के विभिन्न देशों के साथ संतुलित और सकारात्मक संबंध हैं, जिससे वह अधिक प्रभावी मध्यस्थ बन सकता है। अमेरिका की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संवाद के अवसर बनाए रखे, लेकिन ईरान के अड़ियल रुख के चलते समझौता संभव नहीं हो सका। उन्होंने इसे एक संतुलित रणनीति बताते हुए कहा कि बातचीत के रास्ते खुले रखने के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर सैन्य कार्रवाई भी जारी रहनी चाहिए।
इस्राइल की सैन्य स्थिति पर उन्होंने दावा किया कि बीते एक महीने में विरोधी ताकतों को काफी हद तक कमजोर कर दिया गया है। उनके अनुसार, ईरान समर्थित रॉकेट लॉन्च सिस्टम का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा नष्ट किया जा चुका है। साथ ही विरोधी पक्ष की नौसेना और शीर्ष सैन्य व राजनीतिक नेतृत्व को भी भारी नुकसान हुआ है। उन्होंने ईरान के भीतर अस्थिरता और नेतृत्व संकट की स्थिति का भी उल्लेख किया। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए नहूम ने कहा कि किसी भी ऐसे देश को परमाणु हथियार रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जो खुले तौर पर विनाश की बात करता हो।






