हिंदी भाषा, भारत में बोली जानी वाली एक ऐसी विश्व विख्यात भाषा है, जिसकी असली खुबसूरती देखने को मिलती है, हिंदी साहित्य में। हिंदी साहित्य का जन्म मध्ययुग में हुआ था, और वहीं से हिंदी साहित्य में साहित्यकारों का आगमन शुरु हुआ। हिंदी के साहित्यकार उच्च कोटि के साहित्यकार हुआ करते थे। और ये कहना गलत नहीं होगा, कि हिंदी साहित्य के साम्राज्य के यह सम्राट थे, ऐसे सम्राट जो आज भी हिंदी साहित्य की दुनिया में तारों की तरह जगमगाते हैं। ये कुछ ऐसे ही साहित्यकार हैं, जिनकी रचनाएं आज भी याद की जाती हैं।
मुंशी प्रेमचंद :
भारत के ‘शेक्सपियर’ कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के निकट एक गांव में हुआ था। उनका मूल नाम था धनपत राय श्रीवास्तव। उनके पिता का नाम अजायबराय और माता का नाम आनंदी देवी एवं उनकी पत्नी का नाम शिवरानी देवी था। प्रेमचंद बेहद सरल लेकिन मनभावन रचनाएं लिखा करते थे। वह पहले ‘नवाब राय’ नाम का प्रयोग करते थे, बाद में उन्होंने बदलकर प्रेमचंद कर दिया था। उन्के योगदान से प्रभावित होकर उन्हे ‘उपन्यास सम्राट’ के नाम से भी नवाज़ा गया था। वह हिंदी और उर्दू भाषा के जानकार थे। उन्होंने कई उपन्यास, कहानियाँ, नाटक, बाल साहित्य, अनुवाद भी लिखे थे, व संपादन भी किया था। वह एक शिक्षिक, साहित्यकार, पत्रकार और बेहद सरल स्वभाव के व्यक्तित्व थे। उनकी मृत्यु 8 अक्टुबर 1936 को वाराणसी में हुयी थी। उनकी प्रमुख रचनाएं थीं, गोदान (उपन्यास), गबन (उपन्यास), सेवा सदन (उपन्यास), प्रेमाश्रम (उपन्यास), निर्मला (उपन्यास), कायाकल्प (उपन्यास), सोजे़ वतन (कहानी), मानसरोवर (कहानी), कर्बला (नाटक), वरदान (नाटक), आजाद कथा (अनुवाद), पिता के पत्र, पुत्री के नाम (अनुवाद), मर्यादा (संपादन), माधुरी (संपादन), हंस (संपादन), जागरण (संपादन)। प्रेमचंद की जीवनी उनके ही पुत्र अमृत राय ने ‘कलम के सिपाही’ नाम से लिखी थी।
महादेवी वर्मा :
आधुनिक काल की साहित्यकार महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 को उत्तर-प्रदेश के फ़र्रुखाबाद जिले में हुआ था। वह एक अध्यापिका के साथ-साथ लेखक भी थीं। वह संगीत की भी जानकार थी। उन्होंने अपना कार्यकाल अध्यापन से शुरु किया, और प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्य बनी। उनका विवाह, बाल विवाह था परंतु वह एक अविवाहिता की भांति रही। वह एक चित्रकार भी थीं। उनकी प्रमुख कविता संग्रह निहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, दीपशिखा, सप्तपर्णा, प्रथम आयाम, अग्निरेखा आदि थे। ‘गिल्लु’ महादेवी द्वारा रचित एक सुंदर कहानी थी। ‘ठाकुरजी भोले हैं’ और ‘आज खरीदेंगे हम ज्वाला’ उनके द्वारा रचित प्रमुख बाल साहित्य थे। वह ‘चंदा’ और ‘साहित्यकार’ मासिक पत्रिका की संपादक भी थीं। ‘अतीत के चलचित्र’ और ‘स्मृति की रेखाएं’ उनके रेखाचित्र थे। ‘पथ के साथी’, ‘मेरा परिवार’ और ‘संस्मरण’ भी उनकी रचनाएं थी। ‘श्रंखला की कड़ियां’, ‘विवेचनात्मक गघ’, एवं ‘संकल्पिता’ उनके प्रमुख निबंध थे। कवि सुर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने उन्हें ‘हिंदी के विशाल मंदिर की ‘सरस्वती’ भी कहा था। महादेवी को उनके हिंदी साहित्य में योगदान की वजह से ‘आधुनिक मीरा’ के नाम से भी जाना जाता था। हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए महादेवी वर्मा ने प्रयाग में ‘साहित्यकार संसद’ और ‘रंगवाणी नाट्य संस्था’ की स्थापना भी की थी।
रामधारी सिंह ‘दिनकर‘ :
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हिंदी साहित्य के कवि, लेखक एवं निबंधकार थे। उनका जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार राज्य मे बेगुसराय के सिमरिया घाट में हुआ था। वह एक श्रेष्ठ वीर रस के कवि थे। उन्होंने पटना विश्वविघालय से अपनी पढ़ाई की थी। उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी, और उर्दू पर गहन अध्ययन किया था। वह राष्ट्रकवि के नाम से भी जाने जाते थे। उनकी रचना ‘उर्वशी’ को भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार और कुरुक्षेत्र को विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ काव्यों में 74 वां स्थान दिया गया था। उनके काव्य बीरदोली, विजय संदेश, प्रणभंग, रेणुका, हुंकार, इत्यादि थे। उनकी गद्ध, मिट्टी की ओर, चित्तौड़ का साका, अर्धनारीश्वर, इत्यादि प्रमुख हैं। भारत के राष्ट्रपति ने दिनकर को 1959 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया था। बिहार के पूर्व राज्यपाल ने उन्हें डॉक्ट्रेट की उपाधि से सम्मानित किया था। उनकी मृत्यु 24 अप्रेल 1974, को मद्रास (तमिल नाडु) मे हुयी थी। 1999 में भारत सरकार ने उनकी याद में डाक टिकट जारी किया था। उनकी स्मृति में उनकी जन्म शताब्दी पर पूर्व केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री प्रियरंजन दास मुंशी ने ‘रामधारी सिंह दिनकर- व्यक्तित्व और कृतित्व’ पुस्तक का विमोचन किया था। संस्कृत के चार अध्याय के लिए उन्हें 1959 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भारत सरकार ने भी सम्मानित किया था।
सुर्यकांत त्रिपाठी निराला :
निराला का जन्म 21 फरवरी 1899 को बंगाल की महिषादल रियासत में हुआ था। निराला ने कहानियाँ, उपन्यास, निबंध लिखे हैं। वह कविताओं के लिए भी जाने जाते हैं। उनके पिता का नाम पंडित रामसहाय तिवारी था। वह महिषादल में सिपाही थे। उन्होंने बांग्ला और संस्कृत पर अध्ययन किया था। निराला की रचना ‘जूही की कली’ बहुत प्रसिद्ध हुयी थी। उनके प्रमुख काव्य थे, अनामिका, परिमल, गीतिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, अर्चना, आराधना आदि तथा अप्सरा, अल्का, प्रभावती, निरुपमा, कुल्ली भाट, चमेली, इत्यादि उनके प्रमुख उपन्यास थे। उनकी प्रमुख कहानियाँ लीली, सखी, चतुरी चमार थी। रवीन्द्र, कविता कानन, प्रबंध पद्म, प्रबंध प्रतिमा, चाबुक, इत्यादि उनकी प्रमुख निबंध-आलोचना थी। उन्होंने महाभारत (1939), रामायण की अंतर्कथाएं जैसी पुराण कथाएं भी लिखी थी। भक्त ध्रुव, भक्त प्रहलाद, भीष्म, महराणा प्रताप, इत्यादि उनके प्रमुख साहित्य थे। उनकी मृत्यु 15 अक्टुबर 1961 में हुयी थी।
सुभद्रा कुमारी चौहान:
सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म निहालपुर, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में 16 अगस्त 1904 को हुआ था। उनकी विख्यात कविता ‘झांसी की रानी’ थी। यह एक वीर रस की कविता है। ‘झांसी की रानी’ कविता रानी लक्ष्मीबाई और उनके द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी गयी लड़ाई पर रचित थी। उनकी प्रमुख रचनाएं थी: त्रिधारा, मुकुल (कविता), बिखरे मोती (कहानी)। उनहें ‘मुकुल’ और ‘बिखरे मोती’ के लिए विभिन्न पुरस्कार भी मिलें। उनकी कविता ‘कोयल’ की कुछ पंक्तियां इस प्रकार थी:
देखो कोयल काली है पर
मीठी है इसकी बोली
इसने ही तो कुह-कुह कर
आमों मे मिश्री घोली
कोयल-कोयल सच बतलाना
क्या संदेशा लायी हो
बहुत दिनों के बाद आज फिर
इस डाली पर आयी हो
क्या गाती हो किसे बुलाती
बतला दो कोयल रानी
प्यासी धरती देख मांगती हो
क्या मेघों से पानी?
कोयल यह मिठास क्या तुमने
अपनी माँ से पायी है?
माँ ने ही क्या तुमको
यह मीठी बोली सिखलायी है?
किसी भी देश की संस्कृति और उसका इतिहास उस देश के साहित्य में कैद होता है। उसी प्रकार भारत की संस्कृति हिंदी साहित्य मे कैद है। भारतीय संस्कृति को जानने और समझने के लिए केवल हिंदी साहित्य ही काफी है। हिंदी साहित्य हमारे देश की विरासत संभाले हुए है, और हिंदी साहित्यकार इसके रखवालों का काम करते है। हिंदी साहित्य इसी प्रकार विभिन्न साहित्यकारों से प्रभावित होता आया है। हिंदी साहित्य आठवीं शताब्दी में जन्मा साहित्य है, जो कितने ही साहित्यों का साक्षी रह चुका है। हिंदी साहित्य इन साहित्यकारों की रचनाओं से फलता फुलता आया है। हिंदी साहित्य रचनाओं का घर है। साहित्यकार हिंदी साहित्य के वो अनमोल नगीने हैं, जो हिंदी साहित्य मे चार चाँद लगाते हैं। हिंदी साहित्य जितना सरल प्रतीत होता है, उतना ही कठिन हैं। हिंदी साहित्य हमारे देश का वो दर्पण है, जो हमारी संस्कृति की छवि को दर्शाता है। यह केवल इन साहित्यकारों की खासियत है, जो हिंदी साहित्य को विश्व मे ख्याति दिलाती आयी है। हिंदी साहित्य इन महान साहित्यकारों की वजह से आज भी जीवित है। हिंदी साहित्य का दायरा बहुत बड़ा है। इसे चंद रचनाओं में समेट पाना नामुमकिन है। इन साहित्यकारों की रचनाएं आने वाले कई युगों तक इसी तरह लुभाती रहेंगी, और आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेंगी। समूचे विश्व में हिंदी साहित्य का नाम, केवल इन साहित्यकारों की ही देन है, और हिंदी साहित्य ऐसे दिग्गज साहित्यकारों को पा कर खुद को गौरवान्वित महसूस करता है।



