फ़ेमिनिज़म

“महिला सशक्तिकरण” क्या ये शब्द ही अपने आप में खोखला नहीं लगता…? 

स्त्रियों को निर्बल, अबला और लाचार समझने वाले एक बार 5 कि.ग्रा. का वज़न नौ महीने तक पेढू पर बाँधकर रखें, और नाक के छेद में से नारियल निकालने वाला, जाँघो को चीर देने वाला, बच्चे को जन्म देते वक्त होने वाले दर्द से गुज़र कर देखें। फिर कहें कि महिला सशक्त है या अशक्त… 

परिवार का वहन और सामाजिक ज़िम्मेदारियों को उठाते हुए अब हर दूसरी स्त्री नौकरी करती है, तथा अपनी काबिलियत से घर और ऑफिस के हर मोर्चे पर बखूबी अपना वजूद स्थापित करती है।

फ़ेमिनिज़म एक ऐसी विचारधारा है जो स्त्री और पुरुष के समान अधिकारों का समर्थन करती है। ऐसी विचारधारा ही क्यूँ…? पुरुष को प्रधान और स्त्री को दूसरे पायदान पर अबला, बेचारी सी खड़ी कर दी जाती है। जबकि आज की स्त्री हर क्षेत्र में अग्रसर भूमिका निभाती है।

कई घरों में लड़कों को उच्च शिक्षा, पालन-पोषण के साथ हर तरह की आज़ादी दी जाती है। उसके मुकाबले पहले तो लड़की के जन्म पर ही अफ़सोस जताया जाता है। और जन्मी भी तो उस पर कई पाबंदियाँ लाद दी जाती हैं। लड़की के जन्म पर पेड़े के बदले जलेबियाँ क्यूँ बाँटी जाती हैं, पेड़े क्यूँ नहीं… 

लड़कियों की भावनाओं का कोई मोल नहीं। लड़कियों को भी मानसिक और भावनात्मक आज़ादी का पूरा हक है। पुरानी और खोखली रवायतों को तोड़ कर अब लड़कियों को पूरा मान सम्मान और अधिकार देना चाहिए।

अबला, लाचार और अशक्त जैसे शब्दों को शब्द कोश से हटा देना चाहिए। ये शब्द ही हर इंसान के मानस में स्त्रियों को   कमज़ोर होने के भाव पैदा करते है। अब स्त्री विमर्श में लिखना बंद करके स्त्री की शक्ति और क्षमता के किस्से लिखें जाए। बलात्कार क्योँ होते हैं? जब चार लोग एक साथ मिलकर किसी लड़की पर टूट पड़ेंगे, तो एक अकेली लड़की क्या कर सकती है। चार लड़कियों के हवाले एक दरिंदे को कर दो नामों निशान ना मिटा डाले, तो कहना। जो बच्चे को जन्म दे सकती है, वो काली चंडी बनकर राक्षसों का वध भी कर सकती है।

आज जरूरत है बेटों को संस्कारों के दायरे में रखने की। वर्ना दुर्योधन और रावणों वाली मानसिक नपुंसकता पूरे समाज को दीमक की तरह खा जाएगी। स्त्रियों की सहनशीलता को मत ललकारो… वो दिन दूर नहीं, स्त्रियाँ यदि अपने पर आईं तो ऐसे दरिंदों का कोख़ में ही वध कर देंगी, जो लड़कियों को भोगने की चीज़ समझते हैं। स्त्री को अबला नहीं दुर्गा समझो। अब महिला सशक्तिकरण नहीं, लड़कों के ससंस्करण करने का समय आ गया है।

भावना ठाकर, बेंगुलूरु

विशिखा मीडिया

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