“हिजाब” विवाद पर अपना मत व्यक्त करने से पहले सुप्रीमकोर्ट आँफ इंडिया को कुछ फैसलों पर गौर करना जरूरी है।15 दिसंबर,2016 को सुप्रीमकोर्ट ने धार्मिक मान्यता की दुहाई देकर वायुसेना में नौकरी करने वाले “मोहम्मद जुबैर” की दाढी रखने और दाढी रखने के कारण उसे नौकरी से निकाले जाने का आदेश रद्द करने की मांग खारिज कर दी थी।सुप्रीमकोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि “वेशभूषा से जुडे नियम और नीतियों की मंशा धार्मिक विश्वासों के साथ भेदभाव करने की नहीं है और न हीं इसका ऐसा प्रभाव होता है।इसका लक्ष्य और उद्देश्य एकरूपता,सामंजस्य,अनुशासन और व्यवस्था सुनिश्चित करना है जो वायुसेना के लिए अनिवार्य है।वास्तव में यह संघ के प्रत्येक शस्त्र बल के लिए है।”
बरखास्तगी की कारवाई से पहले वायुसेना ने अपने सैनिक को बहुत समझने की कोशिश की थी मगर वह अपने निर्णय पर अडा रहा,तब मजबूरन वायुसेना को बरखास्तगी का कठोर निर्णय लेना पडा।वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने तब कहा था कि वायुसेना के नियम सभी सैनिकों के लिए हैं और अनुशासन के लिए ये बेहद जरूरी हैं।
अब एक और वाकये को देखिये,सुप्रीमकोर्ट ने 11अगस्त,1986 को “विजोय एम्मानुएल बनाम केरल राज्य” मामले में दिये फैसले में भी धार्मिक आजादी और अभिव्यक्ति की आजादी पर चर्चा की है।उस फैसले में सुप्रीमकोर्ट ने स्कूल में राष्ट्रगान नहीं गानेवाले तीन बच्चों को स्कूल से निकाले जाने को गलत ठहराया था।बच्चों की ओर से धार्मिक विश्वास के खिलाफ होने की बात कहते हुए राष्ट्रगान नहीं गाने की दलील दी गई थी।कोर्ट ने कहा था कि बच्चों ने राष्ट्रगान का अपमान नहीं किया।वे राष्ट्रगान के दौरान सम्मान में खडे हुए,सिर्फ उसे गाया नहीं।
न्यायपालिका के ये दोनों फैसले ये दर्शाते हैं कि भारत में हर धर्म के लोगों को अपनी उपासना पद्धति के अनुसार धार्मिक गतिविधियों का पालन करने की आजादी है।देश के संविधान ने अलग-अलग पर्सनल लॉ को मान्यता दी है ताकि हर धर्म के लोग संविधान के दायरे में रहकर अपने धर्म के अनुसार धार्मिक कार्य कर सकें।भारत सर्वधर्म समभाव वाला देश है और यहाँ सभी धर्म के लोग सम्मान से रहते हैं और यही हमारी विशेषता भी है।
अब ये प्रश्न उठता है कि इतनी आजादी के बाद भी इस तरह के सवाल क्यों उठते है।हर मसले को धार्मिक चश्मे से क्यों देखा जाता है।क्या वायुसैनिक मोहम्मद जुबैर की ड्यूटी के दौरान दाढी रखने की मांग अनुचित नहीं थी?सेना में ड्यूटी ज्वाइन करने के समय सेना के नियम को स्पष्ट बता दिया जाता है,फिर बेवजह विवाद की क्या जरूरत थी।केरल के स्कूल में तीन बच्चों का राष्ट्रगान से इंकार क्या बच्चों ने अपनी मर्जी से ये निर्णय लिया था?क्या स्कूल के बच्चे इस तरह के विवादित निर्णय ले सकते हैं ये बडा सवाल है।यकीनन बच्चों को उसके पिता या कुछ अन्य लोग इस प्रकार की बातें सीखा रहे थे।क्या क्रिसचियन और इस्लामिक देश में कोई भी बच्चा राष्ट्रगान से मना कर सकता है?मना करने के बाद वह स्कूल में पढ़ सकता है?कतई नहीं।क्या पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू बच्चे राष्ट्रगान नहीं गाते?क्या उनकी हिम्मत हो सकती है विरोध करने की।ये आजादी केवल भारत में हीं हासिल है मगर कुछ लोग इसका बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं।
शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब या धार्मिक कपडे पहनकर आना बिल्कुल गलत है।मैं इन संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करने आते हैं न कि धार्मिक प्रर्दशन करने।शिक्षा संस्थानों के बाहर आप हिजाब-बुर्का पहनने के लिए स्वतंत्र हैं,उस समय कोई आपको रोकता है तो वो गलत है,अपराध है।शैक्षणिक संस्थानों में ड्रेसकोड होता है और होना भी चाहिए क्योंकि वहां सभी धर्म के बच्चे पढते हैं।गरीब-अमीर के बच्चों के बीच कोई अंतर न रहे इस लिये सभी बच्चों को एक ड्रेस में स्कूल बुलाया जाता है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने के दौरान मैंने देखा कि बहुत सी मुस्लिम लडकियां यूनिवर्सिटी हिजाब में आती थीं और फिर हिजाब को निकालकर बैग में रख देती थीं।सभी साथ पढ़ते थे,गप्पें लडाते थे।कैंटीन में खुब ठहाके लगाये जाते थे।क्या वे लडकियां नहीं थीं?दरअसल आज इनका ब्रेनवॉश किया जा रहा है।हर मामले को धर्म से जोडकर देखा जा रहा है।ये बातें अब देखादेखी बहुसंख्यक समुदाय में भी देखी जा रही है,जो गलत है और इसकी कडी निंदा होनी चाहिये।
मैं विश्वास के साथ लिख रहा हूँ कि अगर कोर्ट के पूर्व फैसलों और विधि विशेषज्ञों की राय देखें तो धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत हिजाब पहनने की दलील कानूनी रूप से ज्यादा टिकती नजर नहीं आती।धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों में उन्हीं चीजों और रीति-रिवाजों को मान्यता दी जा सकती है जो धर्म का अभिन्न हिस्सा हों।विधि विशेषज्ञों की माने तो पहनावा धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं होता।काँलेज या स्कूल अथवा किसी संस्था में लागू ड्रेसकोड को धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ नहीं माना जा सकता।
आज जब इंसान चाँद-तारे पर जाने की बात कर रहा है उस समय इस तरह की दकयानूसी बातें कहाँ तक जायज हैं,सोचना होगा।आप स्कूल-काँलेज के बाहर हिजाब पहने,कोई रोके तब आप अपना विरोध दर्ज करा सकतीं हैं।पढ़ने वाली लड़कियों को अपना भला-बूरा स्वयं सोचना होगा।ईश्वर ऐसा न करें मगर इस मसले पर अगर साम्प्रदायिक तनाव फैला तो,यही माँ-बाप अपनी बच्चियों को काँलेज भेजना बंद कर देंगे।नुकसान तो उन बच्चियों का हीं तो होगा।माँ-बाप तो जाहिलों के चंगुल में आ हीं गए हैं।
आपको याद होगा साल 2012 में ईरान की महिला फुटबॉल टीम को ओलंपिक क्लालिफायर मुकाबले खेलने से रोक दिया गया था।ईरान की रूढिवादी सरकार ने ये फरमान सुनाया था कि सभी महिला खिलाडियों को सर और कान ढक कर फुटबॉल खेलना होगा।सुरक्षा की दृष्टि से फीफा ने 2007 में हीं सर और कान ढकने पर रोक लगा दी थी।अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद ईरान के कठमुल्ले टस से मस न हुए और फिर फीफा ने जार्डन की महिला फुटबॉल टीम को विजेता घोषित कर दिया था।आज ईरान की महिलाएं हिजाब फेंक कर इससे मुक्ति की आवाज उठा रहीं हैं और कमजोर हो चुकी ईरानी सरकार चुपचाप तमाशा देख रही है।
मुस्लिम लडकियों को इन कठमुल्लों के चंगुल से निकलना होगा और ये तभी संभव हो पाएगा जब वे उच्चशिक्षा प्राप्त कर सकेंगी।बुर्कापोश होने के लिए उम्र पडी है बेटा,अभी अपने व्यक्तित्व को निखारने का समय है,कुछ ऐसा कर गुजरने का समय है कि लोग आपको आपके नाम से याद करें।
हिजाब विवाद पर कर्नाटक हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है।कुछ लोगों को फैसले की बहुत जल्दी है,उन्हें अपनी राजनीतिक रोटियां जो सेकनी है मगर हाईकोर्ट ने अपने अगले आदेश तक शिक्षा संस्थानों में हिजाब न पहनने के आदेश को रद्द करने के आदेश को खारिज करने से इंकार कर दिया है।कोर्ट ने कहा है कि हम देखेंगे कि कब इसमें दखल देने का सही समय है।याचिकाकर्ताओं ने कर्नाटक हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट में याचिकाएं दायर की है।
हाँ एक बात और,एक लडकी जो हिजाब पहनकर काँलेज में जा रही थी,उसके खिलाफ जिस तरह से कुछ तथाकथित हिंदू संगठन के लडकों ने विरोध-प्रर्दशन किया वो कटु निंदनीय है।एक लडकी के पीछे इतने लडकों के विरोध को कहीं भी जायज नहीं ठहराया जा सकता।नियम के विरुद्ध कार्रवाई का अधिकार काँलेज प्रशासन का था,मगर आप तो आँन द स्पाट फैसला करने लगे थे।ये देश सभी का है और यहाँ कानून का राज है न कि तालिबान का।आपका इस तरह का विरोध गलत था।
देश कानून से चलेगा,न कि हमारी-आपकी इच्छा से,ये समझना होगा।मामला न्यायालय में है और फैसला आने तक सभी पक्षों का दायित्व है कि वे कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग करें।न्यायालय ने समय-समय पर बहुत से ऐतिहासिक निर्णय दिये हैं और देते रहेंगे,बस उसमें विश्वास बनाए रखने की जरूरत है।
अजय श्रीवास्तव



