15 अगस्त 1947,ब्रिटिश शासन से आजाद होकर भारत एक स्वतंत्र मुल्क बना मगर देश विभाजन की शर्त पर।ब्रिटिश शासन की फूट डालो और राज करो की नीति का दुष्परिणाम हमें मुल्क विभाजन के रूप में स्वीकार करना पड़ा।देश का विभाजन एकाएक नहीं हुआ,इसकी भूमिका 20 वीं सदी के प्रारंभ से हीं बनने लगी थी।मुगल साम्राज्य के पतन और देशी मुस्लिम रियासतों के दंतहीन होने के बाद सैकडों सालों से दबा-कुचला हिंदू समाज अब जाग्रत होने लगा था।बहुसंख्यक हिंदू समुदाय अपने देश में खुलकर जीने की तमन्ना पाल रखा था जो जायज भी था।सदियों की गुलामी सहने के बाद खासकर इस्लामिक शासकों के एकतरफा अत्याचार ने हिंदुओं के मन में मुसलमानों के खिलाफ नफरत भर दी थी।मुस्लिम समाज अब ये महसूस करने लगा था कि अब इस देश में वे सुरक्षित नहीं हैं।रोज के दंगों से परेशान होकर वो अपने लिए एक सुरक्षित क्षेत्र खोजने लगे थे,जिसकी परिणिति आगे चलकर देश विभाजन का मुख्य कारक बना।बंगाल और पंजाब जैसे बडे राज्यों में वे हिंदुओं के बराबर थे या थोडा-बहुत आगे पीछे थे मगर यहाँ वो बहुसंख्यक समुदाय पर भारी पड़ते थे।देश में कहीं भी दंगा-फसाद हो उसका सीधा असर इन राज्यों में दिखता था।
अब प्रश्न ये उठता है कि देश विभाजन के लिए क्या अकेले मुसलमान जिम्मेदार थे?या अन्य कारण भी थे।मेरे ख्याल से देश विभाजन का मुख्य कारण साम्प्रदायिक दंगों का अपने चरम पर होना था।दंगे इतने भयावह होते थे कि उसकी तपिश से समाज का तानाबाना खाक हो जाता था।20 वीं सदी के दंगे मुहल्लों की सरहद पार करके शहरों को निशाना बनाने लगे थे,थोडे हीं समय बाद यह राष्ट्रव्यापी शक्ल अख्तियार कर लेता था।पहले ये दंगे गाँवों में नहीं फैलते थे,वहाँ लोगों का सौहार्द और आपसी भाईचारा इतना मजबूत होता था कि वे एक दूसरे के लिए जान तक दे देते थे।मगर जब नफरतों ने तटबंध को तोडा तो सबकुछ बहा कर ले गया।शहरों में फैले दंगों को तो पुलिस कंट्रोल कर लेती थी मगर गाँव के दंगे तो बेलगाम हो जाते थे।
बंगाल विभाजन जो धर्म के आधार पर 19 जुलाई,1905 को तत्कालीन वायसरॉय कर्जन ने किया वो भी मुल्क के बंटवारे का एक आधार बना।ब्रिटिश शासन का मानना था कि अगर बंगाल को धर्म के आधार पर दो भागों में बांट दिया जाए तो दंगों में कमी आएगी और इतने बड़े राज्य का विकास भी सुचारू रूप से हो सकेगा।उन दिनों बंगाल का क्षेत्रफल फ्रांस के बराबर था मगर आबादी वहाँ से बहुत अधिक थी।बंगाल में हीं बिहार, उडीसा और पूर्वोत्तर के प्रदेश समाहित थे।ये भी सत्य है कि उन दिनों पूर्वी क्षेत्र की घोर उपेक्षा होती थी।वायसरॉय कर्जन का सोचना था कि बंगाल के दो टुकडे करने से पूर्वी क्षेत्र में बेहतर विकास के अवसर पैदा होंगे।स्कूल, काँलेज और अस्पताल जिसका उस क्षेत्र में घोर अभाव था,खोला जा सकेगा।मेरे ख्याल से यहाँ तक वे सही थे मगर धर्म के आधार पर विभाजन गलत था।हो सकता है कि वे ये सोचते हों कि मुस्लिम प्रदेश में अगर ज्यादातर मुसलमानों को बसा दिया जाए तो दंगें कम होंगे।
बंगाल विभाजन का पुरजोर विरोध हुआ।समाज के हर तबके में रोष व्याप्त था।हिंदुओं के अलावा मुसलमानों ने भी खूलकर विरोध किया मगर वे साध लिये गए।ढाका के नवाब ने पहले विरोध किया था पर जब बंगभंग हो गया तो वो इसके पक्ष में हो गए।अंग्रेजों ने ढाका के नवाब को बलपूर्वक, छलपूर्वक और लालच देकर अपने साथ मिला लिया।मुसलमानों को साधने के लिए बंगाल और आसाम के नवनियुक्त लेफ्टिनेंट गवर्नर जोजेफ बैमफील्ड ने कई जगह अपने भाषणों में कहा कि “हिंदू और मुसलमान उनकी दो बीबियाँ हैं,इनमें से मुसलमान उनकी चहेती हैं।उनकी बातों से हिंदू समाज में रोष व्याप्त हो गया और अब हिंदुओं के निशाने पर अंग्रेजों के बनिस्बत मुसलमान आ गए।
बंगभंग के परिणामस्वरूप देश भर में धरना-प्रर्दशन शुरू हो गए।कांग्रेस खूलकर सामने आ गई और उसने जबरदस्त विरोध किया।देशव्यापी विरोध से सन् 1911 में बंगाल विभाजन को रद्द कर पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्रों को फिर से एक कर दिया गया।मगर इसके ये गंभीर संदेश भी गए कि मुसलमान अपने लिए एक अलग क्षेत्र के बारे में सोचने लगे थे।जो बाद में देश विभाजन का एक महत्वपूर्ण कारण बना।
बंगाल विभाजन के बाद 1906 में “मुस्लिम लीग” की स्थापना हुई।मुस्लिम लीग से संबंधित नेताओं का सोचना था कि मुसलमानों को बहुसंख्यक हिंदुओं से कम अधिकार उपलब्ध हैं तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करती है न कि मुसलमानों का।मुस्लिम लीग के 1906 के अधिवेशन में जो प्रस्ताव पास हुए,उनमें से एक यह भी था कि बंगभंग मुसलमानों के लिए अच्छा है और जो लोग इसके विरुद्ध आंदोलन करते हैं,वे गलत काम करते हैं और मुसलमानों को नुकसान पहुँचाते हैं।मुस्लिम लीग के 1908 के अधिवेशन में यह भी प्रस्ताव पारित हुआ कि कांग्रेस ने बंगभंग के विरोध का जो प्रस्ताव रखा है,वह स्वीकृति के योग्य नहीं है।साफ था मुस्लिम लीग ने कांग्रेस के इतर अपना रास्ता चुन लिया था।
आपको बता दें सन् 1930 में हुए मुस्लिम लीग के एक महत्वपूर्ण सम्मेलन में प्रसिद्ध उर्दू कवि मुहम्मद इकबाल ने एक भाषण में पहली बार मुसलमानों के लिए एक अलग राज्य की मांग उठाई।ये पहला अवसर था जब किसी ने धर्म के आधार पर सार्वजनिक मंच से एक अलग राज्य की मांग उठाई थी।उन दिनों ये बहुत बडी बात थी मगर मुस्लिम लीग के सबसे बडे नेता मोहम्मद अली जिन्ना इस बात से सहमत नहीं थे।1935 में सिंध प्रांत की विधानसभा ने भी यही मांग उठाई।जिन्ना को मुसलमानों के लिए एक अलग राज्य पर सहमत कराने का जिम्मा मुहम्मद इकबाल और मुहम्मद अली जिन्ना को सौंपा गया।थोडे से प्रयास में वे सफल भी रहे।अभी तक जिन्ना हिंदू-मुस्लिम एकता के लंबरदार थे मगर अब वो सार्वजनिक मंचों से कांग्रेस पर ये आरोप लगाने शुरू कर दिये थे कि कांग्रेस मुसलमानों के हितों की रक्षा करने में नाकाम साबित हुईं है।
अब बात करते हैं सन् 1940 में हुये लाहौर मुस्लिम लीग सम्मेलन की।इस सम्मेलन में तकरीर करते हुए मोहम्मद अली जिन्ना ने साफ कहा कि मुसलमानों को अलग राष्ट्र चाहिए, वो इससे कम पर समझौता करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं।लाहौर अधिवेशन में लाहौर प्रस्ताव(कारादाद-ए-लाहौर)नाम से मशहूर इस प्रस्ताव को पेश किया गया।इस प्रस्ताव में भारत के मुस्लिम बहुल इलाकों को मिलाकर एक देश “पाकिस्तान” बनाने की मांग रखी गई।चौधरी रहमत अली ने हीं मुसलमानों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान के नाम की परिकल्पना जनवरी 1933 में प्रकाशित एक पर्चे में की थी,जिसे लाहौर सम्मेलन में पेश किया गया था।
कांग्रेस ने जिन्ना की मांग का पुरजोर विरोध किया।हिंदू महासभा और अन्य हिंदूवादी संगठनों को देश विभाजन कतई मंजूर नहीं था।वे जिन्ना और मुसलमानों के खिलाफ आग उगलने लगे थे।इससे पहले मुसलमान अपनी स्थिति को लेकर तब और आक्रामक हो गए जब सन् 1929 में मोतीलाल नेहरू कमेटी ने अन्य बातों के अलावा ये भी कहा कि सेंट्रल एसेम्बली में मुसलमानों के लिए 33% सीटें आरक्षित होनी चाहिए।कांग्रेस के अंदर उग्र हिंदूवादी नेताओं ने इसका जमकर विरोध किया।हिंदू महासभा ने इसे मानने से साफ इंकार कर दिया था।हिंदू महासभा और उससे संबंधित अन्य संगठनों ने कांग्रेस पर तुष्टिकरण का आरोप लगाया।
कांग्रेस के अंदर और बाहर बहुत से ऐसे नेता थे जो मुसलमानों का सार्वजनिक विरोध करते थे।वे केवल मुसलमानों को अलग से कोई भी रियायत देने के पक्षधर नहीं थे।कांग्रेस के भीतर के हिंदूवादी और हिंदू महासभा के नेता भारत माता, मातृभूमि और गोमाता की बात करते थे वो मुसलमानों को पसंद नहीं था।मुसलमान महसूस करने लगे थे कि बहुसंख्यकों का वर्चस्व बढ़ रहा है और वे हाशिये पर डाले जा रहें हैं।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन बेहद कमजोर हो गया था और उन्होंने तय किया कि वो भारत को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दे देगा।माउंटबेटन को इसीलिए भारत भेजा गया।लार्ड माउंटबेटन ने भारत पहुँचते हीं सभी पक्षों से बातचीत शुरू कर दी।गाँधीजी और कांग्रेस किसी भी हालत में मुल्क का बंटवारा नहीं चाहते थे,जबकि मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग धर्म के आधार पर देश विभाजन पर अडिग थे।ब्रितानी हुकूमत पर दवाब डालने के लिए जिन्ना ने 16 अगस्त,1946 के दिन “डायरेक्ट एक्शन डे” का ऐलान किया।जिन्ना अंग्रेजों को ये दिखाना चाहते थे कि देश के मुसलमान उनके साथ हैं और वे अपने लिए एक अलग देश चाहते हैं।डायरेक्ट एक्शन डे पर दोनों तरफ से झपड़ होने लगी और उसी रात बंगाल में दंगा शुरू हो गया।ये दंगा छह दिनों तक चला और हजारों लोगों की मौत हुई।जिन्ना अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब रहे।गवर्नर सर फ्रेडरिक बरो और लेफ्टिनेंट जनरल सर फ्रांसिस टकर ने बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी पर सीधे इल्जाम लगाया कि डायरेक्ट एक्शन के लिए पुलिस को एक दिन की छुट्टी दी थी।
इस दंगे के ठीक एक साल बाद नोआखाली में भीषण दंगा शुरू हुआ।इस दंगे ने मुस्लिम लीग के विभाजन की माँग पर मुहर लगा दी।बंगाल का नोआखाली मुस्लिम बाहुल्य ऐरिया,जहाँ एक साजिश के तहत लक्ष्मी पूजा के दिन दंगा शुरू किया गया।06 सितंबर,1946 के दिन विवादास्पद मौलाना गुलाम सरवर हुसैन को मुस्लिम लीग ज्वाइन करवाया जाता है और वह अगले हीं दिन 07 सितंबर को शाहपुर बाजार में मुसलमानों को हिंदुओं का कत्लेआम करने का आह्वान करता है।वह लाउडस्पीकर पर सभी मुसलमानों को कहता है कि हर मुसलमान हथियार उठाएगा और किसी भी हालत में हिंदुओं को छोडा नहीं जाएगा।दंगा शुरू करने के लिए 12 अक्टूबर का दिन तय किया गया।दहशत का ये आलम था कि गुलाम सरवर हुसैन की बातों को सुनकर नोआखाली के जिला मजिस्ट्रेट जिन्हें 12 अक्टूबर को छुट्टी पर जाना था, वो 10 अक्टूबर को हीं जिला छोड देते हैं वो भी बिना सूचना के।
12 अक्टूबर को दंगा शुरू हो जाता है।जिले के मानिंद हिंदुओं को उनके घरों से निकालकर बेरहमी से कत्ल कर दिया जाता है।नरसंहार के अलावा हिंदू औरतों के साथ जबरन बलात्कार,अपहरण, धर्म परिवर्तन कर जबर्दस्ती निकाह करवाया जाता है।इस नरसंहार में तकरीबन पाँच हजार से अधिक हिंदू मारे जाते हैं और लगभग पचास हजार से ऊपर शर्णार्थियों को कोमिला, चाँदपुर, अगरतल्ला और अन्य स्थानों के अस्थायी राहत शिविरों में आश्रय दिया जाता है।19 अक्टूबर,1946 को ब्रिटिश-भारतीय सेना को नोआखाली भेजा जाता है।सेना को सही जगह पहुँचने में और एक हफ्ते और निकल जाते हैं,तब तक दरिंदों की दरिंदगी अपने चरम पर पहुंच जाती है।
दंगों को रोकने में बंगाल के मुख्यमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी की भूमिका बेहद निंदनीय थी।सुहरावर्दी अपने आका जिन्ना के आदेश का पालन कर रहा था।
07 नवंबर,1946 को गाँधीजी ने दंगाग्रस्त इलाकों का दौरा किया।गाँधीजी ने हिंदुओं के जख्म पर लाख मरहम लगाने की कोशिश की मगर वो नाकामयाब हीं रहे।गाँधीजी चाहते थे कि हिंदू अपने गाँव-घर लौट जाएं मगर शरणार्थी इसके लिए तैयार नहीं थे।लाख समझाने के बाद जब पीडित गाँव लौटने के लिए तैयार नहीं हुए थे तो 02 मार्च,1947 को गाँधीजी ने नोआखाली छोड दिया।
नोआखाली दंगे ने ये तय कर दिया था कि अब मुल्क का विभाजन अपरिहार्य है।इस दंगे के बाद गाँधीजी के भी सुर नर्म पड गए थे।
माउंटबेटन ने भारत के विभाजन का मसौदा पेश किया जिसे सभी ने स्वीकार कर लिया।15 अगस्त 1947 की आधी रात को भारत ब्रिटिश हुकूमत से आजाद तो हो गया लेकिन द्विराष्ट्र के सिद्धांत पर।अंग्रेजों ने भारत को खंडित कर दो राष्ट्र बना दिया।भारत का विभाजन माउंटबेटन योजना, भारतीय स्वत्रंता अधिनियम 1947 के आधार पर किया गया।
सरहदें बटने के साथ दोनों कौमों के लोगों की भावनाएँ भी बंट गई।सैकडों सालों का भाईचारा खत्म हो गया था।अब लोगों की पहचान उसके धर्म से होने लगी थी।मुसलमान चाहते थे कि पाकिस्तान में रह रहे सभी हिंदू और सिख भारत चले जाएं,दवाब बनाने के लिए पाकिस्तान के हर शहर में हिंदू और सिखों के खिलाफ मारकर शुरू हो गई।
हिंदू-सिख लड़कियों और औरतों का अपहरण होने लगा।बलात्कार के बाद हत्या या धर्मांतरण आम बात हो गई थी।हिंदू-सिख परिवार पाकिस्तान में अपनी जमीन-जायदाद और बिजनेस छोड़कर भागने लगे मगर ट्रेनें रूकवाकर उन्हें मार दिया जाता था।पाकिस्तान से रक्तरंजित ट्रेन भारत पहुँचतीं थी यहाँ भी कडी प्रतिक्रिया होने लगी।दोनों तरफ से ट्रेनों में विरोधी धर्म-सम्प्रदाय के लोगों की हत्या कर एक दूसरे के देश को भेजा जाने लगा।पाकिस्तानी पंजाब में जहाँ मुस्लिम आबादी सिखों और हिंदुओं से बहुत ज्यादा थी,वहाँ ऐसा कत्लेआम मचा कि इंसानियत भी शरमा गई।मार्च 1947,रावलपिंडी में दंगा भडक उठा था जिसकी तपिश पंजाब तक महसूस की गई।
थोहा खालसा के गाँव में हिंदू-सिख औरतें दंगाइयों से अपनी इज्ज़त बचाने के लिए कुएँ में छलांग लगाकर मर गई थीं।उन्होंने अपहरण,बलात्कार और जबरन धर्मांतरण से बचने के लिए सामुहिक आत्महत्या का मार्ग चुना।इस घटना से सिख-हिंदू समाज में काफी रोष था।थोडे दिनों बाद जवाहरलाल नेहरू ने खुद इस इलाके का दौरा किया और संत गुलाब सिंह की हवेली में लाशों से भरे इस कुएँ को भी देखा।औरतों के साथ यह सलूक मध्यकालीन समय के विदेशी हमलावरों जैसा था लेकिन इस बार जुल्म करनेवाले पंजाब की सरजमीं के अपने वाशिंदे थे।
ये विभाजन भूमि के साथ साथ लोगों की भावनाओं का भी कर गया।बंटवारा चाहे सरहद का हो या घर का,हमेशा दर्दनाक होता है।इस दौरान यह अनुमान लगाया जाता है कि करीब 25,000 से 29,000 हिंदू और सिख महिलाओं और 12,000 से 15,000 मुस्लिम महिलाएँ अपहरण, बलात्कार,जबरजस्ती धर्मांतरण और हत्या का शिकार हुईं।
देश विभाजन के लिए हम “मुस्लिम लीग” और जिन्ना को आसानी से जिम्मेदार ठहराते हैं,जो काफी हद तक सही भी है मगर पूरा सच नहीं।देश विभाजन में साम्प्रदायिक दंगों का काफी बडा हाथ था और मैं तो यही समझता हूँ कि ये कारण अन्य सभी कारणों में सबसे ज्यादा असरदार था।विभाजन के समय मुसलमानों की आबादी बहुसंख्यक आबादी की तुलना में काफी कम थी।दंगों में 80% जानें मुसलमानों की हीं जाती थी मगर मुस्लिम बहुल इलाकों में ये आंकड़ा उल्टा हो जाता था।दंगों में उनके घर और संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया जाता था,जिससे उनके मन में एक अलग देश की भावना प्रबल हुईं थी।कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व मुसलमानों को ये समझाने में बिल्कुल नाकाम रहा कि बंटवारा किसी के लिए ठीक नहीं है।अगर शीर्ष नेतृत्व सशक्त होता तो वह मुस्लिम लीग को बनने हीं नहीं देता।
15 अगस्त,1947 को हमें आजादी जरूर मिली मगर द्विराष्ट्र के सिद्धांत पर।हमें अपने शरीर के एक अंग को जिसमें सड़न आ गई थी, शल्य चिकित्सा कर निकालना पडा।ये कितना सही या गलत था, इसका फैसला करना तो बेहद कठिन है।सभी के अपने-अपने विचार हैं अपनी-अपनी सोच है मगर जो विभाजन के आड में हुआ वो सर्वथा गलत था।इतिहास इसके लिए हमें (भारत और पाकिस्तान) कभी माफ नहीं करेगा।
अजय श्रीवास्तव




