महाराष्ट्र बीजेपी ने विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र विनायक दामोदर सावरकर को मरणोपरांत “भारतरत्न” दिलाने का संकल्प लिया है।भाजपा ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए जारी किए गए संकल्प पत्र में यह ऐलान किया है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महाराष्ट्र के अकोला में एक चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि “ये वीर सावरकर के हीं संस्कार हैं जो राष्ट्रवाद को हमने राष्ट्रनिर्माण के मूल में रखा है।”
प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि एक तरफ सावरकर के संस्कार हैं और दूसरी तरफ ऐसे लोग हैं जिन्होंने बाबा साहेब अंबेडकर का कदम कदम पे अपमान किया है,उन्हें भारतरत्न से वंचित रखा है।ये वो लोग हैं जो वीर सावरकर को आए दिन गालियां देते हैं,उनका अपमान करते हैं।
प्रधानमंत्री के संबोधन के बाद कांग्रेस पार्टी की तरफ से कडी प्रतिक्रिया व्यक्त की गई।पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा कि मैं हैरान हूँ कि एक तरफ बीजेपी महात्मा गांधी की प्रशंसा कर रही है और दूसरी तरफ सावरकर के लिए भारतरत्न की मांग कर रही है।
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सावरकर पर पार्टी के रूख में परिवर्तन के संकेत दिए हैं।मनमोहन सिंह ने कहा कि पार्टी सावरकर को भारतरत्न देने के खिलाफ नहीं है, इस मामले में फैसला लेने वाली समिति हीं ये तय करेगी कि सावरकर को भारतरत्न दिया जाय या नहीं।उन्होंने याद दिलाया कि इंदिरा गांधी ने भी सावरकर की याद में पोस्टल स्टांप जारी किया था।हम सावरकर के खिलाफ नहीं हैं, हम उस हिंदुत्व की विचारधारा के पक्ष में नहीं हैं,जिसकी सावरकर वकालत करते थे।
सावरकर पर बहस जारी है और ये तो तय है कि सावरकर को केंद्र सरकार ने भारतरत्न देने का मन बना लिया है।विधानसभा चुनावों से पहले इस मुद्दे को गरमाकर राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास किया जा रहा है।दरअसल बीजेपी अच्छी तरह ये समझ गई है कि विकास के मुद्दे पर उसे वोट मिलने से रहा।छद्म राष्ट्रवाद हीं एक ऐसा मुद्दा है जो हिंदू वोटों को इकठ्ठा कर सकता है और इसी कारण ये कवायद चल रही है।बीजेपी अपने सभी सीनियर लीडरों से सावरकर के पक्ष में बयान दिलवा रही है।
केन्द्रीय गृहमंत्री और नरेंद्र मोदी के दाहिने हाथ अमित शाह ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित एक व्याख्यान में कहा कि अगर वीर सावरकर न होते तो 1857 का विद्रोह इतिहास नहीं बन पाता, हमने इसे अंग्रेजों के दृष्टिकोण से देखा होगा।वीर सावरकर ने हीं 1857 के विद्रोह का नामकरण किया था।उन्होंने उस विद्रोह को पहला स्वत्रंता संग्राम का नाम दिया था। देश में दो सौ व्यक्तित्व हैं,25 साम्राज्य हैं,जिन्होंने विद्या दी।अंग्रेजों के जाने के बाद इतिहासकारों के साथ नए दृष्टिकोण से लिखने की जरूरत है।नया जो लिखा जाएगा, वह लंबा चलेगा।
अब प्रश्न ये उठता है कि अगर सावरकर इतने वीर थे और महान स्वत्रंत्रता सेनानी थे तो इतने सालों तक उपेक्षित क्यों रहे?क्या ब्रिटिश और वामपंथी इतिहासकारों ने उनके साथ अन्याय किया है?ये सारे वो ज्वलंत प्रश्न है जिसका सही उत्तर खोजना बाकी है।दक्षिणपंथी विचारधारा से इतर अभी तक लोगों को यही पता है कि उन्होंने अंग्रेजों से जेलयात्रा के दौरान कई बार माफी मांगी थी।स्वत्रंत्रता आंदोलन के दौरान कई राष्ट्रवादी गिरफ्तार किए गए और ब्रिटिश शासन ने उन्हें लंबे समय तक जेल में डाल दिया।जेल में सजा काटने के दौरान अंग्रेज जेलर उन्हें तरह तरह से प्रताड़ित करते थे और उन्हें ये प्रस्ताव देते थे कि वे हुकूमत से माफ मांग कर बरी हो जाएं, नहीं तो पूरी जिंदगी कालकोठरी में काटनी होगी।कई राष्ट्रवादियों ने पुलिस प्रताडऩा से आजिज आकर माफीनामा दे दिया था, उसमें एक विनायक दामोदर सावरकर भी थे।लोग प्रश्न उठाते हैं कि जिस व्यक्ति ने रिहाई के बदले अंग्रेजों की प्रभुसत्ता को स्वीकार कर लिया हो वो वीर कैसे हो सकता है?उन दिनों भगत सिंह,बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान,राजगुरु, खुदीराम बोस जैसे बहुत से क्रांतिकारी सहर्ष फांसी के फंदे पर झूल गए।चंद्रशेखर आजाद ने ब्रिटिश शासन के सिपाहियों से घिरने के बाद भी सरेंडर नहीं किया और मौत को गले लगा लिया था।ऐसे में ये प्रश्न वाजिब है कि उन्हें कैसे वीर कहा जाए?
महात्मा गांधी के हत्या के षड्यंत्र में जो शामिल रहा हो उसे कैसे बीजेपी सरकार भारतरत्न दे सकती है, ये कुछ प्रश्न हैं जिनके जवाब हमें खोजने हैं।सावरकर की जिंदगी का मूल्यांकन मैं दो कालखंड में करना चाहता हूँ, पहला जब वो गिरफ्तार नहीं किए गए थे।दूसरा जब उन्हें कालापानी की सजा हुई और उसके बाद उनकी मृत्यु तक।
विनायक दामोदर सावरकर काँलेज के दिनों से हीं अंग्रेजों की खिलाफत करने लगे थे।अपने राजनीतिक विचारों के लिए सावरकर को पूणे के फरग्यूसन काँलेज से निष्कासित कर दिया गया था।मगर वे डरे नहीं उन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ अलख जगाए रखा।सावरकर अपनी पढाई के दौरान “मित्र मेला” नाम की एक गोपनीय संगठन से जुडे थे,आगे चलकर इस संगठन का नाम “अभिनव भारत” कर दिया गया।इस संगठन का उद्देश्य ब्रिटिश हुकूमत को बंदूक के दम पर देश के बाहर खदेड़ देना था।सावरकर के बड़े भाई गणेश इस संगठन के वरिष्ठ सदस्य थे।गणेश को पुलिस ने हुकूमत के खिलाफ बगावत करने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया और 08 जून 1909 को उन्हें उम्रकैद की सजा मुकर्रर की गई।अभिनव भारत संगठन ने इसका बदला लेने का संकल्प किया।
29 दिसंबर,1909 को नासिक जिले के कलेक्टर जैक्सन को गोली मारकर हत्या कर दी जाती है।इस घटना को अंजाम 18 वर्षीय अनंत लक्ष्मण कन्हेरे ने दिया था।हत्याकांड के कुछ हीं दिनों बाद कन्हेरे को पुलिस गिरफ्तार कर लेती है और उसके पास से बहुत सी चिठ्ठियाँ बरामद होती है।इन चिठ्ठियों में सावरकर का भी वो पत्र होता है जिसमें हत्याकांड की साजिश रची गई थी।सावरकर ने हीं कन्हेरे को लंदन से पिस्टल भेजा था जिससे हत्या की गई थी।उन दिनों सावरकर लंदन में पढ़ रहे थे और वहीं से पिस्टल भारत भेजते थे।जाँच में पता चला कि सावरकर ने लंदन से बीस पिस्टल भारत भेजे थे।ब्रिटिश हुकूमत ने सावरकर को गिरफ्तार करने का आदेश जारी किया और सावरकर को विक्टोरिया स्टेशन पर पकड लिया गया।
सावरकर को गिरफ्तार कर पानी के जहाज एसएस मौर्य से भारत लाया गया।कहते हैं कि जब जहाज बंदरगाह के पास पहुँचीं तो सावरकर समुद्र में कूद गए और तैरकर तट पार गए।सिपाहियों ने फायरिंग भी की मगर वे नहीं रूके।लगभग नंगधडंग सावरकर भागते हुए एक पुलिसकर्मी से कहा कि मुझे राजनीतिक शरण चाहिए और मुझे मजिस्ट्रेट के पास ले चलो,तभी उनका पीछा करते हुए सिपाहियों ने चोर चोर का शोर मचाना शुरू कर दिया और वे गिरफ्तार हो गए।
जैक्सन की हत्या में शामिल होने और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जंग छेड़ने के आरोप में सावरकर को पचास पचास साल की दो सजाएं हुई और उन्हें 04 जुलाई,1911 को अंडमान स्थित पोर्ट ब्लेयर सेल्युलर जेल भेज दिया गया।यहीं से हम सावरकर के दूसरे कालखंड का मूल्यांकन शुरू कर सकते हैं।
सेल्युलर जेल में जिंदगी बेहद कठिन थी,कैदियों पर तरह तरह के जुल्म किये जाते थे।उन दिनों अंग्रेज जेलर बग्घियों पर चलते थे,बग्घियों को खीचने के लिए कैदियों को लगाया जाता था।पहाडी और उबडखाबड रास्ते पर बग्घी खिंचना बेहद कठिन था।कैदियों के पाँव में फफोले पड़ जाते थे,बेहतर खुराक के अभाव में कैदी बेहद कमजोर हो चुके थे।जब वे बग्घी ठीक से खींच नहीं पाते थे तो अंग्रेज उन्हें कोडों से पीटते थे।पोर्ट ब्लेयर में मलेरिया मच्छरों का बेहद आतंंक था,कैदियों को मलेरिया होने पर कुनैन की कड़वी गोली दी जाती थी जो बेहद गर्म होती थी।कैदी उसे पचा नहीं पाते थे,मलेरिया बुखार की वजह से महीने में दो चार कैदियों की मौतें भी हो जाती थी।बीमार कैदी अपने बैरक में हीं उल्टी, टट्टी कर देता था जिससे भयंकर दुर्गंध उत्पन्न हो जाती थी जिसमें किसी का भी रहना मुश्किल होता था।अंग्रेज जेलरों ने लेट्रिन जाने का समय निश्चित कर रखा था,उसके पहले या बाद मलमूत्र त्याग कमरे में हीं करना पड़ता था।जहाँ फाँसी लगाई जाती थी वह ग्राउंड फ्लोर पर हीं था,जब कैदी को फाँसी पर लटकाने के लिए ले जाया जाता था उस समय उसके रोने से कैदी बेहद भयभीत हो जाते थे।
इन सब घटनाओं ने सावरकर के मनमतिष्क में डर पैदा कर दिया।थोडे दिनों में हीं उनकी सहनशक्ति जवाब दे गई और 29 अगस्त,1911 को सावरकर ने अपना पहला माफीनामा लिखा।लगभग डेढ़ महीने के अंदर वीर सावरकर अंग्रेजों के आगे सरेंडर कर दिया था।सावरकर नौ साल दस महीने सेल्युलर जेल में रहे और इस बीच उन्होंने छह बार अंग्रेजों को लिखित माफीनामा दिया।
सावरकर कैदियों को अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन करने के लिए भड़काते रहते मगर वो कभी भी खुलकर सामने नहीं आते।दरअसल जेलर बैरी ने सावरकर को बहुत तरह की रियायतें दे रखी थी,जिसे वो किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहते थे।
सावरकर ने अपने माफीनामे में लिखा था कि सरकार उनके ऊपर दया करे,उन्हें किसी भी भारतीय जेल में भेज दिया जाए।इसके बदले में वो किसी भी हैसियत में सरकार के लिए काम करने के लिए तैयार थे।एक पत्र में सावरकर ने लिखा है अंग्रेजों द्वारा उठाए गए कदमों से उनकी संवैधानिक व्यवस्था में आस्था पैदा हुई है और उन्होंने अब हिंसा का रास्ता छोड दिया है।
बार बार ब्रिटिश शासन में आस्था दिखाने की एवज में सावरकर को दो दिनों के लिए अपनी पत्नी और भाई से मिलने का मौका दिया गया, जबकि कालापानी जेल के कानून के अनुसार ये प्रतिबंधित था।
14 नवंबर,1913 को दायर याचिका में उन्होंने लिखा था कि “सर्वशक्तिमान ही अकेला है जो किसी को दया दे सकता है और इसलिए एक बेटा अपने पिता समान सरकार के दरवाजे पर भला न जाए तो कहाँ जाए?सावरकर के लगातार माफीनामे देने से ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें सशर्त माफी दे दी।1921 में सावरकर को पुणे के यरवदा जेल में लाया गया और उनसे ये लिखित में लिया गया कि वे रत्नागिरी में हीं सीमित रहेंगे।हुकूमत के बिना इजाजत वह जिले से बाहर नहीं जा सकते और किसी भी राजनीतिक गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे।सावरकर ने ताउम्र अंग्रेजों के इस आदेश का पालन किया।
तथाकथित वीर जिसे बाद में वीर सावरकर के नाम से पुकारा गया, उनका हाथ गाँधीजी की हत्या के षड्यंत्र में उजागर हुआ।30 जनवरी,1948 को नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी और जाँच के बाद 05 फरवरी,1948 को आजाद भारत की पुलिस ने सावरकर को महात्मा गांधी की हत्या का षड्यंत्र रचने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।गिरफ्तारी के सात दिन बाद सावरकर ने बांबे पुलिस कमिश्नर को एक खत लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि “यदि मुझे सशर्त रिहा कर दिया जाता है तो मैं किसी भी सांप्रदायिक या राजनीतिक गतिविधि से बचना चाहूँगा।”
महात्मा गांधी की हत्या में कुल आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया था जिसमें सावरकर भी थे।अन्य लोगों में नाथूराम गोडसे, गोपाल गोडसे, नारायण आप्टे, विष्णु करकरे, मदनलाल पाहवा, शंकर किस्तैया और दत्ताराया पर्चुरे थे।नौवें सदस्य दिगंबर आर बडगे सरकारी गवाह बन गए।
दिगंबर बडगे ने सभी साजिशों का खुलासा कर दिया।सरकारी गवाह ने बताया कि हत्या से पहले गोडसे और आप्टे बांबे स्थित सावरकर के घर गए थे।दोनों की पहली बैठक 14 जनवरी को हुई।बडके ने बताया कि उन्हें अंदर जाने से रोक दिया गया।मीटिंग के बाद जब बडगे ने सावरकर को मराठी में यह कहते हुए सुना कि “विजयी होकर लौटो”।
बताते हैं कि ट्रायल कोर्ट के जज आत्माराम ने भी माना था कि बडगे की बातों में सच्चाई है।कपूर आयोग ने भी कहा था कि सबूत के अभाव में हम सावरकर को छोड़ रहें हैं मगर इनकी भूमिका संदिग्ध है।सबूत के अभाव में वो बरी तो हो गए मगर इस हत्या का दाग उनके दामन पर मृत्यु तक बना रहा।
अब ये फैसला देश की जनता को करना है कि सावरकर वाकई वीर थे या माफीबाज थे।
अजय श्रीवास्तव
संपादक, परिधि समाचार



