नेताजी सुभाषचंद्र बोस की 125 वीं जयंती की पूर्वसंध्या पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करते हुए लिखा,”ऐसे समय में जब पूरा देश नेताजी सुभाषचंद्र बोस की 125 वीं जयंती मना रहा है,मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि ग्रेनाइट से बनी उनकी भव्य प्रतिमा इंड़िया गेट पर लगाई जाएगी।यह उनके प्रति भारत के ऋणी होने का प्रतीक होगा।”
प्रधानमंत्री के ट्वीट से देशवासियों को ये पता चला कि सरकार नेताजी के सम्मान में कुछ बडा करने जा रही है।प्रधानमंत्री ने इंडिया गेट पर हुए एक भव्य कार्यक्रम में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की डिजिटल मूर्ति का उद्घाटन किया और कहा कि हमारी सरकार जननायकों का उचित सम्मान करना जारी रखेगी जो कांग्रेस शासनकाल में नहीं हो पाया था।
इंडिया गेट पर लगाई जानेवाली मूर्ति नेताजी की अन्य किसी भी मूर्ति से ऊंची होगी।इसके लिए तेलंगाना से जेड ब्लैक ग्रेनाइट पत्थर लाया गया है।नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय के महानिदेशक अद्वैत गडनायक ने कहा है कि राष्ट्रीय राजधानी में इंडिया गेट पर लगाये जानेवाली सुभाषचंद बोस की प्रस्तावित प्रतिमा 25 फुट ऊंची होगी और ग्रेनाइट पत्थर से बनेगी।मूर्तिकार अद्वैत गडनायक ने कहा कि सरकार ने मूर्ति बनाने के लिए मुझे चुना है ये मेरे लिए सम्मान की बात है।इसका डिजाइन संस्कृति मंत्रालय ने तैयार किया है।आपको बताते हुए खुशी हो रही है कि मूर्ति पर काम शुरू हो गया है।
आपको बता दें इस कार्य की रूपरेखा तीन महीने पहले हीं तैयार कर ली गई थी।प्रधानमंत्री ने स्वयं मूर्ति की डिजाइन को मंजूरी दी थी।प्रधानमंत्री जिस भी काम को करते हैं उसमें परफेक्शन चाहते हैं और सदैव इसकी निगरानी भी उनके द्वारा किया जाता है।
मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस बात से इत्तेफाक रखता हूँ कि आजादी के बाद कांग्रेस शासन में नेताजी सुभाषचंद्र बोस को वो सम्मान नहीं मिला जिसके वो वास्तविक हकदार थे।आपको याद होगा सुभाष बाबू कांग्रेस के निर्वाचित अध्यक्ष थे मगर गांधीजी से वैचारिक मतभेद होने के बाद उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के प्रतिष्ठित पद से इस्तीफा दे दिया था।वे चाहते तो गांधीजी का विरोध कर सकते थे मगर उन्होंने बडे लक्ष्य को प्राथमिकता दिया।वे महात्मा गांधी का बेहद सम्मान करते थे,ये इस उदाहरण से स्पष्ट हो गया था।उन्होंने 06 जुलाई 1944 को रंगून रेड़ियो स्टेशन से महात्मा गांधी के नाम एक प्रसारण जारी किया,जिसमें उन्होंने इस निर्णायक युद्ध में विजय के लिए उनका आशीर्वाद और शुभकामनाएं मांगी।
सुभाषचंद्र बोस को ये समझ में आ गया था कि देश की आजादी इतनी आसानी से और गांधीजी के अहिंसक रास्ते पर चलकर हासिल नहीं हो सकती।इसलिए उन्होंने आजाद हिंद फौज का गठन किया,जो अंग्रेजों से सशस्त्र संघर्ष के लिए हमेशा तैयार रहते थे।सुभाषचंद्र बोस ने देशवासियों से आह्वान किया था कि “तुम मुझे खुन दो,मैं तुम्हें आजादी दूंगा।”
आजादी के महासंग्राम में सभी ने आहूति दी थी।किसी के योगदान को कमतर आंकना गलत होगा।कांग्रेस ने हमेशा अपने अलावा दूसरी विचारधारा को तिरस्कृत किया।सुभाषबाबू को उचित सम्मान मिलना चाहिए था।आज अगर नरेंद्र मोदी वो सब कर रहें हैं जो आज से 70 साल पहले करना था तो इसमें बुराई क्या?सभी को प्रधानमंत्री के इस निर्णय का सम्मान करना चाहिए।
अगर विरोध करना है तो अमर जवान ज्योति के लौ को बुझाने का विरोध करना चाहिए और खुब डटकर करना चाहिए।प्रधानमंत्री के तुगलकी फरमान से अमर जवान ज्योति जो शहीदों की याद में पचास वर्षों से जल रही थी,बुझा दिया गया या यूं कहें कि इस लौ को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक की लौ में विलय कर दिया गया है।जनादेश का मतलब ये नहीं होता जो आप कर रहें हैं।पूराने चिन्हों को संजोए रखना चाहिए,न कि अपने को सुपीरियर दिखाने के चक्कर में उसे नष्ट कर देना चाहिए।आप एक लौ राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर भी जलवा सकते थे मगर दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के झगडों में देश के धरोहरों का नुकसान हो रहा है ये समझना होगा।
प्रधानमंत्री जी आप भी कमोबेश वही गलती कर रहें हैं जो अतीत में कांग्रेस के लोगों द्वारा किया गया है।राजनीति में जब विद्वेष चरम पर आ जाती है तब लडाई सतही हो जाती है और अब ऐसा हीं हो रहा है।राजनीति में परसेप्शन की बात होती है और यह ये बन रहा है कि नरेंद्र मोदी सरकार कांग्रेस द्वारा किये गए सभी कार्यों को बदलना चाहती है,जो सही नहीं है।राजनीति में सत्ता तो आती-जाती रहती है मगर इतिहास नेताओं द्वारा किये गए कार्यों का मूल्यांकन करता है कि वह कैसा था और किस मकसद से किया गया था।
नेहरू-गांधी परिवार ने अपने शासन के दौरान असंख्य परियोजनाओं का नाम नेहरू,इंदिरा गांधी,संजय गांधी और राजीव गांधी के नाम पर रखा जो गलत था।विभिन्न कालखंड में देश के लिए जान कुर्बान करनेवालों के नाम का भी उपयोग करना चाहिए था मगर कांग्रेस के जमाने में ये कम हीं हुआ।
किसी भी सरकार को दुर्भावना रहित काम करना चाहिए,जो हो चुका है वो इतिहास बन चुका है।इतिहास को बदलने की नाकाम कोशिश न करें,नहीं तो यही इतिहास आपको माफ नहीं करेगा।अतीत में जब आपके कार्यों का मूल्यांकन होगा तो आपका वजूद,वर्षों एकत्र की गई शोहरत दाव पर लग सकती है।
अजय श्रीवास्तव



