जब हम हिन्दी साहित्य में कहानियों और उपन्यासों की बात करते है तो सबसे पहले जिस लेखक का नाम ज़ेहन में आता है वह हैं प्रेमचंद। भले ही श्रीनिवास दास द्वारा लिखी परीक्षा गुरु को हिंदी का पहला उपन्यास कहा जाता है लेकिन असल में हिंदी उपन्यास और साहित्य लेखन में क्रांति प्रेमचंद की लेखनी के बाद ही आई, और इसलिए प्रेमचंद को हिंदी कहानी के इतिहास और उपन्यास के शिखर पुरुष के रूप में जाना जाता है। उन्होंने हिंदी उपन्यासों और कहानियों की कर्मभूमि ही नहीं बदली उनका कायाकल्प भी कर दिया, और हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इनकी कहानियों और उपन्यासों को पढ़ने के बाद लोग साहित्य को केवल मनोरंजन के रूप में नहीं देख रहे थे बल्कि उससे शिक्षा भी ले रहे थे।
प्रेमचंद ने 1907 में अपनी पहली कहानी ‘संसार का सबसे अनमोल रतन’ लिखा जो उर्दू की पत्रिका जमाना में छपी। यह वह दौर था जब किशोरी लाल गोस्वामी, माधवराव सप्रे, बंग महिला तथा आचार्य शुक्ल हिंदी कहानी के क्षेत्र में आरंभिक प्रयोग कर रहे थे किंतु हिंदी कहानी अपने शैशव काल में ही थी, उसमे क्रांति लाने का काम प्रेमचंद ने किया। प्रेमचंद ने अपने 30 वर्ष के रचनाकाल में लगभग 300 कहानी लिखीं जिन्हें बाद में मानसरोवर के आठ खंडो में संकलित किया गया। यदि हम एक वाक्य में कहें तो प्रेमचंद का आगमन हिंदी कहानी के इतिहास में विकास का एक चरण मात्रा न होकर एक लिप या छलांग की तरह है।
प्रारंभ में प्रेमचंद नवाब राय के नाम से लिखते रहे। इनकी जितनी भी कहानी, उपन्यास हैं वह पहले पहल पाठक के हृदय परिवर्तन को ध्यान में रखकर लिखी गई थीं, यानी आदर्शोन्मुख कहानियां लिखीं गई थी जैसे पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, बूढ़ी काकी जैसी कहानियां अंत में पाठक के हृदय को परिवर्तित कर देती है। धीरे-धीरे प्रेमचंद की लेखनी में परिवर्तन आता गया और अपने जीवन काल के अंत तक आते-आते उन्होंने यथार्थ से जुड़ी रचनाएं लिखनी शुरू कर दी, जिन में सद्गति, पूस की रात, कफन जैसी कहानियां और सेवा सदन, निर्मला, कायाकल्प, रंगभूमि, गबन, गोदान और कर्मभूमि जैसे उपन्यास शामिल है। गोदान उनका अंतिम पूर्ण उपन्यास है जो 1936 में प्रकाशित हुआ इसके पश्चात उन्होंने मंगलसूत्र लिखना शुरू किया किंतु उसे पूरा करने के पूर्व ही उनकी मृत्यु हो गई थी।
प्रेमचंद ने सिर्फ 20 वर्षों के अपने लेखन कला में हिंदी उपन्यास परंपरा में आमूलचूल परिवर्तन किया और देखते ही देखते हिंदी उपन्यास समाज का जीवंत दस्तावेज बन गया। पश्चिम में जो संक्रमण काल लगभग 125 वर्षों में फैला हुआ था वह हिंदी में केवल 35 वर्षों में पूरा हो गया था और इसका सबसे बड़ा श्रेय प्रेमचंद को जाता है। प्रेमचंद ने अपनी लेखनी के द्वारा अपने पाठकों को सिर्फ एक नया नजरिया ही नहीं एक नया सोच दिया। प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य के विकास और उसके प्रसार में भी अपनी भूमिका निभाई, इन्होने 1935 में मौजुदा सरकार के साथ मिल कर हिन्दी साहित्य के विकाश की लड़ाई लड़ी, जिसे देखकर बाकी के लेखक, कहानीकार, उपन्यासकारों में भी अपनी भाषा के प्रति लड़ने का विचार आया, जिसका परिणाम यह हुआ की, प्रेमचंद का हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति प्रेम उनकी मृत्यु के बाद भी लेखकों में जीवित रहा।
हिंदी उपन्यास व कहानियों में प्रेमचंद की ख्याति इतनी अधिक थी, की पाठक उनकी रचनाओं में अपने आप को ढूंढने लगता। चाहे गोदान का होरी हो, या फिर पूस की रात नायक, समाज का हर वर्ग उनकी कहानियों से प्रभावित होता। यदि हम प्रेमचंद की रचना कल को देखें तो पाएंगे कि उन्होंने हिंदी उपन्यास की परंपरा को कई स्तरों पर संशोधित व परिमार्चित किया।
प्रेमचंद ने अपनी लेखनी के द्वारा उपन्यास के उद्देश्य में परिवर्तन किया। पहले के उपन्यास मुख्यतः मनोरंजन या उपदेश देने को ही उपन्यास का उद्देश्य मानते थे, लेकिन प्रेमचंद ने जासूसी वह तिल्लस्मी उपन्यासों की मनोरंजन प्रियता को चुनौती दी वा दावा किया की जो रचनाएं सिर्फ मनोरंजन के लिए होती हैं उनका महत्व दो कौड़ी का है। वे सिर्फ उपदेश देने को भी उपन्यास का उद्देश्य नहीं मानते उनके अनुसार उपन्यास का उद्देश्य मानव चरित्र के यथार्थ का निरीक्षण करना व सामाजिक समस्याओं पर चोट करना होना चाहिए। प्रेमचंद ने सामाजिक समस्याओं को हमेशा केंद्र में रखा है जैसे सेवा सदन जो कि उनका पहला परिपक्व उपन्यास था उसमें उन्होंने वेश्या समस्या का गहरा निरीक्षण किया है। निर्मला में वे अनमेल विवाह व विधवा जीवन की समस्याओं को उठाते हैं। वही गवर्नमेंट में भी बताते हैं की इच्छाओं को जरूर से ज्यादा बढ़ाना किस प्रकार नुकसानदायक हो सकता है। कर्मभूमि प्रेमाश्रम में किसानों की समस्या व किसान विद्रोह की झलकियां दिखाते हैं, तो वही रंगभूमि में वह दिखाते हैं कि किस प्रकार महाजनि सभ्यता ग्रामीण अर्थव्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर रही है। गोदान प्रेमचंद का अंतिम और एकमात्र महाकाव्य आत्मक उपन्यास है जिसमें सारी की सारी समस्या एक साथ आ गई है। प्रेमचंद की इन लेखनी के द्वारा कहा जा सकता है कि प्रेमचंद समाज के वास्तविक जीवन से ही विषय वस्तु को उठाते हैं इसलिए “रामविलास शर्मा ने कहा है कि यदि 1916 से 1936 तक का भारतीय इतिहास नष्ट हो जाए तो उसे प्रेमचंद की रचनाओं के आधार पर ज्यादा प्रमाणिक तरीके से लिखा जा सकता है”।
वही प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों ने पाठकों के दृष्टिकोण को भी बदल कर रख दिया। जहां प्रेमचंद के पहले के उपन्यास आदर्शवाद रोमांचक जादू और सनसनीखेज कल्पनाओं में डूबे हुए थे वहीं प्रेमचंद ने आदर्शोन्मुख की यथार्थवाद का रास्ता चुना। जिसके द्वारा उन्होंने सामाजिक समस्या को पूरे यथार्थ में प्रस्तुत कर, अंत में आदर्शवाद का सहारा लेकर समाधान भी दे दिया करते थे। पाठकों से प्रेमचंद का गहरा लगाव होने के पीछे एक मुख्य कारण यह था की प्रेमचंद अपनी कहानियों और उपन्यासों में नायक एक ऐसे व्यक्ति को चुनते थे जो हर तरफ से पीड़ित हो। प्रेमचंद की कहानी और उपन्यासों का नायक गरीब बेचारा सिस्टम का मारा व्यक्ति हुआ करता था और फिर उसे कमजोर से गरीब बेचारे व्यक्ति में प्रेमचंद ने अपनी लेखनी के द्वारा ऐसा साहस भरा कि वह लड़ने तक को भी तैयार हो जाता था। जब इस प्रकार की कहानी और उपन्यास आम जनता के बीच आती थी, तब पाठक अपने आप को उसे नायक के रूप में महसूस करने लगते और उनमें भी स्वयं हिम्मत आ जाती थी।
कुल मिलाकर या खाने में कोई आती शक्ति नहीं होगी की हिंदी उपन्यास और कहानियों की शिशु परंपरा को प्रेमचंद ने एक झटके में परिपक्वता किस स्तर पर पहुंचा दिया था। जो विकास सामान्य गति में एक शताब्दी में होती उसे उन्होंने दो दशकों में ही पूरा कर दिया। भले आज प्रेमचंद हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी लेखनी, उनकी रचनाएं हमेशा उन्हे हमारे मन में जीवित रखती हैं। उनकी रचनाएं केवल उनके समय के अनुसार ही सार्थक नहीं थी आज भी उनकी रचनाएं उतनी ही सार्थक है उतना ही शिक्षा और मनोबल पाठकों के मन में भरती हैं जो उसे वक्त भरा करती थी।
प्रेमचंद ने हिन्दी साहित्य और भाषा के लिय जो कुछ भी किया, अपना योगदान दिया वह युगों युगों तक उन्हे हमारे बीच जीवित रखेगा।



