आधुनिक भारतीय कलाओं का परिदृश्य जितना वैविध्यमय, व्यापक और बहुआयामी है, उसके वर्तमान स्वरूप और भविष्य को लेकर होने वाले प्रयत्न उतने ही सीमित, सुस्त और एकायामी। यद्यपि कलाओं के भविष्य पर उठने वाले सवाल शायद इसलिए भी प्रासंगिक हो गये हैं कि इधर भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने कला-कृतियों और कला-माध्यमों को जिस तरह बाजार ने अपनी गिरफ्त में लिया है, जिस तरह आर्थिक प्रक्रियाओं ने हर कलात्मक कर्म को उत्पाद में बदल दिया है, ऐसे में कला-कृतियां और स्वयं कलाकर्मी अपना वजूद बचाए रख पाने में कठिनाई अनुभव करने लगे हैं – यहां तक कि स्वयं कला-सर्जकों के बीच कला को लेकर उनके सरोकार और प्राथमिकताएं बदलने लगी हैं।
विचारणीय बात यह भी है पिछले कुछ दशकों से वैश्विक स्तर पर तकनीकि विकास और प्रौद्योगिकी में आए क्रान्तिकारी बदलाव के कारण समाज की आर्थिक प्रक्रियाओं और मनुष्य की जीवन शैली में जिस तरह के परिवर्तंन आए हैं, उन्होंने जीवन की सारी रूपरेखा ही बदल दी है। बावजूद इसके कि कलाओं का अतीत, वर्तमान और भविष्य जीवन की इस विकास-प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है, उनके वर्तमान और भविष्य को उस मानव-समुदाय के अस्तित्व और अस्मिता से अलग करके देख पाना संभव नहीं रह गया है।
विश्व की प्राचीन सभ्यताओं के आकलन से यह बात हम भली-भांति जान चुके हैं कि मनुष्य ने प्रकृति के साथ संघर्ष और साहचर्य में समान रूप से अपनी जीवन-शैली को विकसित और परिष्कृत तो किया है, उसने अपने से बाहर की दुनिया को कुछ हद तक अपने अनुकूल बनाया है, लेकिन कहीं स्वयं भी उन बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढल गया है। वह उस संघर्ष और बेहतर दुनिया बनाने के रास्ते से थोड़ा विरत भी हुआ है। जो जैसा है, उसी में जी लेने का हुनर ढूंढ़ने लगा है। यह वही मनुष्य है जिसने समूचे प्राणि-जगत के साथ सह-अस्तित्व में न केवल जीना सीख लिया है, बल्कि इस सृष्टि को विध्वंस से बचाए रखने के गुरूतर दायित्व से भी वह अनभिज्ञ नहीं है। मानव सभ्यता का इतिहास और उन सभ्यताओं में मनुष्य की अभिरुचि का अनवरत विकास इस बात का साक्षी जरूर है कि कला के प्रति उसका नैसर्गिक लगाव इसी पर्यावरण संतुलन और व्यापक लोक-कल्याण पर आधारित रहा है। यही मानवीय भाव उसे सृष्टि के अन्य प्राणियों से अलग करता है। देखना यही है कि बदलते परिदृश्य में वह अपने इस मानवीय कार्यभार के प्रति कितना संजीदा रह पाता है।
विश्व सभ्यता के आरंभिक काल से लेकर अब तक जिन मानवीय समुदायों और उनकी सभ्यताओं में चतुर्दिक विकास का परिदृश्य दिखाई देता है, उसमें भारतीय उप-महाद्वीप में विकसित आर्य और अनार्य सभ्यताओं का अपना संघर्षपूर्ण इतिहास रहा है और उन्हीं सभ्यताओं में जन्मी और विकसित हुई बहुआयामी जीवन-शैली और कलाएं कालान्तर में भारतीय कला के रूप में विश्व में अपनी अलग पहचान बनाने में सफल भी रही हैं। मोटे तौर पर इन कलाओं को दो वर्ग में बांटकर देखा जाता है – भाव, स्वर और भंगिमा प्रधान कलाएं, जिनमें साहित्य, संगीत, नाट्य, नृत्य जैसी कलाएं आती हैं, और दूसरी हैं वे रूपंकर कलाएं, जिनमें चित्रांकन, रेखांकन, मूर्ति-शिल्प, भित्ति चित्र, छापा-कला आदि का समावेश रहता है।
इन रूपंकर कलाओं में मनुष्य के हस्त-कौशल और उसकी तकनीकि दक्षता का परिचय भी मिलता है। यद्यपि मनुष्य की संवेदना और चेतना के साथ उसके हस्त-कौशल और दक्षता के पारस्परिक संबंध को इस तरह स्थूल रूप से दो अलग वर्गों में बांटकर देखना कोर्इ बेहतर तरीका नहीं है, क्योंकि हर कौशल के पीछे मनुष्य की संवेदना, भावप्रवणता और चेतना का जहां गहरा संबंध रहता है, वहीं इस भाव-प्रवणता और चेतना की अभिव्यक्ति में मनुष्य के हस्त-कौशल, श्रम और सुरुचि का भी उतना ही महत्वपूर्ण योग रहता है। इसी अर्थ में सभी कलाओं को एक-दूसरी की पूरक कहा जाता है।
आधुनिक काल तक आते-आते कलाओं के ये सभी रूप भारतीय परिदृश्य में अच्छी पहचान बना लेने के बावजूद आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से हर युग में जिस तरह इन कलाओं से जुड़े कलाकर्मियों ने अपने-अपने क्षेत्र में विकास की प्रक्रिया को निरन्तर गतिमान बनाए रखा और हर क्षेत्र में नये प्रयोग किये, वही प्रक्रिया आधुनिक काल तक बदस्तूर जारी रही, जिनकी बदौलत आधुनिक भारतीय कलाएं विश्व में अपनी एक गरिमापूर्ण पहचान बनाने में कामयाब रहीं।
दूसरे विश्व–युद्ध की समाप्ति के बाद जिस तरह दुनिया भर में, विशेष रूप से तीसरी दुनिया के देशों में, जारी राजनैतिक उथल-पुथल और वैश्वीकरण के दौर में जो प्रभाव और परिवर्तन परिलक्षित हुए, भारतीय समाज और उसकी कलाएं उनसे अछूती नहीं रह सकी हैं। जैसी कि भारतीय समाज की अपनी प्रकृति है, उसने उन सभी प्रभावों को अपने भीतर आत्मसात तो कर लिया, लेकिन भूमंडलीकरण के उस बढ़ते दबाव से वह अपने को बचा पाने में कितनी सफल रही है, इस पर कला-क्षेत्र के लोगों की राय एक-सी नहीं है।
सामाजिक बदलाव की इस प्रक्रिया में उस जमाने की कला-उपलब्धियों के प्रतीक और प्रतिमान भी अब बदलने लगे हैं। बेशक एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में वे आज भी हमारे बीच विद्यमान हैं, लेकिन इस हेरिटेज का जिस तरह व्यावसायिक उपयोग होने लगा है, जिस तरह रूपंकर कलाएं और प्रदर्शनधर्मी लोक कलाएं बाजार में नुमाइश और रिक्रियेशन का हिस्सा बनने लगी हैं, उनके भीतर के कला-तत्व को सुरक्षित रख पाना आसान नहीं रह गया है। हम उनमें कोई विजातीय प्रभाव या परायापन भले न देखते हों, लेकिन वे अपने मूल और कलात्मक स्वरूप से विरत भी हुई हैं। साहित्य, संगीत और पारंपरिक लोक कलाएं जहां उत्सव और मेलों का रूप ग्रहण करने लगी हैं, वहीं चित्रांकन, रेखांकन, मूर्ति-शिल्प, भित्ति-चित्र आदि व्यापारिक गतिविधियों के आकर्षण का मुख्य केन्द्र।
व्यावसायिक सिनेमा और बाजारू टीवी चैनल्स ने जिस तरह नृत्य और नाट्य-कर्म को पहले ही अपने भीतर समाहित कर एक स्वतंत्र कला-माध्यम के रूप में काफी कमजोर कर दिया है, ऐसे में राजकीय संरक्षण में चलने वाले सार्वजनिक शिक्षण-संस्थान, अकादमियां या कतिपय निजी प्रयत्नों से चलने वाले कला-संस्थान कितनी जिजीविषा बचा पाते हैं, यह अभी भविष्य के गर्भ में है, हालांकि जिस तरह वर्तमान और भविष्य के प्रति सत्ता और संस्थानों में बैठे लोगों की सोच बदल रही है, वह कला-सर्जकों और सहृदय गृहीता समुदाय के लिए निश्चय ही कम चुनौतिपूर्ण नहीं है।
लेखक- नंद भारद्वाज
वरिष्ठ निदेशक (सेवा-निवृत्त)
दूरदर्शन केन्द्र जयपुर






