एक दिन मैं अपनी कार द्वारा कहीं जा रहा था। रास्ते में एक बस स्टैंड पर देखा कि वहाँ पर बहुत भीड़ थी, जिसमें अधिकतर महिलाएं थी और एक बस में चढ़ने का प्रयास कर रही थी। चूँकि बस पहले से ही भरी हुई थी, इसलिए कुछ सवारियां छूट गई। उन्हीं सवारियों में एक महिला की गोद में करीबन आठ-दस महीने का एक बच्चा था, तथा दूसरा बच्चा जो करीब ढाई-तीन साल का था, ने उसकी उंगली पकड रखी थी। वो महिला बहुत ही परेशान थी, और परेशानी उसके चेहरे पर झलक रही थी। मेरी खाली गाड़ी को देखते ही 4-5 लोग, जिसमें वह महिला भी थी, लिफ्ट लेने के लिए गाड़ी के पास आए। मैंने बहुत ही अनमने मन से उन्हें गाड़ी में बिठाया। फिर धीरे-धीरे बातचीत में पता चला कि ये भीड़ सरकारी स्कूल के शिक्षकों की थी। और इस तरह की परेशानी अमूमन उन्हें हर रोज उठानी पड़ती है। चूँकि शिक्षकों के प्रति मेरी श्रद्धा शुरू से ही रही है, तो फिर उनकी दिनचर्या के विषय में पूछना शुरू किया। पहले तो उन्होंने मना किया कि आप जानकर क्या करोगे, मन नहीं माना, जानने की कुछ ज्यादा ही उत्सुकता हुई, जब तक स्कूल आ चुका था। तो मैं गाड़ी खराब हो जाने का बहाना बनाकर वहीं रुक गया। स्कूल पहुंच कर एक अध्यापिका ने सबसे पहले बच्चों से पूरे स्कूल की सफाई करवाई, जब तक दूसरे अध्यापक ने बताया कि वह पानी लेने के लिए बच्चों को लेकर गांव मे जा रहा है। अन्य सभी अध्यापक-अध्यापिका अपनी-अपनी कुर्सी को साफ़ कर बच्चों से कक्षाओं में दरी पट्टी बिछाते हैं। फिर शुरू होती है प्रार्थना… और प्रार्थना समाप्त होने तक इन सब कामों में धीरे-धीरे साढे दस बज जाते हैं। बच्चे और शिक्षक अपनी अपनी कक्षाओं में चले जाते हैं। तीन कमरों और एक बरामदे में कक्षा आठ तक की पढ़ाई… उत्सुकता बढती ही जा रही थी। और उसी वक्त एक अन्य स्थानीय अध्यापक, जो उस स्कूल के प्रधानाध्यापक भी है, अपनी मोटरसाइकिल लेकर स्कूल के बच्चों के लिए दूध लेने गांव में जाते है। फिर देखा, दूध के आते ही उसे गरम करने की प्रक्रिया शुरू….. जब तक दूध गर्म होता है, बाकी के दूसरे शिक्षक गिलास साफ कर दूध के लिए बच्चों की लाइन लगवाते हैं। और फिर शुरू होता है, बच्चों को शिक्षकों द्वारा दूध पिलाने का क्रम… बच्चों के दूध पीने के बाद शिक्षक अपने लिए चाय बनाते हैं। मैंने अपने आप को उस वक्त बहुत ही भाग्यशाली समझा, जब मुझे भी चाय आफर की गई। सच कहूं तो उस समय मुझे चाय की तलब भी लगी थी। चाय पीने के बाद शुरू होता है पढ़ाई का क्रम….
अरे ये क्या..??? तभी एक गाड़ी धड़धडाती हुई स्कूल में प्रवेश करती है। पता चला कि अक्षय पात्र से बच्चों के लिए भोजन आया है। चार पाँच बड़े बच्चे तुरंत ही भोजन को बड़े बर्तनों में रखते हैं, तथा खाने के बर्तन कटोरी प्लेट आदि निकालते हैं। इसी दौरान करीबन साढ़े बारह बज गए थे। थोड़ी देर बाद मध्यावकाश (इंटरवल) की घंटी बजी, सभी बच्चों को लाइन में बैठाकर भोजन करवाया जाता है। भोजन के पश्चात देखा कि सभी बच्चे अपने खाने के बर्तनों को साफ़ कर रहे हैं, कुछ बड़े बच्चे दोबारा पानी लेने के लिए जाते हैं। बच्चों के भोजन के उपरांत सभी शिक्षक भी एक साथ धूप में बैठकर सुबह जल्दीबाजी में अपने बनाए गए अपने भोजन का आनंद लेते हैं। वहीं दूसरी ओर बच्चे खेलकूद का आनंद लेते हैं।
इंटरवल समाप्त होने के बाद शुरू होता है बच्चों की पढ़ाई का दूसरा दौर….
कक्षाओं में पढ़ाई का दुसरा दौर शुरू हो चुका था। शिक्षक कभी दूसरी और कभी पाँचवी के बच्चों को पढ़ा रहे थे, क्योंकि ये कक्षाये एक ही जगह पर चल रही थी। करीबन 1 घंटे बाद शिक्षकों का चाय पीने का दूसरा दौर शुरू हुआ। बच्चों को काम देकर सभी शिक्षकों ने चाय पी।खुशकिस्मत मै भी था कि मुझे भी दोबारा चाय पीने को मिली। इसी बीच देखा कि बाहर एक गाड़ी आती है और वो महिला शिक्षक चाय पीने के बाद अपने दोनों छोटे बच्चों को लेकर चली जाती है। पूछा तो पता चला कि वो अगर अभी नहीं जाएगी तो फिर छुट्टी के बाद उसे जाने का साधन नहीं मिलेगा, क्योंकि उस गाँव से आवागमन का साधन सिर्फ और सिर्फ लोकल जीप ही है। समय देखा करीबन ढाई बज गए थे।शिक्षक कक्षाओं में जा चुके थे। थोड़ी देर बाद ही देखा कि सभी बच्चे कक्षाओं में से बाहर निकल रहे हैं, पता चला कि सभी छोटे बच्चों को गिनती, पहाड़े तथा ए बी सी डी पढ़ाई जाएगी, तथा बड़े बच्चे कमरों आदि की साफ़ सफाई करेंगे। आधा घंटे बाद ही सभी बच्चों की छुट्टी हो जाती है और इसी बीच सभी शिक्षक अपने उपस्थित रजिस्टर में साइन कर चुके थे, तथा अपने घरों को प्रस्थान करने के लिए साधन का इंतजार करने लगे। एक शिक्षक को छोड़कर बाकी अन्य किसी शिक्षक को मेरी ख़राब गाड़ी की चिंता नहीं थी। चूँकि गाड़ी तो मैंने जानबूझकर खराब की थी, तो दोबारा स्टार्ट कर ली। अरे रे रे रे ये क्या हुआ….. सभी शिक्षक वापस मेरी गाड़ी की तरफ़ भागे, साथ में चलने के लिए। मैंने फिर उन सभी शिक्षकों को उनके गंतव्य स्थान अपनी गाड़ी में बिठाया। तथा पूरे रास्ते ये सोचता रहा कि, क्या इन शिक्षओं का वास्तव में उनकी योग्यता के अनुसार उपयोग किया जा रहा है, या फिर सिर्फ कागजी खानापूर्ति….



