इस मुलाकात को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के बीच एकजुटता का प्रतीक माना जा रहा है, खासकर ऐसे समय में जब हाल के दिनों में दोनों के बीच तनाव की खबरें सामने आई थीं।
रविवार, 30 मार्च 2025 को नागपुर में एक ऐतिहासिक मुलाकात हुई, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत एक ही मंच पर नजर आए। यह मुलाकात कई मायनों में खास थी, क्योंकि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा (22 जनवरी 2024) के बाद यह दोनों नेताओं की पहली सार्वजनिक उपस्थिति थी। इसके अलावा, आरएसएस मुख्यालय में यह उनकी पहली संयुक्त मौजूदगी भी थी। दोनों नेताओं के बीच आखिरी एकांत मुलाकात 10 मई 2014 को दिल्ली में हुई थी, जो लोकसभा चुनावों से ठीक पहले थी। इतने लंबे अंतराल ने यह सवाल खड़ा कर दिया था कि दोनों के बीच यह दूरी क्यों बनी रही। इस मुलाकात ने न केवल राजनीतिक हलचल पैदा की, बल्कि बीजेपी और आरएसएस के रिश्तों पर भी नई चर्चाओं को जन्म दिया।
राम मंदिर के बाद पहली मुलाकात
22 जनवरी 2024 को अयोध्या में राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह के बाद यह पहला मौका था जब नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत एक साथ किसी सार्वजनिक मंच पर दिखे। यह आयोजन नागपुर में आरएसएस मुख्यालय में हुआ, जिसमें महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, आचार्य गोविंद गिरी महाराज, अवधेशानंद महाराज और नागपुर के संरक्षक मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले भी उपस्थित थे।
2024 के लोकसभा चुनावों के बाद, जब बीजेपी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, तो आरएसएस ने पार्टी की चुनावी रणनीति और नेतृत्व शैली पर सवाल उठाए थे। आरएसएस के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ में रतन शारदा ने लिखा था कि 543 सीटों पर केवल मोदी के नाम पर चुनाव लड़ना ‘आत्मघाती’ साबित हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि बीजेपी नेता ‘मोदी की चमक’ में खोए रहे और जमीनी आवाजों को अनसुना कर दिया। इसके अलावा, नवनिर्वाचित सांसदों की बैठक न बुलाने पर भी आरएसएस ने नाराजगी जताई थी।
इस मुलाकात ने भले ही बीजेपी और आरएसएस के बीच एकता का संदेश दिया हो, लेकिन यह सवाल अभी भी बरकरार है कि क्या यह मुलाकात लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों को खत्म कर पाएगी? बंगाल, बिहार, कर्नाटक, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बीजेपी के भीतर मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। ऐसे में यह मुलाकात एक नई शुरुआत का संकेत हो सकती है।
मोदी और भागवत की आखिरी एकांत मुलाकात 10 मई 2014 को दिल्ली में हुई थी, जब लोकसभा चुनावों की तैयारियां चरम पर थीं। उस समय नरेंद्र मोदी बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे और मोहन भागवत आरएसएस के सरसंघचालक। इसके बाद दोनों के बीच मुलाकात की संभावनाएं तो बनीं, लेकिन वे साकार नहीं हो सकीं। कुछ जानकारों का मानना है कि दोनों संगठनों के बीच वैचारिक और रणनीतिक मतभेद इसकी वजह थे। यह मुलाकात न केवल बीजेपी-आरएसएस के रिश्तों में नई उम्मीद जगा रही है, बल्कि यह भी दिखा रही है कि दोनों संगठन एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। अब देखना यह होगा कि यह मुलाकात भविष्य में उनके संबंधों को कितना मजबूत बनाती है।





