जमीन विवाद से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इस मामले में जिला न्यायालय के निर्णय को दोषपूर्ण करार देते हुए केस को पुनः उसी अदालत में भेजा है। हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के आवेदन पर 30 दिनों के भीतर निर्णय लिया जाए। इसके साथ ही संबंधित जिला जज के खिलाफ जांच के आदेश भी जारी किए गए हैं। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की पीठ ने कहा कि भूमि मुआवजे को लेकर जो आदेश पारित किया गया, वह कानून के अनुरूप नहीं था। इसके चलते सिंगरौली जिले के देवसर में पदस्थ चतुर्थ जिला जज दिनेश कुमार शर्मा की कार्यप्रणाली की जांच के निर्देश दिए गए हैं।
यह मामला सिंगरौली के निवासी मंगल शरण द्वारा दाखिल याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने वर्ष 2019-20 में हुई जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया को लेकर हाईकोर्ट में गुहार लगाई थी। याचिकाकर्ता ने बताया कि उनकी जिस भूमि और मकान का अधिग्रहण हुआ है, वह डायवर्टेड श्रेणी में आती है और उसी अनुरूप मुआवजा मिलना चाहिए था। उन्होंने देवसर न्यायालय में धारा 64 के तहत मुआवजे के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था। प्रावधानों के अनुसार कलेक्टर को उस आवेदन पर 30 दिनों में निर्णय लेकर अधिकृत अधिकारी को संदर्भित करना चाहिए था। लेकिन जब कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो याचिकाकर्ता ने कोर्ट का रुख किया। जिला न्यायालय ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि कलेक्टर ने संदर्भ नहीं भेजा है, इसलिए यह मामला विचारणीय नहीं है। इस आदेश को मंगल शरण ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल ने जिला न्यायालय के आदेश को गलत ठहराया और कहा कि यदि प्रावधानों का सही तरीके से अध्ययन किया गया होता, तो आवेदन निरस्त नहीं किया जाता। हाईकोर्ट ने केस पुनः जिला न्यायालय को भेजते हुए 30 दिन के भीतर निर्णय देने को कहा है और साथ ही चतुर्थ जिला जज दिनेश कुमार शर्मा की कार्यशैली की जांच के लिए प्रधान जिला जज को निर्देश दिया है कि वे पिछले पांच वर्षों में जहां-जहां वे पदस्थ रहे, वहां की फाइलों की विस्तृत जांच कर तीन महीने में रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जिला जज के खिलाफ दिए जांच के निर्देश






