भारत सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ बड़ा कदम उठाते हुए बुधवार को 1960 में हुए सिंधु जल समझौते को तत्काल प्रभाव से स्थगित करने का ऐलान किया है। पुरानी इस संधि के निलंबन के बाद भारत को सिंधु और उसकी सहायक नदियों पर नियंत्रण मिल जाएगा, जिससे पाकिस्तान में पानी की भारी किल्लत हो सकती है। ये नदियां चार देशों से होकर गुजरती हैं और पाकिस्तान की 21 करोड़ से अधिक आबादी की जल आवश्यकताएं इन्हीं पर निर्भर हैं।
क्या है सिंधु जल संधि?
साल 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता से यह समझौता हुआ था। इसमें सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों सिंधु, झेलम, चेनाब, रावी, ब्यास और सतलुज के जल के उपयोग को नियंत्रित किया गया है।
पाकिस्तान पर प्रभाव
• खेती पर संकट: पाकिस्तान की 80% खेती योग्य भूमि सिंधु नदी पर निर्भर है, और 93% पानी कृषि कार्यों में ही उपयोग होता है। जल आपूर्ति रुकने से खाद्य उत्पादन पर बड़ा असर पड़ेगा।
• पीने के पानी की कमी: 23 करोड़ से अधिक लोगों का जीवन सिंधु जल पर टिका है। इस जल से कराची, लाहौर, मुल्तान जैसे बड़े शहरों की जल आपूर्ति होती है।
• ऊर्जा संकट: सिंधु और झेलम नदियों पर बने हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट जल न मिलने से प्रभावित होंगे, जिससे बिजली कटौती और औद्योगिक ठहराव बढ़ेगा।
• सामाजिक अशांति: पहले से अशांत बलूचिस्तान और खैबर-पख्तूनवा जैसे क्षेत्रों में हालात और बिगड़ सकते हैं।
भारत के लिए लाभ
• भारत अब अपने अधिकारों का पूर्ण उपयोग कर सकता है, जैसे सीमित बांध बनाना, सिंचाई परियोजनाएं शुरू करना, और बिजली उत्पादन को बढ़ावा देना।
ऐतिहासिक भूल को सुधारने का वक्त
कई जानकार मानते हैं कि सिंधु जल समझौता भारत के लिए एकतरफा नुकसानदेह रहा है। पाकिस्तान को इसमें सिंधु प्रणाली के 80% जल पर अधिकार मिला, जो अन्य अंतरराष्ट्रीय जल संधियों की तुलना में असामान्य रूप से अधिक है। अब समय आ गया है कि भारत इस ऐतिहासिक गलती को सुधारे और संधि में संशोधन कर न्यायसंगत जल-वितरण सुनिश्चित करे। पाकिस्तान की बार-बार की आतंकी हरकतों के बाद यह फैसला एक सख्त संदेश है कि भारत अब चुप नहीं बैठेगा।






