पहले ईंट-भट्टों का संचालन नौ महीने तक होता था, लेकिन अब सरकार ने नए आदेश जारी करते हुए इन्हें केवल 1 जनवरी से 30 जून तक चलाने की अनुमति दी है। 1 जुलाई से 31 दिसंबर तक भट्टों पर फायरिंग पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगी। आदेश का उल्लंघन करने पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जुर्माना और कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
निर्माण कार्य महंगे हुए
22 जनवरी 2025 को जारी आदेश का असर 1 जुलाई से साफ दिखाई देने लगा है। चित्तौड़गढ़ जिले समेत पूरे प्रदेश में ईंटों की सप्लाई घट गई है। नतीजतन, ईंटों की कीमतें एक से सत्रह सौ रुपए तक बढ़ गई हैं। अब एक ट्रैक्टर ईंट मंगवाने पर आमजन को करीब 3000 से 3500 रुपए ज्यादा चुकाने पड़ रहे हैं। इससे मकान निर्माण से लेकर सरकारी योजनाओं तक सभी कामों पर सीधा असर पड़ा है।
चित्तौड़गढ़ की ईंटों की प्रदेशभर में मांग
चित्तौड़गढ़ के 125 से अधिक चिमनी ईंट-भट्टों से बनी ईंटें न केवल जिले में बल्कि प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, राजसमंद, सलूंबर और उदयपुर तक भेजी जाती हैं। यहां लगभग 10 से 15 हजार मजदूर काम करते थे, जो काम बंद होने पर अपने गांव लौट गए हैं। वे 31 दिसंबर के बाद वापस लौटना शुरू करेंगे। भट्टा संचालकों का कहना है कि 7 रुपए प्रति ईंट की दर पर यहां की ईंटें चूरू और हनुमानगढ़ से आने वाली सस्ती ईंटों की तुलना में महंगी हैं, हालांकि गुणवत्ता बेहतर होने से बड़े निर्माण कार्यों में इन्हीं का इस्तेमाल किया जाता है।
कीमतों में भारी बढ़ोतरी
• कोयले से बनी ईंटें: पहले 1000 ईंटें 5000 रुपए में मिलती थीं, अब 6500 रुपए तक।
• तुड़ी व लकड़ी से बनी ईंटें: पहले 5000 रुपए प्रति हजार, अब 6000 रुपए।
• मिट्टी से बनी ईंटें: पहले 5300 रुपए प्रति हजार, अब 7000 रुपए।
यह अचानक बढ़ी हुई कीमतें ठेकेदारों, मिस्त्रियों और घर बनाने वाले लोगों के बजट को बिगाड़ रही हैं।
मई में ही थमा काम
इस बार मई में जल्दी बारिश होने से भट्टों का काम 15 दिन पहले ही बंद करना पड़ा। स्टॉक कम होने के कारण सप्लाई और घट गई। मजदूर भी काम बंद होने पर गांव लौट गए, जो साल के अंत तक वापस आना शुरू करेंगे।






