उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग में 27 साल बाद एक बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर हुआ है। मृतक आश्रित कोटे के तहत दो सगे भाइयों ने नौकरी हासिल कर ली थी। अब दोनों को पूछताछ के लिए तलब किया जा सकता है।
मामला उस समय का है जब विभाग में तैनात पिता की मृत्यु के बाद बड़े भाई नागमेंद्र लांबा और छोटे भाई योगेंद्र लांबा दोनों की भर्ती मृतक आश्रित कोटे से कर दी गई। 27 साल बाद यह गड़बड़ी सामने आई है। भर्ती प्रक्रिया पूरी कराने वाले एक बाबू की मौत हो चुकी है जबकि दूसरा सेवानिवृत्त हो चुका है। अब उनसे भी पूछताछ की जा सकती है। योगेंद्र लांबा की नियुक्ति में गड़बड़ी पाए जाने पर उन पर धारा 14 (1) के तहत कार्रवाई और मुकदमा दर्ज होने की संभावना है। इस पूरे प्रकरण की शिकायत डीजी मुख्यालय में की गई थी। प्रारंभिक जांच डीसीपी यातायात अभिषेक अग्रवाल ने की। नवंबर 2024 में नागमेंद्र लांबा सेवानिवृत्त हो चुके हैं, जबकि योगेंद्र लांबा फिलहाल निरीक्षक के पद पर पुलिस लाइन में तैनात हैं। जांच शुरू होते ही वह कुछ समय तक ड्यूटी से गायब रहे, बाद में वापस लौट आए।
प्रारंभिक जांच में पता चला कि नागमेंद्र लांबा 1986 में हल्द्वानी से भर्ती हुए थे, जो तब उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, हालांकि अब उत्तराखंड में आता है। वहीं योगेंद्र लांबा ने 1997 में मृतक आश्रित कोटे से नौकरी प्राप्त की और मेरठ में तैनात हुए। उनकी भर्ती के दौरान परिवार से शपथपत्र लिया गया जिसमें लिखा था कि किसी को कोई आपत्ति नहीं है और यह पहली भर्ती है, जबकि इससे पहले नागमेंद्र की नियुक्ति हो चुकी थी। सूत्रों के मुताबिक, भर्ती प्रक्रिया कराने वाले बाबुओं में से एक अब नहीं रहे और दूसरा रिटायर हो चुका है। उधर, योगेंद्र लांबा 27 साल की सेवा के दौरान दरोगा से निरीक्षक पद तक पदोन्नत हो चुके हैं।
पुलिस आयुक्त दीपक कुमार ने इस मामले की विभागीय जांच एडीसीपी क्राइम हिमांशु गौरव को सौंपी है। प्रारंभिक जांच के बाद दोनों भाइयों को आरोपपत्र जारी कर उनसे जवाब मांगा गया है। बताया जा रहा है कि नागमेंद्र लांबा, जो एकाउंट विभाग में एसीपी थे, अपने छोटे भाई का वेतन जारी कराते थे और अन्य भत्ते भी दिलाते थे। अब जांच में इन तमाम पहलुओं की छानबीन होगी। वहीं शिकायतकर्ता ने अपना नाम और पता नहीं दिया है। आशंका है कि बड़े भाई को क्लीन चिट मिल सकती है, जबकि छोटे भाई की बर्खास्तगी तय मानी जा रही है।






