टीबी के खिलाफ चल रही जंग को लगा झटका, टीके को नहीं मिली मंजूरी

टीबी के खिलाफ लड़ाई में झटका लगा है। वैज्ञानिक अध्ययनों में उठे सवालों के कारण नई पीढ़ी के टीके को फिलहाल मंजूरी नहीं मिली। विशेषज्ञ समिति ने कहा कि उपलब्ध डेटा पर्याप्त नहीं है और अधिक अध्ययन जरूरी है।

भारत में तपेदिक (टीबी) पर नियंत्रण के लिए नई पीढ़ी का टीका लाने के प्रयासों को झटका लगा है। केंद्र सरकार की विशेषज्ञ समिति ने सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा विकसित रिकॉम्बिनेंट बीसीजी टीका फिलहाल मंजूर करने से इनकार कर दिया।
समिति ने स्पष्ट किया कि टीके के अनुमोदन के लिए प्रस्तुत दावे पर्याप्त, मजबूत और निर्णायक नहीं हैं। कोरोना महामारी की तरह टीबी संक्रमण रोकने के प्रयास में जर्मनी के रिसर्च इंस्टिट्यूट ने हाल ही में एक टीका विकसित किया है, जो मौजूदा बीसीजी टीके का आनुवंशिक रूप से उन्नत संस्करण है। इसे रिकॉम्बिनेंट बीसीजी (VPM1002) कहा जाता है। इस टीके के उत्पादन के लिए भारत में सीरम इंस्टीट्यूट के साथ करार हुआ है। समिति ने औषधि महानियंत्रक को सिफारिश की है कि कंपनी को अधिक व्यापक अध्ययन करना होगा, जिसमें नमूनों की संख्या और प्राथमिक लक्ष्य स्पष्ट हों। यह टीका भारत में टीबी नियंत्रण की लड़ाई में बड़ी उम्मीद माना जा रहा है।

आईसीएमआर के अध्ययन में भी पर्याप्त सबूत नहीं
समिति के वरिष्ठ सदस्य ने बताया कि आवेदन के साथ दो अध्ययन प्रस्तुत किए गए थे, जिनमें से एक भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद का था। हालांकि, समिति ने अध्ययन में कई वैज्ञानिक खामियां पाईं। आईसीएमआर के अध्ययन में एक्स्ट्रा-पल्मोनरी टीबी पर टीके का प्रभाव 50.4% दिखा, लेकिन कुल टीबी पर प्रभाव केवल 16.9% था, जो सांख्यिकीय रूप से असफल रहा। अन्य अध्ययन में प्राथमिक लक्ष्य हासिल नहीं हुआ, यानी टीके और प्लेसिबो के बीच टीबी की पुनरावृत्ति में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं दिखा।

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