
- स्टेज-वन में यदि बीमारी की जांच हो जाए तो मरीजों के पूरी तरह स्वस्थ होने की संभावना 97 से 100 प्रतिशत तक रहती है।
- स्टेज-दो में यह आंकड़ा 90 से 95 प्रतिशत तक रहता है।
- स्टेज-तीन में इलाज की सफलता दर घटकर 60 से 70 प्रतिशत रह जाती है,
- स्टेज-चार में पहुंचने पर यह संभावना केवल 20 से 30 प्रतिशत तक सीमित हो जाती है।
राजस्थान में कम उम्र की महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है, जिसे लेकर चिकित्सक गंभीर चिंता जता रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रेस्ट कैंसर की पहचान जितनी देर से होती है, इलाज उतना ही जटिल हो जाता है। यदि बीमारी की जांच स्टेज-वन में हो जाए तो 97 से 100 प्रतिशत तक मरीजों के पूरी तरह स्वस्थ होने की संभावना रहती है। एम्स जोधपुर से सामने आए आंकड़ों ने ब्रेस्ट कैंसर को लेकर एक नई और चिंताजनक तस्वीर पेश की है। अब तक बुजुर्ग महिलाओं से जुड़ी मानी जाने वाली यह बीमारी तेजी से युवा उम्र की महिलाओं को अपनी चपेट में ले रही है। संस्थान के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग में बीते एक साल में ब्रेस्ट कैंसर के करीब 200 मरीजों की सर्जरी की गई, जिनमें से लगभग 60 महिलाएं 25 से 40 वर्ष की आयु वर्ग की थीं। इनमें कुछ मरीज 25 से 30 वर्ष की युवतियां भी शामिल हैं। कम उम्र में इतने बड़े पैमाने पर सामने आए मामलों ने डॉक्टरों की चिंता बढ़ा दी है।
मेडिकल साइंस में परंपरागत रूप से ब्रेस्ट कैंसर को 60 से 70 वर्ष की उम्र के बाद होने वाली बीमारी माना जाता रहा है। इसके पीछे स्तनपान न कराना, संतान में देरी और बच्चों की संख्या कम होना जैसे कारण बताए जाते रहे हैं। हालांकि, वर्तमान में सामने आ रहे युवा मरीजों में ये कारण पूरी तरह लागू नहीं हो रहे हैं। इसी वजह से विशेषज्ञ अब इसे बदलती जीवनशैली, खान-पान की आदतों, हार्मोनल बदलाव और पर्यावरणीय प्रभावों से जोड़कर गहन अध्ययन कर रहे हैं। कुछ वर्ष पहले तक कम उम्र में ब्रेस्ट कैंसर के मामले मुख्य रूप से मेट्रो शहरों तक सीमित माने जाते थे, लेकिन अब यही रुझान पश्चिमी राजस्थान में भी दिखाई देने लगा है।
स्टेज बदलने के साथ घटती जाती है इलाज की संभावना
विशेषज्ञों के अनुसार, ब्रेस्ट कैंसर की पहचान जितनी देर से होती है, इलाज की सफलता उतनी ही कम होती जाती है। स्टेज-वन में जांच होने पर 97 से 100 प्रतिशत मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो सकते हैं। स्टेज-दो में यह आंकड़ा 90 से 95 प्रतिशत तक रहता है। वहीं, स्टेज-तीन में इलाज की सफलता दर घटकर 60 से 70 प्रतिशत रह जाती है, जबकि स्टेज-चार में पहुंचने पर यह संभावना केवल 20 से 30 प्रतिशत तक सीमित हो जाती है।
वर्ष 2025 में 1000 कैंसर सर्जरी: एम्स जोधपुर के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग में वर्ष 2025 के दौरान करीब एक हजार मरीजों की कैंसर सर्जरी की गई। इनमें-
- 350 सर्जरी मुख, थायरॉइड और लैरिंक्स जैसे चेहरे से जुड़े अंगों की
- 200 सर्जरी ब्रेस्ट कैंसर की
- 170 सर्जरी ओवरी समेत गायनी कैंसर की
- 40 सर्जरी आहार नली की
- 20 सर्जरी फेफड़ों और अन्य अंगों की शामिल हैं
पेट से ज्यादा आहार नली का कैंसर
पश्चिमी राजस्थान में पेट (स्टोमक) कैंसर की तुलना में आहार नली के कैंसर के मामले अधिक सामने आ रहे हैं। एम्स जोधपुर में जहां पेट कैंसर की सर्जरी के केवल 2 से 4 मामले आते हैं, वहीं आहार नली के कैंसर के 25 से 30 मामले सामने आते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इसका मुख्य कारण खान-पान की आदतें हैं। ओडिशा जैसे राज्यों में पेट कैंसर के मामले अधिक पाए जाते हैं, जबकि जापान और कोरिया में मछली आधारित आहार के कारण पेट कैंसर की संख्या ज्यादा है।
डॉक्टरों का कहना है कि भले ही कुल मिलाकर कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हों, लेकिन युवा महिलाओं और युवतियों में ब्रेस्ट कैंसर का बढ़ना बेहद चिंताजनक है। ऐसे में जरूरी है कि समय रहते जांच कराई जाए और स्टेज-वन में ही उपचार शुरू कर दिया जाए, क्योंकि इस स्तर पर कैंसर पूरी तरह ठीक होने की संभावना लगभग 100 प्रतिशत तक होती है।





