एनसीईआरटी की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ का जिक्र, सीजेआई ने जताई आपत्ति

एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और लंबित मामलों पर शामिल नए अध्याय को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी को भी न्यायिक संस्था की छवि धूमिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी और कानून अपना कार्य करेगा। इस मुद्दे को वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल तथा अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत के समक्ष उठाया। एनसीईआरटी द्वारा जारी नई पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका से जुड़ी चुनौतियों पर विस्तृत अध्याय जोड़ा गया है। इसमें बताया गया है कि भ्रष्टाचार, भारी संख्या में लंबित मुकदमे और न्यायाधीशों की कमी न्यायिक तंत्र के सामने प्रमुख समस्याएँ हैं। साथ ही यह भी उल्लेख है कि न्यायाधीश निर्धारित आचार संहिता के अंतर्गत कार्य करते हैं, जो अदालत के भीतर ही नहीं बल्कि बाहर भी उनके आचरण को नियंत्रित करती है।

‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ शीर्षक अध्याय में कहा गया है कि विभिन्न स्तरों की अदालतों में लोगों को भ्रष्टाचार जैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है, जिससे विशेष रूप से गरीब और वंचित वर्गों के लिए न्याय तक पहुँच और कठिन हो जाती है। पुस्तक में यह भी रेखांकित किया गया है कि पारदर्शिता और भरोसा बढ़ाने के लिए केंद्र व राज्य सरकारें तकनीक के उपयोग सहित कई सुधारात्मक प्रयास कर रही हैं और भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित कार्रवाई की व्यवस्था है।

पुस्तक में पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई के जुलाई 2025 के बयान का भी उल्लेख है, जिसमें उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार या कदाचार की घटनाएँ जनता के विश्वास को प्रभावित करती हैं। पाठ्यपुस्तक के अनुसार अनुमानित आँकड़ों में सुप्रीम कोर्ट में लगभग 81 हजार, उच्च न्यायालयों में 62.40 लाख और जिला व अधीनस्थ अदालतों में करीब 4.70 करोड़ मामले लंबित हैं।

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