पश्चिम एशिया युद्ध के बीच भारत की रसोई गैस सुरक्षा पर बड़ा संकट

पश्चिम एशिया में भड़का युद्ध अब केवल भू-राजनीति का सवाल नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे भारत की रसोई और अर्थव्यवस्था तक पहुंच चुका है। अमेरिका-ईरान संघर्ष और उसके बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में पैदा हुई अस्थिरता ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। इसी खतरे को देखते हुए केंद्र सरकार ने रसोई गैस यानी एलपीजी की आपूर्ति बनाए रखने के लिए असाधारण कदम उठाए हैं। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने तेल रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए हैं और अतिरिक्त उत्पादन को घरेलू खपत के लिए आरक्षित करने का फैसला किया है। यह कदम बताता है कि संकट की स्थिति में सरकार की पहली प्राथमिकता आम नागरिकों की रसोई को सुरक्षित रखना है। भारत की ऊर्जा संरचना का एक बड़ा सच यह है कि देश अपनी जरूरतों के मुकाबले एलपीजी का पर्याप्त उत्पादन नहीं करता। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में भारत में कुल 31.3 मिलियन टन एलपीजी की खपत हुई, जबकि घरेलू उत्पादन केवल 12.8 मिलियन टन रहा। यानी देश की कुल जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात के सहारे पूरा होता है। यही वजह है कि जब भी खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है तो उसका असर सीधे भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ता है। भारत के लिए यह निर्भरता इसलिए भी जोखिमपूर्ण है क्योंकि एलपीजी का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। अनुमान है कि भारत के एलपीजी आयात का लगभग 85-90 प्रतिशत हिस्सा सऊदी अरब, कतर, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों से आता है। इन सभी देशों से आने वाली ऊर्जा आपूर्ति का मुख्य मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज है, जो विश्व ऊर्जा व्यापार की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री गलियों में से एक है। जब यह मार्ग युद्ध या तनाव के कारण बाधित होता है तो पूरी वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो जाती है। मौजूदा संघर्ष में भी यही स्थिति पैदा हुई है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के कारण इस समुद्री मार्ग में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। इससे वैश्विक तेल और गैस बाजार में अनिश्चितता बढ़ी है और कई देशों ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर आपात योजनाएं बनानी शुरू कर दी हैं। भारत ने भी इसी पृष्ठभूमि में एलपीजी की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए आपातकालीन प्रावधानों का सहारा लिया है।

सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 की शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए गैस की आपूर्ति को प्राथमिकता के आधार पर नियंत्रित करने का फैसला किया है। इसके तहत घरेलू रसोई गैस की सप्लाई को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। साथ ही पाइप्ड नेचुरल गैस यानी पीएनजी और वाहनों के लिए सीएनजी की आपूर्ति को भी 100 प्रतिशत सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा उर्वरक संयंत्रों को लगभग 70 प्रतिशत और उद्योगों को लगभग 80 प्रतिशत गैस उपलब्ध कराने की व्यवस्था तय की गई है। इन कदमों का उद्देश्य स्पष्ट है अगर ऊर्जा संकट गहराता है तो सबसे पहले घरों और परिवहन क्षेत्र को गैस मिलेगी, उसके बाद उद्योगों और अन्य क्षेत्रों को। सरकार ने एलपीजी की जमाखोरी और कालाबाजारी रोकने के लिए 25 दिन का इंटर-बुकिंग नियम भी लागू किया है, ताकि कोई भी उपभोक्ता तय समय से पहले सिलेंडर बुक न कर सके। लेकिन इस नीति का असर व्यावसायिक क्षेत्रों पर दिखने लगा है। देश के कई शहरों में कमर्शियल गैस सिलेंडरों की आपूर्ति घटने लगी है। होटल और रेस्टोरेंट उद्योग से जुड़े संगठनों का कहना है कि कई स्थानों पर कमर्शियल गैस की सप्लाई 10 से 20 प्रतिशत तक कम हो गई है। इससे खासतौर पर छोटे और मध्यम आकार के होटल-रेस्टोरेंट पर बड़ा दबाव पड़ा है, जो रोज मिलने वाली गैस सप्लाई पर ही निर्भर रहते हैं। कुछ शहरों में स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि होटल संगठनों ने कारोबार बंद होने की चेतावनी तक दे दी है। उनका कहना है कि अगर कमर्शियल गैस सिलेंडरों की नियमित आपूर्ति नहीं होती तो कई रेस्टोरेंट अगले कुछ दिनों में बंद होने की स्थिति में पहुंच सकते हैं। इसका असर केवल कारोबारियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उन लाखों कर्मचारियों और ग्राहकों पर भी पड़ेगा जो रोजमर्रा के भोजन के लिए इन प्रतिष्ठानों पर निर्भर हैं।सरकार ने इस समस्या को देखते हुए तेल विपणन कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों की एक समिति भी बनाई है। यह समिति होटल, रेस्टोरेंट और अन्य उद्योगों की गैस जरूरतों की समीक्षा करेगी और तय करेगी कि सीमित संसाधनों के बीच इन क्षेत्रों को कितनी आपूर्ति दी जा सकती है।

दरअसल यह संकट केवल तत्कालीन आपूर्ति का नहीं, बल्कि भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति का भी सवाल है। पिछले एक दशक में देश में एलपीजी की खपत तेजी से बढ़ी है। उज्ज्वला योजना और शहरीकरण के कारण करोड़ों नए परिवार गैस पर निर्भर हो गए हैं। यही वजह है कि एलपीजी की मांग लगातार बढ़ रही है और आयात पर निर्भरता भी बढ़ती जा रही है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को भविष्य में ऐसे संकटों से बचने के लिए कई स्तरों पर तैयारी करनी होगी। सबसे पहला कदम घरेलू उत्पादन बढ़ाने का है। इसके लिए नई रिफाइनरियों, गैस प्रोसेसिंग संयंत्रों और पेट्रोकेमिकल ढांचे में निवेश बढ़ाना होगा। दूसरा महत्वपूर्ण कदम ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना है, ताकि खाड़ी क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता कम हो सके। इसके अलावा एलपीजी के रणनीतिक भंडार तैयार करने की जरूरत भी लंबे समय से महसूस की जा रही है। जिस तरह भारत ने कच्चे तेल के लिए रणनीतिक भंडारण बनाए हैं, उसी तरह एलपीजी के लिए भी बड़े भंडार तैयार किए जाएं तो संकट की स्थिति में कुछ महीनों तक घरेलू जरूरतों को आसानी से पूरा किया जा सकता है। पश्चिम एशिया का मौजूदा युद्ध शायद कुछ समय बाद खत्म हो जाए, लेकिन इसने भारत को एक अहम सबक जरूर दिया है। ऊर्जा सुरक्षा केवल आर्थिक नीति का विषय नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता से भी जुड़ा सवाल है। जब वैश्विक भू-राजनीतिक संकट पैदा होता है तो उसका असर सबसे पहले आम नागरिक की रसोई पर पड़ता है। भारत के सामने चुनौती यही है कि वह इस संकट को चेतावनी के रूप में ले और अपनी ऊर्जा नीति को अधिक मजबूत और आत्मनिर्भर बनाए। क्योंकि जब तक देश अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के लिए बाहरी स्रोतों पर निर्भर रहेगा, तब तक दुनिया के किसी भी कोने में भड़की आग उसकी रसोई तक पहुंचती रहेगी।
अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
(ये लेखक के अपने स्वयं के निजी विचार हैं)

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