इच्छा-मृत्यु प्रक्रिया अगले चरण में, हरीश को पानी देना भी रोका गया

एम्स प्रशासन ने माता-पिता के लिए पैलिएटिव केयर सेंटर में ठहरने की व्यवस्था की

गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन स्थित राज एम्पायर सोसायटी निवासी हरीश राणा के मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की प्रक्रिया अब अगले चरण में प्रवेश कर चुकी है। चिकित्सकों ने उपचार की दिशा में अहम कदम उठाते हुए उन्हें पानी देना भी बंद कर दिया है और फीडिंग ट्यूब को कैप कर दिया गया है। हालांकि, ट्यूब अभी शरीर से हटाई नहीं गई है। लंबे समय से जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे हरीश राणा की स्थिति को देखते हुए यह निर्णय चिकित्सकीय बोर्ड की बैठक में लिया गया। इसके तहत पहले ही जीवनरक्षक उपचार और पोषण संबंधी सहायता को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जा चुका था। अब पानी की आपूर्ति रोकने के साथ प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, यह पूरा कदम निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुरूप उठाया जा रहा है।

मानवीय पहल के तहत एम्स प्रशासन ने हरीश के माता-पिता निर्मला देवी और अशोक राणा के लिए पैलिएटिव केयर सेंटर में रहने की विशेष व्यवस्था की है। उन्हें हरीश के पास ही एक कमरे में ठहरने की अनुमति दी गई है, ताकि इस कठिन समय में वे अपने बेटे के साथ रह सकें। इसे संवेदनशील और सराहनीय निर्णय माना जा रहा है। डॉक्टरों की टीम इस पूरी प्रक्रिया को दर्दरहित और सम्मानजनक बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित कर रही है। फिलहाल हरीश की स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है। पैलिएटिव केयर के अंतर्गत उनके दर्द नियंत्रण और मानसिक शांति को प्राथमिकता दी जा रही है। चिकित्सकों के अनुसार, अब उन्हें कोई सक्रिय उपचार या वेंटिलेटर सपोर्ट नहीं दिया जाएगा। एम्स प्रबंधन ने विशेषज्ञ चिकित्सकों की एक समिति गठित की है, जिसमें पांच सदस्य शामिल हैं। यह टीम चौबीसों घंटे हरीश की स्थिति पर नजर रखे हुए है। पैलिएटिव केयर वार्ड में छह बेड उपलब्ध हैं और हरीश की हालत का लगातार मूल्यांकन किया जा रहा है। डॉक्टर समय-समय पर रिपोर्ट तैयार कर अदालत को सौंपेंगे, जिनके आधार पर आगे के निर्णय लिए जाएंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि इच्छामृत्यु की प्रक्रिया में समय-सीमा का सटीक अनुमान लगाना कठिन होता है। पोषण बंद होने के बाद भी मरीज कई दिनों से लेकर एक महीने या उससे अधिक समय तक जीवित रह सकता है। पूर्व पैलिएटिव विशेषज्ञ डॉ. सुशमा भटनागर के अनुसार, पैलिएटिव केयर का उद्देश्य मृत्यु को तेज करना नहीं, बल्कि मरीज के दर्द और पीड़ा को कम करते हुए उसे स्वाभाविक रूप से जीवन समाप्त करने की अनुमति देना होता है। इसमें मरीज की गरिमा और आराम को सर्वोपरि रखा जाता है। इस बीच, हरीश के माता-पिता द्वारा जताए गए अंगदान के संकल्प के बाद एम्स की एक विशेष टीम उनके अंगों की जांच कर रही है। इसमें यह देखा जा रहा है कि कौन-कौन से अंग प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त हैं। प्राथमिक जांच के बाद ही आगे की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। किडनी, हृदय, पैंक्रियास, आंत, कॉर्निया और हार्ट वाल्व जैसे अंगों पर विचार किया जा रहा है, बशर्ते वे कार्यशील हों।

गौरतलब है कि हरीश राणा ने वर्ष 2010 में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया था। वर्ष 2013 में एक हादसे में चौथी मंजिल से गिरने के बाद वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे। बाद में डॉक्टरों ने उन्हें क्वाड्रिप्लेजिया से ग्रसित बताया, जिससे उनके हाथ-पैर पूरी तरह निष्क्रिय हो गए। लंबे समय तक असहनीय दर्द और शारीरिक अक्षमता झेलने के बाद परिवार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा 8 जुलाई 2025 को याचिका खारिज किए जाने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां 11 मार्च 2026 को हरीश को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति प्रदान की गई। 14 मार्च को उन्हें गाजियाबाद से दिल्ली स्थित एम्स में भर्ती कराया गया।

जानिए कब क्या हुआ

  • जुलाई 2010: चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में दाखिला
  • 21 अगस्त 2013: चौथी मंजिल से गिरकर घायल
  • अगस्त 2013: पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती
  • दिसंबर 2013: एलएनजेपी अस्पताल, दिल्ली में इलाज
  • 2013: क्वाड्रिप्लेजिया की पुष्टि
  • 2020: परिवार का राजनगर एक्सटेंशन में शिफ्ट
  • 2021: पिता को मकान बेचना पड़ा
  • 8 जुलाई 2025: हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की
  • 11 मार्च 2026: सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु की मंजूरी
  • 14 मार्च 2026: एम्स में भर्ती

विशिखा मीडिया

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