कानपुर किडनी कांड: आहूजा हॉस्पिटल से चल रहा था अवैध ट्रांसप्लांट रैकेट

डॉक्टर प्रीति आहूजा के प्रभाव में फल-फूल रहा था नेटवर्क

कानपुर के केशवपुरम स्थित आहूजा हॉस्पिटल में बिना अनुमति के किडनी ट्रांसप्लांट का संगठित खेल लंबे समय से संचालित हो रहा था। जांच में सामने आया है कि करीब दो वर्षों से यहां अवैध तरीके से मरीजों और डोनरों को लाकर प्रत्यारोपण किया जा रहा था। इस पूरे मामले में अस्पताल प्रशासन और बाहरी नेटवर्क की मिलीभगत उजागर हुई है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) डॉ. हरिदत्त नेमी के अनुसार, आहूजा अस्पताल को किडनी ट्रांसप्लांट या यूरोलॉजी से जुड़ी किसी भी सर्जरी की अनुमति नहीं है। इसके बावजूद यहां ऑपरेशन किए जा रहे थे। इस वर्ष 3 मार्च को साउथ अफ्रीका की महिला ‘अरेबिका’ का अवैध किडनी ट्रांसप्लांट भी यहीं किया गया, जिसका कोई रिकॉर्ड अस्पताल में दर्ज नहीं मिला।

पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने बताया कि अवैध ट्रांसप्लांट की सूचनाओं के आधार पर क्राइम ब्रांच, एलआईयू और खुफिया टीमों को सक्रिय किया गया। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि मरीजों को दिल्ली, मेरठ, नोएडा और एनसीआर से लाया जाता था और ऑपरेशन के बाद अलग-अलग नर्सिंगहोम में शिफ्ट कर दिया जाता था, ताकि पूरे नेटवर्क को छुपाया जा सके। अब तक आहूजा हॉस्पिटल में कम से कम सात अवैध किडनी प्रत्यारोपण की पुष्टि हुई है। अस्पताल के कुछ कर्मचारी कल्याणपुर, काकादेव और पनकी क्षेत्र के नर्सिंगहोम से जुड़े हुए थे, जहां मरीजों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित किया जाता था। जांच में यह भी सामने आया कि ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया देर रात या तड़के 3 से 4 बजे के बीच की जाती थी। उस दिन अस्पताल के नियमित स्टाफ को छुट्टी दे दी जाती थी और केवल बाहरी डॉक्टरों व पैरामेडिकल टीम को बुलाया जाता था। ऑपरेशन के दौरान सीसीटीवी कैमरे तक बंद कर दिए जाते थे, जिससे कोई सबूत न बचे।

आरोपों के घेरे में आईं डॉ. प्रीति आहूजा न सिर्फ इस अस्पताल से जुड़ी हैं, बल्कि वह स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में मेडिकल ऑफिसर भी हैं और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की नगर शाखा की उपाध्यक्ष सहित कई मेडिकल संगठनों में सक्रिय भूमिका निभाती रही हैं। उनके प्रभाव के कारण यह अवैध गतिविधि लंबे समय तक चलती रही। स्वास्थ्य विभाग की जांच में यह भी पाया गया कि कुछ नर्सिंगहोम में अनधिकृत पैरामेडिकल स्टाफ मरीजों का इलाज कर रहा था। मरीजों को साधारण कागज पर दवाइयों की जानकारी दी जाती थी और गंभीर स्थिति में उन्हें लखनऊ के नर्सिंगहोम रेफर कर दिया जाता था। पुलिस को यह भी जानकारी मिली है कि इस रैकेट में शामिल लोग डायलिसिस कराने वाले मरीजों और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को निशाना बनाते थे। उनकी स्थिति का आकलन कर उन्हें किडनी ट्रांसप्लांट के लिए तैयार किया जाता था। पूरा नेटवर्क टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए संगठित तरीके से संचालित होता था। फिलहाल पुलिस और स्वास्थ्य विभाग संयुक्त रूप से मामले की जांच में जुटे हैं और अस्पताल से जुड़े डॉक्टरों व सर्जनों से पूछताछ की तैयारी की जा रही है। इस सनसनीखेज खुलासे के बाद शहर के निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

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