टाइप-1 डायबिटीज के मरीजों को बड़ी राहत; वैज्ञानिकों की नई खोज ने जगाई उम्मीद

अब एक इंजेक्शन से मिल सकता है समाधान

टाइप-1 डायबिटीज को अब तक लाइलाज बीमारी माना जाता रहा है, जिसमें मरीजों को जीवनभर रोजाना इंसुलिन इंजेक्शन लेना पड़ता है। यह रोग तब होता है जब शरीर का इम्यून सिस्टम पैंक्रियाज की उन कोशिकाओं को नष्ट कर देता है जो इंसुलिन बनाती हैं। परिणामस्वरूप शरीर में ब्लड शुगर का स्तर नियंत्रित नहीं रह पाता। हालांकि अब वैज्ञानिकों की नई खोज ने इस बीमारी के इलाज की उम्मीद जगा दी है।

आज के समय में डायबिटीज हर उम्र के लोगों में तेजी से बढ़ रही है। जहां टाइप-2 डायबिटीज के मामले अधिक देखने को मिलते हैं, वहीं टाइप-1 डायबिटीज मुख्य रूप से बच्चों और किशोरों में पाई जाती है। इस बीमारी में शरीर खुद ही इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाओं पर हमला कर देता है, जिससे इंसुलिन का उत्पादन बंद हो जाता है। ऐसे में मरीजों को शुगर कंट्रोल करने के लिए जीवनभर इंसुलिन इंजेक्शन और दवाओं का सहारा लेना पड़ता है। रोजाना इंजेक्शन लेना, बार-बार ब्लड शुगर की जांच करना और खानपान पर सख्त नियंत्रण रखना, टाइप-1 डायबिटीज मरीजों की दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है। लेकिन अब विज्ञान के क्षेत्र से आई नई जानकारी इस स्थिति को बदल सकती है। हालिया शोध में ऐसे उपाय सामने आए हैं, जो शरीर में दोबारा इंसुलिन उत्पादन को सक्रिय करने में सक्षम हो सकते हैं। यदि ये तकनीकें सफल होती हैं, तो भविष्य में इस बीमारी का स्थायी इलाज संभव हो सकता है।

जीन थेरेपी से बदल सकती है तस्वीर
‘इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन एडवांस्ड टेक्नोलॉजीज एंड ट्रीटमेंट्स फॉर डायबिटीज’ में प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार, वैज्ञानिकों ने एक विशेष जीन थेरेपी विकसित की है। इस थेरेपी के तहत एक ही इंजेक्शन के जरिए मांसपेशियों को लंबे समय तक इंसुलिन बनाने में सक्षम बनाया जा सकता है। इससे मरीजों को बार-बार इंसुलिन लेने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और शरीर में वर्षों तक इंसुलिन का उत्पादन जारी रह सकता है। शुरुआती चरण में इस तकनीक का परीक्षण उन वयस्क मरीजों पर किया जाएगा, जिनका ब्लड शुगर नियंत्रण में नहीं रहता और जो पहले से ऑटोमेटेड इंसुलिन डिलीवरी सिस्टम का उपयोग कर रहे हैं। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि यह थेरेपी कितनी प्रभावी ढंग से इंसुलिन का उत्पादन कर पाती है और ग्लूकोज स्तर को नियंत्रित रखती है।

टाइप-1 डायबिटीज को समझना जरूरी
टाइप-1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून रोग है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से पैंक्रियाज की बीटा कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती है। ये कोशिकाएं इंसुलिन बनाती हैं, जो शरीर में ग्लूकोज को ऊर्जा में बदलने के लिए जरूरी होता है। जब ये कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं, तो शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता और ब्लड शुगर का स्तर बढ़ जाता है। इस बीमारी के पीछे सटीक कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार आनुवंशिकता और पर्यावरणीय कारक इसमें भूमिका निभा सकते हैं। कुछ वायरल संक्रमण भी इसे ट्रिगर कर सकते हैं। इसके लक्षणों में बार-बार पेशाब आना, अत्यधिक प्यास लगना, वजन घटना और धुंधला दिखाई देना शामिल हैं। हालांकि यह बीमारी बच्चों में ज्यादा देखी जाती है, लेकिन किसी भी उम्र में हो सकती है।

KRIYA-839 थेरेपी से नई उम्मीद
इंग्लैंड की नेशनल हेल्थ सर्विस से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार KRIYA-839 नामक यह नई थेरेपी डायबिटीज के इलाज में क्रांतिकारी साबित हो सकती है। यह पारंपरिक तरीकों से अलग है, क्योंकि इसमें बाहरी इंसुलिन देने के बजाय मरीज की मांसपेशियों को ही इंसुलिन बनाने वाली इकाई में बदलने का प्रयास किया जाता है।
इस तकनीक में जीन एडिटिंग नहीं की जाती और न ही डीएनए में कोई बदलाव होता है। इसके बजाय मांसपेशियों की कोशिकाओं को ऐसे संकेत दिए जाते हैं, जिससे वे नियंत्रित तरीके से इंसुलिन बनाना शुरू कर देती हैं। शुरुआती पशु परीक्षणों में यह थेरेपी बिना इम्यून सप्रेशन दवाओं के चार साल तक प्रभावी रही है, जो एक सकारात्मक संकेत है। अब इस तकनीक का परीक्षण पहली बार इंसानों पर किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह थेरेपी लंबे समय तक ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में सफल होती है, तो यह डायबिटीज के उपचार में एक बड़ी उपलब्धि होगी।

अस्वीकरण: इस बीमारी या उपचार से संबंधित किसी भी निर्णय से पहले अपने चिकित्सक से सलाह अवश्य लें।

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