
महिला ने की थी 170 करोड़ रुपये के सोने की मांग
सुप्रीम कोर्ट ने एक हाई-प्रोफाइल वैवाहिक विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए महिला द्वारा दायर घरेलू हिंसा के मामले को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस और स्पष्ट आरोपों के दर्ज ऐसे मामलों को शुरुआती चरण में ही समाप्त कर देना उचित है। महिला ने अपने ससुराल पक्ष के खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला दर्ज करते हुए 170 करोड़ रुपये के सोने की मांग की थी। इस पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि केवल परिवार के सदस्यों के नाम लेकर, बिना उनकी किसी प्रत्यक्ष भूमिका का उल्लेख किए, आपराधिक मामला चलाना कानून का दुरुपयोग माना जाएगा। अदालत ने इस पूरे मामले को मनगढ़ंत बताते हुए कड़ी टिप्पणी भी की। अदालत ने पाया कि महिला द्वारा किया गया 170 करोड़ रुपये के सोने का दावा किसी भी आधिकारिक दस्तावेज या समझौते में दर्ज नहीं था, बल्कि इसे बाद में शिकायत में जोड़ा गया। कोर्ट के अनुसार, मई 2024 में दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते में 1.5 करोड़ रुपये के निपटान समेत कई वित्तीय और संपत्ति से जुड़े प्रावधान तय किए गए थे, जिनका आंशिक पालन भी हो चुका था। इसके बावजूद महिला द्वारा तलाक की दूसरी याचिका से पीछे हटना और बाद में घरेलू हिंसा का केस दर्ज करना अदालत को उचित नहीं लगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायत में हिंसा से जुड़े ठोस विवरण का अभाव था और आरोप सामान्य व अस्पष्ट थे। साथ ही, लंबे वैवाहिक जीवन के दौरान पहले कभी ऐसे आरोप सामने नहीं आए, जबकि समझौते के बाद अचानक शिकायत दर्ज कराई गई।
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि वैवाहिक विवादों में भावनाओं के आधार पर आपराधिक मामले दर्ज करना न्याय व्यवस्था के दुरुपयोग को बढ़ावा देता है और इससे अनावश्यक उत्पीड़न होता है। मामले में लंबे समय से अलग रह रहे दंपति के संबंधों को पूरी तरह समाप्त मानते हुए अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विवाह को समाप्त कर दिया। साथ ही, शेष भुगतान और संपत्ति के हस्तांतरण से जुड़ी प्रक्रियाओं को निर्धारित समय सीमा में पूरा करने के निर्देश भी दिए। इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि बिना ठोस साक्ष्यों के आपराधिक कानून का सहारा लेना स्वीकार्य नहीं है और ऐसे मामलों को प्रारंभिक स्तर पर ही रोका जाना चाहिए।






