
देश में महिला आरक्षण बिल, जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से जाना जा रहा है, को लेकर राजनीतिक माहौल गरमा गया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने स्पष्ट किया है कि विपक्ष महिला आरक्षण के सिद्धांत के खिलाफ नहीं है, लेकिन सरकार द्वारा इसे लागू करने के तरीके पर गंभीर आपत्तियां हैं। विपक्षी दलों की बैठक के बाद खरगे ने केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह बिल राजनीतिक लाभ के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने इसमें जनगणना और परिसीमन जैसी शर्तें जोड़कर इसके क्रियान्वयन को अनिश्चितकाल के लिए टालने की कोशिश की है। खरगे ने कहा कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल हमेशा से महिला आरक्षण के समर्थक रहे हैं, लेकिन वर्तमान स्वरूप में यह बिल स्वीकार्य नहीं है। उनका कहना है कि सरकार संविधानिक प्रक्रियाओं के साथ खिलवाड़ कर रही है और परिसीमन के नाम पर राजनीतिक चालें चल रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि असम और जम्मू-कश्मीर में परिसीमन के दौरान विपक्ष को नजरअंदाज किया गया, जिससे सरकार की मंशा पर संदेह और गहरा हुआ है।
परिसीमन को लेकर विपक्ष की चिंता
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी महिला आरक्षण के समर्थन की बात दोहराई, लेकिन परिसीमन को लेकर कड़ा विरोध जताया। उन्होंने कहा कि आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ना एक सोची-समझी रणनीति है, जिससे महिलाओं को मिलने वाला अधिकार लंबे समय तक टल सकता है। रमेश ने चेतावनी दी कि प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया कई राज्यों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। उनका कहना है कि इससे कुछ राज्यों में सीटों का अनुपात घट सकता है, जबकि केंद्र सरकार इस बारे में स्पष्ट जानकारी देने से बच रही है। जयराम रमेश ने परिसीमन को “खतरनाक” बताते हुए कहा कि यह प्रक्रिया राजनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व में जम्मू-कश्मीर और असम में परिसीमन आयोग ने जिस तरह काम किया, उससे उसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। विपक्ष का मानना है कि यह प्रक्रिया सत्तारूढ़ दल के हित में इस्तेमाल की जा सकती है। विपक्षी दलों की मांग है कि महिला आरक्षण को बिना किसी देरी के लागू किया जाए। उनका सुझाव है कि वर्तमान 543 लोकसभा सीटों के आधार पर ही 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाना चाहिए, ताकि महिलाओं को जल्द से जल्द इसका लाभ मिल सके। विपक्ष की एक प्रमुख मांग यह भी है कि महिला आरक्षण के भीतर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की महिलाओं के लिए अलग से उप-कोटा सुनिश्चित किया जाए। उनका तर्क है कि बिना इस व्यवस्था के, पिछड़े वर्ग की महिलाएं प्रतिनिधित्व में पीछे रह सकती हैं।
दक्षिण भारत में बढ़ी चिंता
दक्षिण भारत के कई दलों ने भी इस बिल को लेकर चिंता जताई है। उनका मानना है कि जनसंख्या आधारित परिसीमन से उत्तर भारत की सीटों में बढ़ोतरी हो सकती है, जबकि जनसंख्या नियंत्रण में सफल दक्षिणी राज्यों का राजनीतिक प्रभाव कम हो सकता है। इस विधेयक का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करना है, ताकि राजनीति में उनकी भागीदारी बढ़ सके। हालांकि, इसे लागू करने के लिए सरकार ने जनगणना और परिसीमन को अनिवार्य शर्त के रूप में जोड़ा है।
महिला आरक्षण को लेकर देश में व्यापक सहमति दिख रही है, लेकिन इसके क्रियान्वयन को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच गहरा मतभेद बना हुआ है। जहां सरकार इसे ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक रणनीति करार देते हुए मौजूदा स्वरूप में विरोध कर रहा है।




