राहुल गांधी की नागरिकता का जिन्न फिर बाहर, सात मई को लखनऊ में सुनवाई

लखनऊ की सियासी गलियों में इन दिनों एक ऐसा विवाद गरमाता जा रहा है जो कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे, लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी की भारतीय नागरिकता को ही चुनौती दे रहा है। कर्नाटक के भाजपा कार्यकर्ता एस. विग्नेश शिशिर द्वारा दायर याचिका अब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ पहुंच चुकी है, जहां न्यायमूर्ति मनीष माथुर ने सुनवाई संभाली है। अदालत ने याचिकाकर्ता को दस्तावेज दाखिल करने का समय देते हुए अगली सुनवाई सात मई तय कर दी है। इससे पहले जस्टिस सुभाष विद्यार्थी इस केस से खुद को अलग कर चुके थे। यह मामला न सिर्फ राहुल गांधी की राजनीतिक छवि पर सवाल खड़े कर रहा है, बल्कि भारतीय नागरिकता कानून की पड़ताल भी करा रहा है। भाजपा समर्थक शिशिर का दावा है कि राहुल गांधी ने ब्रिटिश नागरिकता ले रखी है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 84 के तहत लोकसभा सदस्य बनने की अयोग्यता का आधार बन सकती है। यदि अदालत ने इस दिशा में कोई सख्त कदम उठाया, तो राहुल की मुश्किलें न सिर्फ कानूनी तौर पर बढ़ेंगी, बल्कि राजनीतिक रूप से भी विपक्ष की एकजुटता पर असर डालेंगी। आइए, इस पूरे विवाद की गहराई में उतरें और समझें कि सात मई की सुनवाई राहुल के लिए कैसे उलटफेर ला सकती है।

यह विवाद की शुरुआत लखनऊ की एक निचली अदालत से हुई, जहां शिशिर ने राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की। उनका आरोप था कि राहुल ने 2004-2005 में ब्रिटेन में कंपनी रजिस्ट्रेशन के दौरान खुद को ब्रिटिश नागरिक बताया था। दस्तावेजों के हवाले से शिशिर ने कहा कि राहुल ने बैकॉप एंटरप्राइजेज (प्रीमियर शिपिंग) कंपनी में डायरेक्टर के रूप में हस्ताक्षर किए, जिसमें नागरिकता ब्रिटिश दर्ज थी। भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 9 के मुताबिक, यदि कोई भारतीय नागरिक विदेशी नागरिकता ग्रहण करता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि यह दोहरी नागरिकता का स्पष्ट मामला है, जो सुप्रीम कोर्ट के 2019 के फैसले से भी प्रतिबंधित है। निचली अदालत ने इस याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन शिशिर हाईकोर्ट पहुंचे।

17 अप्रैल को जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की एकलपीठ ने खुली अदालत में मौखिक आदेश दिया कि उत्तर प्रदेश सरकार राहुल के खिलाफ एफआईआर दर्ज करे और जांच कराए। यह राहुल के लिए बड़ा झटका था, क्योंकि इससे न सिर्फ उनकी नागरिकता पर सवाल उठते, बल्कि लोकसभा सदस्यता पर भी खतरा मंडराने लगता। लेकिन अगले ही दिन, 18 अप्रैल को लिखित आदेश में जज ने अपना फैसला बदल दिया। उन्होंने कहा कि राहुल को नोटिस जारी किए बिना फैसला उचित नहीं। इस यू-टर्न ने शिशिर को भड़का दिया। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट डाले, हालांकि जज का नाम नहीं लिया, लेकिन केस से जुड़े मुद्दों पर तीखी टिप्पणियां कीं। इससे नाराज जस्टिस विद्यार्थी ने 20 अप्रैल को खुद को केस से अलग कर लिया। अब जस्टिस मनीष माथुर ने कमान संभाली है, और सात मई को नई सुनवाई होगी। शिशिर को दस्तावेज जमा करने का समय मिला है, जिसमें वे ब्रिटिश रजिस्ट्रेशन के प्रमाण, राहुल के पिता फीरोज गांधी के ब्रिटिश मूल और परिवार के ऐतिहासिक कनेक्शन के दस्तावेज पेश कर सकते हैं।

इस पूरे ड्रामे का राजनीतिक आयाम बेहद रोचक है। भाजपा इसे कांग्रेस के परिवारवाद और विदेशी मूल के पुराने नैरेटिव को फिर से हवा देने का मौका मान रही है। 2019 लोकसभा चुनाव से पहले भी यही मुद्दा गरमाया था, जब पीएम मोदी ने राहुल कौन हैं का सवाल उठाया था। अब 2024 चुनाव के बाद, जब राहुल नेता विपक्ष बने हैं, यह मुद्दा भाजपा के लिए रणनीतिक हथियार बन सकता है। कर्नाटक से शिशिर का भाजपा से जुड़ाव कोई संयोग नहीं लगता; यह पार्टी की राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा हो सकता है। दूसरी ओर, कांग्रेस इसे राजनीतिक साजिश बता रही है। पार्टी प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनाते ने कहा कि यह भाजपा का ट्रोल आर्मी का कमाल है, और राहुल की नागरिकता पर कोई सवाल नहीं। लेकिन अदालत अगर शिशिर के दावों को गंभीरता से लेती है, तो जांच के आदेश पर राहुल को सफाई देनी पड़ सकती है। इससे उनकी छवि पर धब्बा लगेगा, खासकर युवा वोटरों और मध्यम वर्ग में जो पारदर्शिता की उम्मीद करते हैं।

अब सवाल यह है कि सात मई की सुनवाई में राहुल की मुश्किलें कैसे बढ़ सकती हैं? सबसे पहले, यदि जस्टिस मनीष माथुर दस्तावेजों की प्रारंभिक जांच के बाद एफआईआर का आदेश देते हैं, तो उत्तर प्रदेश पुलिस को केस दर्ज करना पड़ेगा। इसमें आईपीसी की धारा 420 (धोखाधड़ी), 468 (जालसाजी) और नागरिकता कानून के उल्लंघन के आरोप लग सकते हैं। जांच में ब्रिटिश दूतावास या कंपनियों रजिस्ट्रार से दस्तावेज मंगाए जा सकते हैं, जो समय लेगा लेकिन राहुल को कोर्ट में पेशी देनी पड़ सकती है। दूसरा, यदि कोर्ट राहुल को नोटिस जारी करता है, तो उन्हें हलफनामा देकर नागरिकता साबित करनी होगी। उनके ब्रिटिश पासपोर्ट या कंपनी दस्तावेज नकारना मुश्किल होगा, क्योंकि यूके के रिकॉर्ड सार्वजनिक हैं। तीसरा, शिशिर ने एक और याचिका दायर की है, जिसकी सुनवाई अगले सप्ताह हो सकती है। यदि दोनों याचिकाएं जुड़ जाती हैं, तो मामला और जटिल हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट तक जाने पर यह राष्ट्रीय बहस बन सकता है।

इसके कानूनी निहितार्थ गहरे हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 102(1)(क) के तहत, यदि कोई सांसद विदेशी नागरिकता रखता पकड़ा जाता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त हो सकती है। 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने लुधियाना केस में कहा था कि दोहरी नागरिकता अमान्य है। राहुल का मामला इससे मिलता-जुलता है। यदि साबित हो गया, तो उपचुनाव होगा, और कांग्रेस की लोकसभा सीटें घटेंगी। राजनीतिक रूप से, यह 2029 चुनाव से पहले विपक्ष को कमजोर करेगा। राहुल की भारत जोड़ो यात्रा की मेहनत पर पानी फिर सकता है। लेकिन राहुल के पास मजबूत बचाव है. वे कह सकते हैं कि कंपनी रजिस्ट्रेशन में गलती हुई या यह पुराना मामला है। कांग्रेस ने पहले भी दावा किया कि राहुल जन्मजात भारतीय हैं।

विवाद का व्यापक विश्लेषण करें तो यह भारतीय राजनीति की पुरानी बीमारी को उजागर करता है। नेहरू-गांधी का ठप्पा 1980 से लगा है। इंदिरा गांधी के पति फीरोज के पारसी-ब्रिटिश मूल से लेकर सोनिया गांधी की इतालवी पृष्ठभूमि तक, भाजपा ने इसे हथियार बनाया। अब राहुल पर फोकस है। शिशिर जैसे कार्यकर्ता सोशल मीडिया के जरिए इसे वायरल कर रहे हैं, जो #राहुलब्रिटिशसिटीजन जैसे ट्रेंड बना सकता है। लेकिन न्यायपालिका पर दबाव न डालें, यही लोकतंत्र की ताकत है। जस्टिस मनीष माथुर का रुख अहम होगा। यदि वे सख्ती बरतते हैं, तो राहुल को निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ना पड़ेगा। इससे संसद सत्र बाधित हो सकते हैं, और विपक्ष की आक्रामकता कमजोर पड़ सकती है।
एक अन्य कोण यह है कि यह मामला नागरिकता कानून पर बहस छेड़ सकता है। एनआरसी-सीएए विवाद के बाद, अब विपक्षी नेताओं पर ही सवाल उठना विडंबना है। शिशिर की याचिका यदि सफल हुई, तो अन्य नेताओं पर भी निशाना साधा जा सकता है। लेकिन फिलहाल, सात मई का इंतजार है। यदि कोर्ट ने जांच के आदेश दिए, तो राहुल की राजनीतिक यात्रा पर सबसे बड़ा संकट आएगाकृनागरिकता साबित न कर पाए तो लोकसभा से बाहर। कांग्रेस संगठन में हड़बड़ी मचेगी, और प्रियंका या अन्य चेहरे आगे आ सकते हैं। भाजपा इसे कर्म का फल बताएगी। कुल मिलाकर, यह विवाद न सिर्फ कानूनी जंग है, बल्कि सियासी चालबाजी का खेल भी। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप तक यह चलता रहेगा, और राहुल की किस्मत पर असर डालेगा।
संजय सक्सेना, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
(ये लेखक के अपने स्वयं के निजी विचार हैं)

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