अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल; तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ा

कमर्शियल सिलिंडर के बाद घरेलू गैस और पेट्रोल-डीजल महंगे होने के संकेत

कमर्शियल एलपीजी सिलिंडर की कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद घरेलू रसोई गैस और पेट्रोल-डीजल के दाम फिलहाल स्थिर रखे गए हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ा दिया है, जिससे उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। ऐसे में सरकार के सामने यह दुविधा खड़ी हो गई है कि कंपनियों को घाटे से बचाया जाए या आम जनता पर महंगाई का बोझ डाला जाए। कमर्शियल सिलिंडर करीब 993 रुपये तक महंगा हो चुका है, जबकि घरेलू गैस और ईंधन की कीमतों में अभी तक कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। पहली नजर में यह राहत भरा कदम लगता है, लेकिन वास्तव में यह दबाव को टालने जैसा है। पेट्रोलियम उत्पादों की लागत बढ़ने से तेल कंपनियों का घाटा लगातार बढ़ रहा है। सवाल यह है कि सरकार आम उपभोक्ताओं को इस स्थिति से कब तक बचा पाएगी। मुख्य समस्या अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों और घरेलू दरों के बीच बढ़ता अंतर है। रेटिंग एजेंसी इक्रा के अनुसार, यदि कच्चा तेल 120-125 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में बना रहता है, तो पेट्रोल पर कंपनियों का मार्केटिंग मार्जिन लगभग 14 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 18 रुपये प्रति लीटर तक नकारात्मक हो सकता है। घरेलू एलपीजी पर भी दबाव तेजी से बढ़ रहा है।

अनुमान है कि यदि यही स्थिति बनी रहती है, तो वित्त वर्ष 2026-27 में घरेलू एलपीजी पर कंपनियों की अंडर-रिकवरी 80,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। यह आंकड़ा सरकार के लिए बड़ी चुनौती का संकेत है, क्योंकि मौजूदा बजट में एलपीजी सब्सिडी के लिए 11,085 करोड़ रुपये का ही प्रावधान किया गया है। इसमें गरीब परिवारों के लिए 9,200 करोड़ और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के तहत 1,500 करोड़ रुपये शामिल हैं। इस लिहाज से संभावित घाटा बजट प्रावधान से कई गुना अधिक हो सकता है। इससे पहले भी सरकार तेल कंपनियों की भरपाई कर चुकी है। अगस्त 2025 में केंद्र ने इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम को घरेलू एलपीजी पर हुए नुकसान की भरपाई के लिए 30,000 करोड़ रुपये की मंजूरी दी थी। दबाव केवल तेल कंपनियों तक सीमित नहीं है। ऊर्जा की बढ़ती कीमतों का असर सरकारी खर्च पर भी पड़ रहा है। इक्रा के मुताबिक, 2026-27 में उर्वरक सब्सिडी 2.05 से 2.25 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है, जबकि बजट में इसके लिए 1.71 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान है। इसका सीधा असर सरकारी खजाने, कंपनियों के मुनाफे और आम जनता की जेब पर पड़ रहा है।

सरकार के सामने तीन विकल्प

पेट्रोल-डीजल के मामले में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, निकट भविष्य में इनके दाम बढ़ाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अप्रैल 2022 से खुदरा कीमतें लगभग स्थिर हैं, जबकि कच्चा तेल हाल ही में 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था और फिलहाल भी 110 डॉलर से ऊपर बना हुआ है। दिल्ली में पेट्रोल 94.77 रुपये और डीजल 87.67 रुपये प्रति लीटर के स्तर पर है।

सरकार के पास अब तीन विकल्प मौजूद हैं—

  • तेल कंपनियों को घाटा उठाने दिया जाए,
  • बजट से उनकी भरपाई की जाए,
  • या फिर धीरे-धीरे कीमतों में बढ़ोतरी की जाए।

पहला विकल्प कंपनियों की वित्तीय स्थिति को कमजोर करेगा, दूसरा राजकोषीय बोझ बढ़ाएगा, जबकि तीसरा सीधे तौर पर आम आदमी की जेब पर असर डालेगा। ऐसे में सरकार के लिए संतुलन बनाना आसान नहीं होगा।

विशिखा मीडिया

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