रूबी सेहरा, जयपुर

यूं तो वजूद नहीं मेरा कुछ भी इस पुरुष प्रधान समाज में,
फिर भी अनेकों परिभाषाएं मेरे अर्थ को चरितार्थ करती है…
किसी की कल्पनाओं में मैं उन्मुक्त गगन का पंछी हूं,
तो कहीं मैं पिंजरे में कैद बेवस प्राणी मात्र सी..
कुछ मेरा अक्श स्वच्छंद तितलियों में पाते हैं,
तो कहीं मैं परकटा प्राण विहीन जीव सी..
किसी ने माना मुझे सुबह की उजली किरण सदृश्य,
तो कहीं मैं घनी गहराती धुंध सी..
कभी मैं खुद में पूर्ण, सशक्त, साकार, सब जिम्मेदारी निर्वाह में योग्य
तो कहीं मैं पुरुष बिन अधूरी, कमजोर, निराधार और आयोग्य हूँ
परिकल्पनाओं में मैं संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार गौरी, दुर्गा, और काली समकक्ष
तो वास्तविकताओं के छोर पर अबला निर्भया सी
अर्जित है मुझे सब सामाजिक समानताएं,
वाद प्रतिवादों में अधिकारपूर्ण व्यवहार की अहर्ताएं भी
वहीं दूसरी ओर वर्जन करते हैं मेरी मूल प्रवृत्तियों का,
अधिकारविहीन उपेक्षिता शोभनीय हूं मैं बस उनको
नारी का केवल श्रद्धा रूप गृहणीय है उनको,
अन्यथा अनेकों अन्य उपनाम भी बोले जाएंगे
कुलक्षण, चरित्रहीन, असभ्य, अहंकारी और संस्कार विहीन भी मैं ही हूं,
यूं तो वजूद नहीं मेरा कुछ भी, फिर भी अनेकों उपनाम है मेरे…
(लेखिका वर्तमान में जयपुर जिले की कोटखावदा तहसील में तहसीलदार के पद पर कार्यरत हैं)






