विभाजन की विभीषिका; एक दर्द भरी दास्तान

संजय सक्सेनावरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ 14 अगस्त 1946 की रात थी। आसमान में चाँद लहूलुहान सा लटका था, मानो वह भी उस धरती की त्रासदी का…

होली- गोश्त के साथ रंगीन पानी ना हो तो कैसा कायस्थ (हास्य-व्यंग्य)

पूरे देश की तरह लखनऊ में भी होली के रंग अलग-अलग देखने को मिलते हैं। यहां आज भले ही किसी एक वर्ग को होली के…

ऐ वतन, तुझे नमन…

हर तरफ किलकारियां हों,नए कलरव में बागबान हों,चौ तरफा "जय भारत "का आल्हाद हों,उन्मुक्त हो गूंजे धरा गगन,तुझको वतन करते नमन।जहां सियासत सच्ची प्रकृति सुरम्य…