हर तरफ किलकारियां हों,
नए कलरव में बागबान हों,
चौ तरफा “जय भारत “का आल्हाद हों,
उन्मुक्त हो गूंजे धरा गगन,
तुझको वतन करते नमन।
जहां सियासत सच्ची प्रकृति सुरम्य हों,
आर्यावत रंगों से सरोबार हों,
गाए हर जन, जन गण मन,
तुझको वतन करते नमन।
रश्मिरथी मंगलयान जयघोष हों,
देदीप्यमान नक्षत्र सा भारत-वर्ष हों,
चंद्रयान आदित्य सा लक्ष्य हों,
बिखरे आकाश वर्षा नवरतन,
तुझको वतन करते नमन।
सर्वधर्म समभाव हों,
आशतिरेक प्रेमाभाव हों,
आपस मे भाई चारे का भाव हों
सागर निरखे नयन प्रेमघन,
तुझको वतन करते नमन।
शिल्पा लोहार, ऋषभदेव, उदयपुर





