दोहे

कोई खुश हमसे यहाँ, तो कोई नाराज़
जिसकी जैसी है ग़रज़, उसका वो अन्दाज़

पीत वसन धारण किए, गल में माला चार
लगा लिया फिर मंच से, पैसों का अंबार

ईश्वर रब ढूँढा बहुत, मन का मंदिर छोड़
घर में माँ भूखी रही, मगर दान की होड़

इतना भी मुश्किल नहीं, कहना सच्ची बात
फिर क्यों झूठी बात पर, नाहक करना घात

रंग बदलकर आ रहा, गिरगिट मेरे पास
भूल रहा हर रंग का, अब मुझको आभास

रगड़ रगड़ कर धो लिए, तन के वस्त्र मलीन
कैसे मन का साफ़ हो, ये गंदा कालीन

शातिर फ़ितरत के जिन्हें, मक्कारी का रोग
गली-गली में आजकल, मिलते ऐसे लोग

आवश्यक जब बोलना, रहें मगर चुप लोग
उस चुप्पी पर बाद में, बहुत मनाते सोग

रोटी का लालच दिया, दौड़ी आई गाय
भगा दिया फिर मारकर, कैसा कलयुग हाय

जादू-टोना से रखें, लोग लाभ की आस
शिक्षित में अक्सर मिला, मुझे अंधविश्वास

दुनिया का रंग देखकर, अक्सर होता खेद
पढ़े- लिखे जब भूलते, सही गलत का भेद

एक-दूसरे को यहाँ, लूट रहे इंसान
फिर जाकर वे पूजते, मंदिर में भगवान

जिनकी वाणी कह रही, नारी-पुरूष समान
वे अक्सर हक छीनते, देता सिर्फ विधान

आता कोई भी नहीं , बुरे वक़्त में पास
रंग दिखाएँ लोग वे, जो बनते हैं ख़ास

ढूँढ रहे संसार में, सभी उसे बेक़ार
अपने मन अंदर छुपा, खुशियों का भण्डार

प्रेम लबादा ओढ़कर, करते नेह अगाध
वे ही मौका देखकर, कर जाते अपराध

पैसा सब कुछ मानकर, करते लोग अधर्म
मिले चैन-धन देखिए, करके आप सुकर्म

सने शीश से पाँव तक, करके पाप अनेक
फिर गंगाजी के घाट पर, डुबकी मारी एक

दिल में है मक्कारियाँ, मुख पर भक्ति भाव
मीठा-मीठा सा करे, पाखंडी बर्ताव

हँसमुख मुखड़ा साहसी, बातचीत में ढंग
नहीं जरुरी हो यही, विश्वासी का रंग

चिंता नाहक डस रही, लेकर रूप अमूर्त
भैया जी में भूतनी, बता रहे हैं धूर्त

रोता है दिल बारहा, देख झूठ के पाँव
सच तो बैठा धूप में, मिले कहाँ पर छाँव

मंदिर बेशक दूर हो, जाते लोग जरूर
है भक्ति की भावना, या फिर दुख भरपूर

उन लोगों के वक़्त पर, यर इरादे भाँप
जिनके चेहरे में पले, मक्कारी का साँप

पहचानूँ कैसे भला, अच्छा कौन खराब
लोग यहाँ डाले हुए, मुख पर कई नक़ाब

पग-पग काँटे झाड़ियाँ, तोड़ें जीवन डोर
आओ मिलकर बाँट लें, हम-तुम मन का शोर

जीवन भर की दौड़ में, है सुख-दुख का साथ
फिर भी अंदर शून्यता, सब ही खाली हाथ

जग में रखती दोस्ती, अलग-अलग अंदाज़
सतरंगी से रूप पर, हम सब करते नाज़

तारकेश्वरी ‘ सुधि’ जयपुर

विशिखा मीडिया

विशिखा ने जनवरी 2019 से राजस्थान की राजधानी जयपुर से हिंदी मासिक पत्रिका के रूप में अपनी नींव रखी। राजस्थान में सफलता का परचम फहराने के बाद विशिखा प्रबंधन ने अप्रैल 2021 से उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से मासिक पत्रिका के रूप में अपना प्रकाशन आरम्भ करने का निर्णय लिया। इसी बीच लोगों की प्रतिक्रियाएं आईं कि विशिखा का प्रकाशन दैनिक समाचार पत्र के रूप में भी होना चाहिये। पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए विशिखा प्रबंधन ने 1 जनवरी 2022 से जयपुर से दैनिक समाचार पत्र के रूप में भी अपना प्रकाशन आरम्भ किया। विशिखा में प्रमुख रूप से राजनैतिक गतिविधियों सहित, कला, समाज, पर्यटन, एवं अन्य विषयों से संबंधित विस्तृत आलेख प्रकाशित होते हैं। विशिखा पत्रिका ने अपने विस्तृत आलेखों और दैनिक न्यूज़ विश्लेषण के माध्यम से अपने पाठकों को जानकारी और ज्ञान की दुनिया में ले जाने का महत्वपूर्ण काम किया है। अपनी सटीक खबरों, विस्तृत रिपोर्टों और विशेष विषयों पर आधारित लेखों के साथ, विशिखा ने लगातार अपनी विश्वसनीयता बनायी हुई है। विशिखा मासिक पत्रिका की खबरों की गुणवत्ता, नवीनता और सटीकता को ध्यान में रखते हुए इस पत्रिका ने अपने पाठकों का दिल जीता है। यह पत्रिका न केवल जानकारी उपलब्ध कराती है, बल्कि लोगों के बीच अपने विचारों के आदान प्रदान के लिए एक मंच भी उपलब्ध करती है। इसके लेखक, संपादक और टीम का प्रयास निरंतर यह होता है कि पाठकों को एक अच्छा अनुभव देने के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक मुद्दों के साथ-साथ समस्याओं के समाधान पर ध्यान केंद्रित करें। विशिखा का लक्ष्य आपको विभिन्न विषयों पर अद्भुत लेखों से परिचित कराना है। पत्रिका के माध्यम से हम लेखकों, संगठनों, एवं समाज के प्रतिष्ठित और सामान्य लोगों को उनकी रचनात्मक योग्यताओं के आधार पर साझा करने का प्रयास करना है। पत्रिका टीम का मूल मंत्र है- रचनात्मकता, नैतिकता और उच्चतम गुणवत्ता। विशिखा हिंदी मासिक पत्रिका है जो 2019 में शुरू हुई थी। वर्तमान में यह राजस्थान और उत्तराखंड से प्रकाशित की जाती है। इसमें विभिन्न विषयों पर लेख शामिल होते हैं जैसे कि करंट अफेयर्स, साहित्य, महिलाएं, यात्रा और अधिक। हमारी पत्रिका उन लोगों के लिए है जो ज्ञान और सूचना की तलाश में होते हैं और उन्हें उन विषयों से रुबरु कराने का एक मंच प्रदान करती हैं।

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