आज मैं सेवानिवृत्त हो रहा हूँ पैंतीस साल के नौकरी के बाद। मेरे पास सबकुछ था लेकिन साथ में बैठकर बातें करने वाला न था। पत्नी “संध्या” का देहांत पाँच साल पहले लंबी बीमारी के बाद हो गया, कैंसर जैसे असाध्य रोग से जुझती “संध्या” को मानों “हार्ट अटैक” से मोक्ष मिल गया।अकेलेपन को दूर करने के लिए मैंने ऑफिस की फाइलों में अपने आप को छुपा लिया मगर आज तो वो भी छूटने वाला था। मेरे दो बच्चे हैं दोनों शादीशुदा और अपनी जिंदगी में मस्त। बेटा, बहू एक मल्टीनेशनल कंपनी में ऊँचे ओहदे पर है और बेटी, दामाद पारिवारिक व्यवसाय को बखूबी संभाल रहे हैं।
बेटे, बहू ने बार बार कहा कि आप रिटायर होकर उनके पास आ जायें साथ रहेंगे, पर मैं ही हिचक जाता हूँ शायद आज के परिवेश में उनकी निजी जिंदगी मेरे रहने से प्रभावित होती। फेयरवेल पार्टी लेने के बाद घर पहुंचा तो लगा आज “संध्या” के जाने के बाद फिर अकेला हो गया हूँ। आँखें डबडबाई थीं और आज बहुत शिद्दत से “संध्या” याद आ रही थी। वो जाने से पहले बोलती थी कि बेटे के पास चले जाना मन लगा रहेगा। मैंने एक हफ्ते के बाद बेटे के पास मुंबई जाने का फैसला कर लिया लेकिन कुछ दिनों के लिए। सुबह स्टेशन पर बेटा बहू लेने आये थे।
तीन कमरे का फ्लैट था बेटे का। आधुनिक सुख सुविधाओं से सुसज्जित। मेरे मनोरंजन के लिए मेरे कमरे में ही टीवी लगा दिये गये थे, बेटा जानता था कि मैं घंटों टीवी के आगे से हटता न था।सुबह दोनों बेटा-बहू ऑफिस चले जाते और फिर देर शाम को ही उनका आना होता। घर आते ही दोनों मेरे पास बैठकर खूब बातें किया करते थे, कि पापा बोरियत न महसूस करें। दोनों के सुघड़ व्यवहार ने मेरी पुरानी सडी गली संकुचित अवधारणा को पूरी तरह बदल दिया था। सुबह सुबह मैं भी अन्य बुजुर्गों की तरह पार्क में टहलने जाने लगा। एक दिन मैं जब टहल कर बेंच पर बैठ आराम फरमा रहा था तभी एक महिला अपनी पोती के साथ वहाँ आयी, और हांफते हुऐ बेंच पर बैठ गई। उनकी पोती बार बार टहलने को कह रही थी लेकिन दम फूलने की वजह से वे बेबस थी।
मैंने उनसे आग्रह किया कि अगर आपको कोई ऐतराज न हो तो मैं इसे घुमा कर ले आता हूँ उन्होंने हाँ बोलकर सहमति दे दी। बच्ची बहुत प्यारी थी बहुत जल्दी ही मुझसे घुल मिल गई। फिर तो रोज घुमाने का सिलसिला शुरू हुआ। एक दिन बात ही बात में “अनुपमा” उस बच्ची की दादी ने बताया कि उनके पति भारतीय फौज में बडे अधिकारी थे, आतंकवादियों से एक मुठभेड़ में उनकी मौत हो गई, तभी से वह बेटा-बहू के पास रह रहीं हैं। वे उन दोनों के लिए बोझ जैसी हैं, लेकिन बेटे के सिवाय उनका कोई और है भी तो नहीं, जिसके पास वे जायें। पति के पेंशन की वजह से दो रोटी और छत मयस्सर है नहीं तो कब की अनाथालय में पडी होती। उनके बेटे और बहू पर गुस्सा तो बहुत आया लेकिन मैं क्या कर सकता था। अब तो रोज सुबह शाम अनुपमा जी से खूब बातें होने लगीं, मजेदार शख्शियत की मालिक थीं अनुपमा जी। खूब कहानियां सुनाती, चुटकुलों पर हम घंटों बहस कर हँसा करते। अनुपमा जी की मदद करने में एक अजीब सी अनुभूति होती जिसे मैं बाद में समझ पाया।
यूँ ही मिलते मिलते न जाने कब हम इतने करीब आ गये समझ नहीं आया शायद हम दोनों एक दूसरे से प्यार करने लगे थे।मुझे “अनुपमा” में “संध्या” की झलक नजर आती तो उसकी निगाहें हमेशा मुझे खोजती रहतीं। एक दिन बातों ही बातों में मैंने उससे अपनी दिल की बात कह दी।उसने बडे सहज होकर कहा कि अब मेरी मर्जी नहीं चलती सब कुछ बेटा बहू फैसला करते हैं। अगर वो तैयार हो जायेंगे तो ये मेरी खुशनसीबी होगी। भारतीय समाज में इस उम्र में शादी कोई स्वीकार नहीं करता, लेकिन मैं एक सार्थक प्रयास करना चाहत था।बहुत दिनों बाद अपने लिए जीने की इच्छा बलवती हुई थी, और समाज के चलते मैं इस पाक रिश्ते को यूँ हीं मरने देना नहीं चाहता था। मैंने बडा फैसला लेने का मन बना लिया था उसमें अनुपमा की भी मौन स्वीकृति थी। मैं जानता था वो भी मेरे साथ बाकी की बची जिंदगी हँसी खुशी के साथ जीना चाहती थीं।
रविवार की छुट्टी के दिन मैं बेटा-बहू से इस विषय में बात करना चाहता था, मगर अंदर की झिझक मुझे ऐसा करने से रोक रही थी। अभी ये सोच ही रहा था कि बेटा-बहू मेरे कमरे में आये और बातें करने लगे। मैं अपनी और अनुपमा की कहानी उसे किरदार बदलकर सुनाया और उनसे पूछा कि दोनों बुजुर्गों को क्या करना चाहिए।क्षणभर में दोनों का जवाब मिला दोनों को शादी करके एक दूसरे के पूरक बनना चाहिए। मैंने पूछा कि अगर उस कहानी का पुरूष किरदार मैं हूँ तो क्या तुम लोगों का जवाब यही होगा?बेटा बहू ने तुरंत कहा “बिल्कुल”। मैंने अपने और अनुपमा के विषय में उन्हें बताया। बेटे ने मुझे गले लगाते हुए कहा, पापा आपके हर कदम पर हम आपके साथ हैं।
बहू ने मिठाई लाकर मुझे खिलाया और कहा मुझे सास के रूप में मेरी माँ मिल जायेगी। दूसरे दिन बेटे और बहू ने अनुपमा के बेटे से बात की। दोनों पहले से ही उनसे छुटकारा पाना चाहते थे, उनकी मन की मुराद पूरी हो रही थी। दोनों की शादी बच्चों की सहमति से मंदिर में हो गई। हम दोनों की खुशी से बच्चे बहुत खुश थे। “संध्या” की तस्वीर के सामने जब हम दोनों खडे हुऐ तो लगा, मानों संध्या हम दोनों को आशीर्वाद दे रही है और कह रही है, कि मैं वापस तुम्हारे पास अनुपमा के रूप में लौट आईं हूँ।
अजय श्रीवास्तव






