गरम दाल का छौंक,
हींग की महक, महक कर
बहका दे धीरज को
तुम हौले से गुनगुनाना।
गोल चपाती राह देखती
उसे बस याद करके
माथे की सिलवटें
क्षणिक मिटा आना।
दिन भर की
झुंझलाहट की धूल,
हुई गर कोई भूल
पोर्च के पायदान पर
अच्छे से सब झाड आना।
किलकते बच्चे राह तकते
वो याद करके, तल्खियां
ताक पर टांग के आना।
सर झुकाए खड़ी भार्या
मान का मान बढाने
उस झुकी ड्योढी को उठाने
अहम का त्याग कर आना
जब घर आना।
कंगना की खनखन,
झुमकों की झिलमिल,
झांझर की झनक झनकाने,
खौफ को खौफ के
सुपुर्द करके आना।
मां के मन के मनके,
पिता की लरजती लाठी,
ठकठक करके,
बरबस दर टटोले
कांधे चौड़े करके आना
जब घर आना।
घर पुकारे
अपनेपन से
अकुलाहट अपनी भूल,
बाहें तुम फैला कर आना।
तज रज रंज रंग सब
मन मुदित धर
मृदु मुस्कान
तुम दर खटखटाना।
थकन, अगन
हर दंश चुभन
तन मन के
हर हर तमस
दूर से इक सदा लगाना
जब घर आना।
सुनो
तुम मैं नहीं
‘हम’ बनकर आना
अंग नहीं
तन बन कर आना
जब घर आना ।
नर नहीं
पुरुष नहीं,
शर नहीं
सुरूर नहीं
नीर बनकर आना
जब घर आना।
कोना कोना
खिल उठेगा
आंगन भी
पुलकित होगा ।
सुनो,
जब घर आना।
डॉक्टर नीलिमा सोनी ‘कृति
व्याख्याता
झोटवाडा, जयपुर





