मातृ दिवस पर विशेष…. एक पाती माँ के नाम…
ममता नेह समर्पण सौरभ महके जिसके प्यार में।।
रिश्ता माँ से बढ़कर कोई और नहीं संसार में।।
हमने जिसमें आँखें खोली।
वो थी माँ आँचल की झोली।
कर मधुमय पय-पान वहीं पर,
सीखी हमने पहली बोली।
घुटनों के बल दौड़ उसे दौड़ाया आँगन द्वार में…..
रिश्ता माँ से बढ़कर कोई और नहीं संसार मे….
रीझा करती है बचपन पर।
खीझा करती नटखटपन पर।
भर जाती मातृत्व गर्व से,
अपने देह-अंश युवपन पर।
संस्कार की शिक्षा देती जीवन के व्यवहार में…..
रिश्ता माँ से बढ़कर कोई और नहीं संसार में….
जाने कितनी पीर सही है।
माँ ने पर कब किसे कही है।
हम बोले यदि कभी सामने,
विहँस मौन माँ खड़ी रही है।
उसने सारे दर्द छुपाये मन के सुप्तागार में…
रिश्ता माँ से बढ़कर कोई और नहीं संसार में….
अब शायद हम बड़े हुए हैं।
सोच रहे खुद खड़े हुए हैं।
घोंट गला माँ अरमानों का,
बेघर करने अड़े हुए हैं।
फिर भी स्वर आशीष भरे हैं इन सबके प्रतिकार में…
रिश्ता माँ से बढ़कर कोई और नहीं संसार में….
छोड़ गई हो माँ बचपन में।
याद शेष बस रहती मन में।
जिनके सिर साया है माँ का,
समझो स्वर्ग बसा आँगन में।
माँ ईश्वर का रूप छाँव बरगद सी है परिवार में…
रिश्ता माँ से बढ़कर कोई और नहीं संसार में…
©️कल्याण गुर्जर “कल्याण”






