पहन कर लाल साड़ी
आई थी ब्याह कर
रस्मों रिवाजों के साथ
लाई थी संस्कार
प्रेम की पोटली बांध कर
दी थी माँ ने
फैला देना घर भर में
आशीषों के संग
बाबुल का द्वार छोड़
चल दी वो भी
नये परिवार में
सपनों को भर लाई थी संग में
पर खो सी गई नये परिवार में
नये रिश्ते मिले
और भर दिए रंग
उसने प्रेम के
निभाई सारी कसमें
मुस्कान बिखरे
पलकें भी भीगी
कई बार
दिखी नहीं पर किसी को
ये रहस्य जानता था
केवल सिराहने रखा तकिया
आज फिर विदा हो रही है
नयी दुनिया के लिए
लाल साड़ी में
उन सपनों को लेकर
जो भर लाई थी संग में
कवयित्री प्रज्ञा श्रीवास्तव “प्रज्ञाञ्जलि”





