लखनऊ की एक अलग पहचान कायस्थों की होली

लखनऊ की होली, बाहर से देखिए तो लगेगा बस रंग, गुलाल, हँसी-ठिठोली तक नजर आती है। मगर भीतर उतरकर देखिए तो यह शहर फागुन में सिर्फ़ रंग नहीं बदलता, मिज़ाज भी बदलता है। यहाँ होली एक दिन का नहीं, कई दिनों का सिलसिला है। होलाष्टक लगते ही गली-कूचों में जैसे कोई अदृश्य ढोल बजने लगता है। दुकानें, घर, छतें, चौक-चौराहे हर जगह एक हलचल। और इस हलचल के बीच अगर किसी ने इस शहर की होली को उसके असली रस में संभाल कर रखा है, तो उसमें कायस्थ बिरादरी की हिस्सेदारी को नज़रअंदाज़ करना बेईमानी होगी। लखनऊ की तहज़ीब को अक्सर नवाबों से जोड़कर देखा जाता है। सच है, पर अधूरा सच। तहज़ीब महलों से निकलकर जब गलियों में उतरती है, तभी ज़िंदा रहती है। होली इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मुस्लिम समाज आम तौर पर रंगों से परहेज़ करता रहा, फिर भी लखनऊ की होली कभी फीकी नहीं पड़ी। वजह साफ़ है यहाँ त्योहार मजहब से नहीं, मिज़ाज से तय होते हैं। और इस मिज़ाज को सबसे सहजता से निभाने वालों में कायस्थ आगे रहे। कायस्थों की होली का मतलब सिर्फ़ पिचकारी और गुलाल नहीं है। उनके यहाँ होली पेट से शुरू होकर दिल तक जाती है। गोश्त, कलेजी, कीमा, दुलमा ये सिर्फ़ व्यंजन नहीं, फागुन की ज़रूरतें हैं। होली हो और गोश्त न बने, तो कायस्थ खुद को अधूरा मानता है। शराब का ज़िक्र दबे पाँव आता है, मगर आता ज़रूर है। कलेजी भुनी न हो तो जाम कैसे उतरे यह तर्क नहीं, परंपरा है। आज के दौर में लोग भूल गए हैं कि पचास-साठ साल पहले न गैस थी, न कुकर। मिट्टी के चूल्हे, लकड़ी, कोयला और घंटों की मेहनत। मांसाहार पकाना आसान काम नहीं था। मसाले कूटे जाते थे, प्याज हाथ से छीले जाते थे, और सब कुछ इत्मीनान से बनता था। इस पूरी प्रक्रिया की रीढ़ महिलाएं थीं। उनके बिना कायस्थों की होली का कोई ज़िक्र ही नहीं बनता। त्योहार का सारा शोर बाहर दिखता है, पर उसकी असली मेहनत रसोई में होती है।

लखनऊ में कायस्थों की आबादी बड़ी रही है। मशकगंज, निवाज़गंज, बाबूगंज, नौबस्ता, रकाबगंज ये सिर्फ़ मोहल्ले नहीं, कायस्थ संस्कृति की पहचान रहे हैं। होली के दिन इन इलाकों से गुज़रिए तो हर घर से पकवानो और नॉनवेज की अलग-अलग खुशबू आएगी। कहीं मटन चढ़ा है, कहीं कलेजी सिक रही है, कहीं कीमा मटर। और इन सबके बीच कहीं न कहीं गिलास टकराने की आवाज़ भी सुनाई दे जाएगी। इसे छिपाया नहीं जाता था, बस दिखावे से बचा जाता था यही लखनवी अदा है। कायस्थों की होली में एक और बात खास रही, सफाई और सलीका। गरीब से गरीब कायस्थ फटा कपड़ा पहन लेगा, पर साफ़। और खाते-पीते घरों के लोग? वे तो हमेशा उजले, धुले, चमकते कपड़ों में ही रंग खेलते थे। रंग पड़े तो निखरे, मैल न बने। कालिख पोतना, भद्दा मज़ाक यह सब उन्हें कभी रास नहीं आया। हुड़दंग भी नफासत के साथ यही फर्क था। कायस्थों को अक्सर आधा मुसलमान कहा गया। वजह भी साफ़ थी गोश्त और शराब उनकी दिनचर्या में शामिल रहे। लेकिन यह तंज नहीं, लखनऊ में एक तरह की पहचान थी। इस पहचान ने ही उन्हें अलग बनाया। उनके घरों में ब्राह्मण, वैश्य, बनिया सब आते थे। कई ऐसे घर थे, जहाँ बाहर मांसाहार निषिद्ध था, मगर होली में युवक कायस्थों के यहाँ ज़रूर पहुँचते थे। उन्हें पता होता था यहाँ रोक-टोक नहीं, स्वागत मिलेगा। कायस्थों को खुद खाने से ज़्यादा खिलाने का शौक रहा है। आओ भाई, लो पीयो, खाओ यह सिर्फ़ कहावत नहीं थी, व्यवहार था। दुलमा को लेकर कितनी ही कहानियाँ हैं। कई लोग उसे मटर की सब्जी समझकर खा गए और बाद में पता चला कि उसमें कीमा भी था। फिर पछतावा नहीं, उलटा अगली बार बुलाने की गुज़ारिश। कायस्थों ने कभी किसी का भेद नहीं खोला। खिलाया भी, और बताया भी नहीं यह भी एक तरह की तहज़ीब है।

आज भी कायस्थ परिवारों में शादी तय होते समय पहला सवाल खान-पान का होता है। लड़की शाकाहारी है, तो क्या घर में मांस बनने से परहेज तो नहीं होगा? लेकिन यह सवाल टकराव का नहीं, तालमेल का होता है। कई घरों में आज भी शाकाहारी और मांसाहारी रसोई साथ-साथ चलती है। अलग बर्तन, अलग चूल्हा पर एक ही परिवार। लखनऊ ने यही सिखाया है, कि खाना वजह बनकर रिश्ते नहीं तोड़ता। कायस्थों की होली में इत्र की भूमिका भी कम अहम नहीं। अबीर-गुलाल में खस मिलाना, गीले रंग में इत्र डालना, ताकि रंग पड़े तो बदन भी महके। शाम होते-होते नए धुले कपड़े, खस या हिना की खुशबू, और गले मिलना यह रस्म आज भी जिंदा है। अमीनाबाद, रकाबगंज, सआदतगंज की गलियों में यह मंजर अब भी मिल जाता है, बस देखने वाली नजर चाहिए। आज का लखनऊ बदल गया है। फ्लैट, सोसाइटी, डीजे सब आ गए हैं। पर होली का असली रस अब भी पुराने घरों, पुरानी गलियों में बसता है। कायस्थों की होली अब पहले जैसी खुली न सही, पर उसकी आत्मा अब भी ज़िंदा है। गोश्त की खुशबू, इत्र की महक, रंगों की फुहार और खिलाने-पिलाने की दरियादिली यह सब मिलकर लखनऊ की होली को वह बनाते हैं, जो वह है। और शायद इसीलिए कहा जाता है लखनऊ की होली सिर्फ़ देखी नहीं जाती, चखी जाती है।

संजय सक्सेना, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
(ये लेखक के अपने स्वयं के निजी विचार हैं)

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