
संसद के प्रस्तावित विशेष सत्र से पहले ही राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाते हुए कहा है कि महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े अहम संविधान संशोधन विधेयकों का मसौदा अभी तक सांसदों के साथ साझा नहीं किया गया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे संसद की गरिमा के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा कि सत्र शुरू होने में महज 48 घंटे बचे हैं, लेकिन अब तक किसी भी सांसद को प्रस्तावित संशोधन विधेयकों की प्रति नहीं मिली है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि सरकार लगातार संसद की अनदेखी कर रही है। उन्होंने इस रवैये को तानाशाही करार दिया।
उधर, कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि विशेष सत्र के आयोजन में पारदर्शिता का अभाव साफ नजर आता है। उन्होंने कहा कि जब देश के कुछ राज्यों में चुनाव प्रचार अपने चरम पर है, ऐसे समय में सत्र बुलाना उचित नहीं है। साथ ही उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सांसदों को उन संवैधानिक संशोधन विधेयकों की जानकारी तक नहीं दी गई, जिन पर उन्हें चर्चा और मतदान करना है। जयराम रमेश ने यह भी कहा कि विपक्ष की ओर से सर्वदलीय बैठक को चुनाव के बाद आयोजित करने का सुझाव दिया गया था, लेकिन सरकार ने इसे खारिज कर दिया। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अपमान बताया। बताया जा रहा है कि इस विशेष सत्र में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023’ से जुड़े महत्वपूर्ण संशोधनों पर चर्चा हो सकती है। केंद्रीय कैबिनेट पहले ही इस विधेयक के मसौदे को मंजूरी दे चुकी है, जिसका उद्देश्य 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण लागू करना है।
प्रस्तावित बदलावों के तहत लोकसभा की सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 करने की योजना है, जिसमें 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इसके साथ ही परिसीमन अधिनियम में संशोधन कर नए सिरे से निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा, एक अन्य प्रस्ताव के तहत दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में भी महिला आरक्षण लागू करने की तैयारी है। विपक्ष का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण विधेयकों पर बिना पूर्व जानकारी के चर्चा कराना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है, जबकि सरकार की ओर से अभी तक इस पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।






