
संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन बिल एक साथ लाने पर गृह मंत्री ने दिया जवाब
संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयकों को एक साथ पेश किए जाने को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। सरकार का तर्क है कि 33 प्रतिशत महिला आरक्षण को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए परिसीमन आवश्यक है, इसलिए दोनों प्रस्ताव एक साथ लाए गए हैं। वहीं विपक्ष, विशेष रूप से कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल, इसे संसदीय परंपराओं के विपरीत बताते हुए इसका विरोध कर रहे हैं। इस मुद्दे पर सदन में तीखी बहस जारी है। आज संसद में आरक्षण और परिसीमन से जुड़े इन अहम विधेयकों को लेकर जोरदार चर्चा हो रही है। मुख्य सवाल यह है कि सरकार ने दोनों विषयों को एक साथ आगे बढ़ाने का फैसला क्यों किया। इस पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में स्पष्ट किया कि सरकार का उद्देश्य महिला आरक्षण को उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाना है। उन्होंने यह बयान कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल की आपत्ति के जवाब में दिया, जिन्होंने कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव पर सवाल उठाए थे। सरकार का कहना है कि महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया में परिसीमन एक अनिवार्य चरण है, इसलिए दोनों विधेयकों को साथ लाया गया है, ताकि लोकसभा और विधानसभा की सीटों का पुनर्गठन कर 33 प्रतिशत आरक्षण को सही ढंग से लागू किया जा सके।
कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने इस कदम का विरोध करते हुए कहा कि संविधान संशोधन विधेयक और सामान्य विधेयकों को एक साथ लाना संसदीय प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है। उनका मानना है कि यह नियमों के खिलाफ है और इसके नकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं। इसके जवाब में अमित शाह ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि संविधान संशोधन और सामान्य विधेयकों की मतदान प्रक्रिया अलग-अलग होती है, इसलिए इन्हें एक साथ प्रस्तुत करने में कोई बाधा नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि चूंकि दोनों विधेयकों का विषय आपस में जुड़ा हुआ है, इसलिए इन्हें एक साथ चर्चा के लिए लाना उचित है। अमित शाह ने यह भी दावा किया कि पूर्व में भी ऐसे उदाहरण रहे हैं, जब संबंधित विषयों पर एक साथ कई विधेयकों पर चर्चा की गई है, जैसे 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम के दौरान हुआ था। वहीं विपक्ष का आरोप है कि सरकार इन विधेयकों को एक साथ लाकर राजनीतिक और चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि इन मुद्दों पर अलग-अलग चर्चा होनी चाहिए थी। फिलहाल इस विषय पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक जारी है, जहां सरकार इसे सुधारात्मक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे असंतुलन पैदा करने वाला निर्णय मान रहा है।




