स्टेज पर हाथ लहराते हुए हुजूम का अभिनन्दन करते हुए धुनकी को देख आज सियाली को अकस्मात ही अपनी माँ, मंदिर की मूरत सम भीड़ में नज़र आ रही थी। जिनकी सूर्य की तरह दमकती गरिमामयी छवि न जाने कितने दशकों के दुर्दिनों के ग्रहण का प्रसाद थी।
सजल नेत्रों ने न जाने कब हृदय की गहरी कंदराओं में सेंध लगाकर सियाली को उस गर्दिशी के भूतकाल मे ले जा पटका जहाँ से तिल-तिल मरकर,खपकर धुनकी अपने शराबी पति रामदीन का पेट भी अपना पेट काटकर भर रही थी।
तक़दीर की काली बदरी और भी स्याह होती दिखी, जब बेवक़्त भूख की नाल में धौकनी बनकर उसका जन्म हुआ। कुपोषण की शिकार तो उसकी माँ पहले ही थी। रही सही कसर छाती को नोच-नोच..उफ़्फ़ ..!!
न जाने कहाँ से धुनकी को इतनी ताक़त आ गई थी कि छाती में जोंक की तरह बिटिया को चिपकाकर दोनों हाथों में गट्ठर पर गट्ठर ढो-ढोकर कोल्हू का बैल बन गई थी।
कितने ही सर्द,गर्म मौसमों की मार उसके नूर को नमक बनाती रही और वो थी कि रेत सी तप-तपकर ढलती रही स्वर्ण मूरत की तरह।
काफी मत्था पटकने पर सियाली को याद आया कि,जब वो दो साल की रही होगी तब आषाढ़ की काली रात माँ के साथ वो भी पानी मे तरबतर होकर मजदूरी कर रही थी, और कब अचानक भूख की सुरसा के साथ ही निमोनिया के राक्षस ने भी उसे निगलने में कोई कोर-कसर नही छोड़ी थी।
पिता रामदीन तो नशे में धुत पड़ा था। माँ धुनकी तेज ज्वर में तपती बिटिया को लेकर पास के गाँव भागी थी। नई-नई आई डॉक्टर शीतल का दरवाजा बेतहाशा खटखटाती रही। जैसे ही दरवाजा खुला वह बेहोश हो चुकी थी। पास रोती, तड़पती बिटिया को देख उसने उठाकर भींच लिया था और धुनकी को पलंग पर लेटाकर ग्लूकोज चढ़ाया था।
न जाने पिछले जन्म में कौनसे पुण्य किये होंगे उसने कि उसके बाद दोनो की काया व क़िस्मत के रंग बदलते देर न लगी।
धुनकी की बेबसी की दास्तां ने शीतल जी को अंदर तक हिलाकर रख दिया।
धुनकी को उन्होंने अपने यहाँ काम पर रख लिया और साथ ही उसके सिलाई-बुनाई के हुनर को देखते हुए एक सिलाई मशीन भी लाकर दे दी। जब वो खाली समय मे रहती तो सिलाई,बुनाई का काम करने लगी। उसके पति रामदीन को भी शीतल जी ने सख्त हिदायत दे डाली कि, “या तो काम में हाथ बटाओ अन्यथा एक पैसा नही दिया जाएगा। गर मारपीट की तो धुनकी पुलिस को बुला लेगी। “
सुनकर रामदीन का चेहरा सफेद पड़ गया था,
“माफ़ करना डॉक्टर साहिबा अब से कोनू ग़लती नही होगी। मैं भी मिनख बनकर दिखाऊंगा आपको।”
सियाली को शीतल जी ने गोद ले लिया था, “इसकी पढ़ाई व कन्यादान मेरे हाथों से होगा। आज से ये मेरी भी बेटी है पर माँ तुमको ही पुकारेगी।”
धुनकी को समझ नही आ रहा था कि क़िस्मत पर ख़ुशी में हँसे की रोये।
“धान की तरह जिंदगीभर धूनी जाती रही थी आज धान के बीज की ईश्वर को सुध कैसे हो गई।”
वक़्त कब पंख लगाकर उड़ता जा रहा था पता ही न चला। धीरे-धीरे सियाली जैसे-जैसे विद्यालय के पायदान चढ़ते-चढ़ते मेडिकल कॉलेज में आ गई । वैसे-वैसे धुनकी ने भी गाँव मे सिलाई प्रशिक्षण केंद्र खोल लिया और सैकड़ो महिलाओं को जोड़ लिया। प्रतिनिधित्व की क्षमता न जाने कहाँ से आ गई थी उसमें कि कब मजदूर से समाज सेविका बन गई वो भी समझ नही पाई।
“वो कहते है ना जब पारस जौहरी के हाथ लग जाये तभी पत्थर सोने में तब्दील हो पाता है।”
शायद शीतल जी ही वो जौहरी थी जिन्हें ईश्वर ने चुनकर भेजा होगा।
इस बार जब गांव में सरपंच के चुनाव हुए तो पुराने प्रत्याशी नाथूराम के भाई-भतीजावाद से सब छुटकारा पाना चाहते थे। गांव के विकास व मजदूरों के हित मे भी सिर्फ वादाखिलाफी के अलावा और कुछ नही किया था उसने।
रही सही कसर अपने बेटे को शहर के नामचीन कॉलेज में रिश्वत देकर दाखिला करवाकर पूरी करदी। जर्जर मकान को भी कब हवेली में तब्दील कर दिया उसने किसी को रातोरात ख़बर न लगी ।
शीतल जी की समझाइश पर इस बार गांव की महिलाओं ने ठान लिया था कि धुनकी को ही अपना सरपंच चुनेगी।
बड़ी मुश्किल से तैयार हुई थी वो और इस काम को अंजाम उसी के पति ने दिया था जो कभी नशे में धुत बेसुध पड़ा रहता था। आज वो भी उसके काम मे हाथ बंटा रहा था।
किसी ने सच ही कहा है ..” भय बिन प्रीत न होई..”
शायद डॉक्टर जी की पुलिस धमकी का ही कमाल था जो जानवर आज मिनख बन गया था।
चुनाव प्रत्याशियों को टिकट दे दिये गये थे। महीने भर में पुरजोर आर या पार के युद्ध के चक्रव्यूह को भेदना था। चार प्रत्याशियों में सिर्फ वो ही महिला प्रत्याशी खड़ी हुई थी बाकी सब नामचीन पुरुष जात।
एक बार तो सिहर गई धुनकी ..” नहीं मैडम मुझसे नाही होत पायेगा चुनाव, वुनाव.. हमरे को माफ करो हम तो इत्ता मुकाम पा लिए सो ही प्रभु की मर्जी से .. अब और ना ही चाहिये कोनू हमको..ई मरद जात से नही टकरा सकत हम। माफ करो हमका।”
धुनकी को सुबकता देख शीतल जी सकते में आ गई थी।
एक आईने की तरह सब साफ-साफ़ खोलकर रख दिया था उन्होंने कि ..कितने ज़ुल्म व नापाक इरादे लिये घूम रहे थे विपक्ष के प्रत्याशी बाड़े में खुले शेरों की तरह।
कब, किसे शिकार बना ले कोई नही जानता।
“देखो धुनकी अब इस पिंजरे की कमान तुम्हारे ही हाथ में है । तुम यदि जीत गई तो बाजी पलट जाएगी और तुम्हारे जैसे कितने ही गर्दिशी में जर-जर मरते मजदूरों की भी दशा सुधर जाएगी। अब सोच लो तुम अब तुम्हारे दुर्दिनों के हिसाब मांगने का भी वक़्त आ गया है। जागो नींद से धुनकी जागो… उठो आगे बढ़ो अब कमान तुम्हारे ही हाथों में होगी। उठो धुनकी उठो…।”
अचानक न जाने कहाँ से उसमें नया जोश नया रक्त संचारित होने लगा। खून खोलने लगा । काली रातों का वृतचित्र सामने से गुजरने लगा। कब वो पसीने में तर-बतर हो गई पता ही न चला।
अगले दिन नई पार्टी के साथ ही नए चुनाव चिह्न की जद्दोजहद शुरू हो गई। सब लोग कुछ न कुछ नया चुनाव चिह्न सुझा रहे थे, पर धुनकी को कुछ भी पसंद नही आ रहा था। दूसरे दिन हेतु कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया।
मध्य रात्रि जाने क्या हुआ गहरी नींद में न जाने कहाँ से दर्दीले स्वप्न ने सेंध लगा दी। उसके सामने वह खुद दोनो हाथों में गट्ठर उठाकर छाती से सियाली को जोंक की तरह चिपकाकर आती दिखाई दे रही थी।
अकस्मात कराहती हुई भयाक्रांत वो उठ बैठी और बड़बड़ाने लगी,”हे प्रभु हमार बिटिया की जान बक्स दो चाहे बदले में हमरा जान ले लो…।”
रामदीन ने घबराई धुनकी को बाहों में भींच लिया और आंसू पोंछते हुए सारा हाल पूछा। एकाएक दोनो काफी देर तक चुप्पी साधे रहे और सोचते रहे कि, “ये सब क्यों दिखा..
आख़िर उस छवि के दिखने के पीछे का क्या रहस्य हो सकता है ?”
अचानक रामदीन चहक पड़ा..” अरी पगली प्रभु भी चाहत रहे कि तुम्हारी वैसी ही स्वप्निल छवि से मिलती औरत की तस्वीर चुनाव चिह्न के रूप में रक्खे हम। समझी की ना ही?”
धुनकी की आंखे भी तेजोमय हो गई..” हाँ सही कहत रहे सियाली के बापू। हम वैसी ही दुर्दिन की छवि की फूटवा खिंचवाकर चुनाव चिह्न बनावत रहे। देखना कैसे सबके दिलों को चीर डालेगा। “
धुनकी के भाषण ने भी मानो सबकी हृदय की कंदराओं को भेदकर रख दिया था। जैसे-तैसे संघर्षरत माहौल में चुनाव सम्पन्न हुए।
आख़िर वो भी दिन आ गया जब चुनाव घोषित होने वाले थे। सबकी सांसे अटकी हुई थी। अटकलों ने बड़े महकमों को और गरमा दिया था..”एक औरत जात आख़िर क्या उखाड़ लेगी। देखना जीत हमारी ही होगी।”
औऱ भी न जाने क्या-क्या।
वोटो की गणना शुरू हो गई और अंततः वो घड़ी आ ही गई जब सरपंच की घोषणा होने वाली थी।
“सबकी सांसे थम सी गई थी।
धुनकी सपने मे जम सी गई थी।”
अकस्मात ही सियाली को अपने कंधे पर किसी का हाथ महसूस हुआ जैसे नींद से जागी हो वो “शीतल मेम आप..! आप तो कल शहर चली गई थी ना ? देखो..देखो मेम वो देखो ..!! आखिर मेरी माँ ने मुकाम हासिल कर ही लिया। सब आपके आशीर्वाद का नतीजा है मेम।”
शीतल जी ने उसे बाहों में भींच लिया। दोनों की अखियों से खुशी की बदरी अनवरत बरस रही थी।
सामने हाथ लहराते धुनकी न जाने कब वक़्त के साथ गांव के मध्य अविस्मरणीय गरिमामय मूरत में तब्दील हो गई पता ही न चला।
आज सियाली डॉक्टर बनकर अपने ही गांव मे पदस्थापित हो गई थी और उसी गली के नुक्कड़ में प्रतीक्षारत थी जहाँ से न जाने कब फिर कोई धुनकी अपनी सियाली को लेकर उसके दरवाजे तक आती दिख जाए।
प्रीति जैन ‘स्वप्नरंजिता’






