नई दिल्ली। अयोध्या स्थित राम मंदिर को प्राप्त चंदे में कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच संबंधी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता से पूछा कि इस मामले में इतनी जल्दबाजी की क्या आवश्यकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ग्रीष्मकालीन अवकाश समाप्त होने के बाद याचिका को नियमित सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा।

यह याचिका राम मंदिर को मिले चंदे के कथित दुरुपयोग और वित्तीय अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच कराने की मांग को लेकर दायर की गई है। फिलहाल इस मामले की जांच उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) कर रहा है, जबकि याचिकाकर्ता सीबीआई के नेतृत्व में जांच की मांग कर रहे हैं। न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरश और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता ने मामले की तत्काल सुनवाई का आग्रह किया। इस दौरान अदालत ने पूछा, “इस मामले में इतनी जल्दबाजी क्या है?” इसके बाद पीठ ने कहा कि न्यायालय दोबारा खुलने के बाद याचिका को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। हालांकि, अदालत ने मामले के गुण-दोष (मेरिट) पर फिलहाल कोई टिप्पणी नहीं की। याचिका में आरोप लगाया गया है कि अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कार्यों तथा मंदिर को प्राप्त चंदे के उपयोग में कथित वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं। याचिकाकर्ताओं ने पूरे मामले की निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और दानदाताओं के विश्वास को बनाए रखने के लिए स्वतंत्र एजेंसी से जांच आवश्यक है। हालांकि, यह उल्लेखनीय है कि इन आरोपों पर अभी तक किसी सक्षम न्यायालय द्वारा कोई निष्कर्ष या पुष्टि नहीं की गई है।

केंद्र और राज्य सरकार से क्या मांग की गई
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को निर्देश देने की मांग की गई है कि मंदिर को प्राप्त दान और वित्तीय प्रबंधन की निगरानी, ऑडिट तथा पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी व्यवस्था लागू की जाए। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि आरोप सही साबित होते हैं तो इसका असर करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं और सार्वजनिक विश्वास पर पड़ेगा।
पहले से चल रही है एसआईटी जांच
उत्तर प्रदेश सरकार ने 13 जून को मंदिर ट्रस्ट के अनुरोध पर एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया था। इस टीम में लखनऊ मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत, पुलिस महानिरीक्षक किरण एस और वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन को शामिल किया गया है। एसआईटी कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच कर रही है। हालांकि, याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि बिना एफआईआर दर्ज किए जांच शुरू किए जाने से इसकी निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। इसी आधार पर उन्होंने सीबीआई से जांच कराने की मांग की है।
सीबीआई जांच की मांग क्यों
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मामला बड़े वित्तीय लेन-देन और संभावित आपराधिक पहलुओं से जुड़ा है। ऐसे में प्रशासनिक अधिकारियों की एसआईटी के बजाय सीबीआई के नेतृत्व में बहु-विषयक जांच दल गठित किया जाना चाहिए, ताकि पूरे मामले की निष्पक्ष और पेशेवर तरीके से जांच हो सके तथा जनता का भरोसा कायम रहे। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल केवल तत्काल सुनवाई की मांग को अस्वीकार किया है। मामले के तथ्यों या आरोपों की वैधता पर अदालत ने कोई राय व्यक्त नहीं की है। अब यह याचिका अदालत के पुनः खुलने के बाद नियमित सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होगी, जिसके बाद इस मामले में न्यायालय का अगला रुख सामने आएगा।






