गांधी बनाम गांधी की ‘जंग’ में बीजेपी के लिए अप्रसांगिक होते जा रहे हैं, मेनका-वरुण

भारतीय जनता पार्टी के लिए उसके युवा सांसद वरूण गांधी ‘गले की फांस’ बनते जा  रहे हैं। वरूण गांधी लगातार मोदी-योगी सरकार के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं। खासकर किसानों को लेकर वरूण अपनी ही पार्टी की सरकार से जबाव तलब करने लगे हैं। किसानों के आंदोलन से बीजेपी उतनी बेचैन नहीं हुई होगी, जितनी बेचैनी वरूण गांधी ने बढ़ा रखी है। शायद ही कोई दिन ऐसा जाता होगा, जब वरूण पार्टी के खिलाफ बयान नहीं देते होंगे। वरूण को पार्टी के खिलाफ बयानबाजी का खामियाजा भी भुगतना पड़ रहा है। उन्हें भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर कर दिया गया है। वरूण के चलते उनकी मॉ मेनका गांधी भी पार्टी में सम्मान खोती जा रही हैं। मेनका गांधी को हाल ही में मोदी मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है, तो पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से भी उन्हें बाहर कर दिया गया है। वरूण क्यों अपनी ही सरकार के खिलाफ मुखर है, इसका जब जवाब तलाशा गया तो लोगों का कहना था कि वरूण गांधी मोदी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिल पाने की वजह से पार्टी और मोदी से नाराज बताए जाते हैं। इसी नाराजगी ने वरूण का राहुल-प्रियंका की तरफ मोह बढ़ा दिया है। इससे इतर राजनीति के कुछ जानकार भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मां-बेटे को जगह नहीं मिलने का यह भी मतलब निकाल रहे हैं, कि जैसे-जैसे सोनिया गांधी कांग्रेस में कमजोर पड़ रही हैं, वैसे-वैसे भाजपा में मेनका-वरुण की अहमियत भी कम होती जा रही है। बीजेपी के लिए मेनका और वरूण तभी तक प्रसांगिक थे, जब तक गांधी परिवार में टकराव चल रहा था। बीजेपी गांधी बनाम गांधी की लड़ाई में अपना हित तलाशती रहती थी, जिसकी अब उसे कोई जरूरत नहीं रह गई है।
बात उस समय की है जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान थे, और बीजेपी उत्तर प्रदेश में अपनी जड़े तलाश रही थी। उस समय बीजेपी में यह आम धारण बन गई थी कि उत्तर प्रदेश में सोनिया गांधी का मुकाबला अगर कोई कर सकता है तो वह दिवंगत संजय गांधी की बेवा पत्नी मेनका गांधी ही है। सोनिया और मेनका के रिश्तों में पड़ी दरार और इंदिरा गांधी की मेनका से नाराजगी से हर कोई वाकिफ है और भाजपा ने पारिवारिक रिश्तों में पड़ी दरार और नाराजगी का सियासी फायदा उठाने की कोशिश की, और मेनका को पार्टी में शामिल किया। उन्हें उत्तर प्रदेश से लगातार लोकसभा चुनाव का टिकट दिया गया, और मेनका जीतकर संसद भी पहुंचती रही। लेकिन कांग्रेस के गिरते ग्राफ के कारण आज भाजपा के लिए मेनका और वरुण गांधी की राजनीतिक प्रासंगिकता नहीं रह गई है। दोनों की एंट्री भाजपा में इसलिए हुई थी, क्योंकि वह अपने हिसाब से गांधी परिवार को जवाब देना चाहती थी। 
बता दें मेनका-वरूण को बीजेपी नेता जो दिवंगत हो चुके हैं, प्रमोद महाजन पार्टी में लेकर आए थे। वे अक्सर कहा करते थे कि अब भाजपा में भी दो गांधी हैं, हमारे पास भी अब गांधी परिवार है और इस पर सिर्फ कांग्रेस का हक नहीं। मेनका गांधी जब भाजपा में शामिल हुई थीं तब भाजपा का उत्तर प्रदेश में असर कम था। मेनका की पार्टी में पूछ हुई। उनके पीछे-पीछे वरुण भी शामिल हो गए। भाजपा ने उन्हें बहुत कुछ दिया। मेनका गांधी को शामिल करके भाजपा ने एक बड़ा जोखिम लिया था क्योंकि वे संजय गांधी की पत्नी थीं। संजय गांधी पर आपातकाल लागू कराने की मुख्य भूमिका मानी जाती है। लेकिन पार्टी खुश थी कि सोनिया का मुकाबला करने के लिए इंदिरा की दूसरी बहू को लाकर उनकी काट ढूंढ ली गई थी। सूत्रों के मुताबिक बीजेपी आलाकमान द्वारा मेनका को समझाया गया कि उनके बेटे का भविष्य  भाजपा में ही सुररिक्ष है। अपने बेटे को सम्मानजक स्थान देने के शर्त पर ही मेनका भाजपा में शामिल हुई थीं।

खैर, गांधी परिवार की चौथी पीढ़ी के बीच नजदीकी से पहले की बात की जाए तो यह कहा जा सकता है कि भले ही जेठानी सोनिया गांधी और देवरानी मेनका गांधी के बीच के रिश्तों में काफी खटास थी, जिसके कारण दोनों एक-दूसरे से मिलना-जुलना भी नहीं पसंद करती थीं, इसकी बुनियाद संजय गांधी की मृत्यु के बाद पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के रहते ही पड़ गई थी। मेनका को पति की मौत के बाद ससुराल छोड़ना पड़ा था। मेनका के घर छोड़ने में सोनिया गांधी की भी भूमिका कम विवादास्पद नहीं रही थी, लेकिन जब राहुल और खासकर प्रियंका गांधी ने होश संभाला तो उन्होंने परिवार की इन दूरियों को काफी कम कर दिया। प्रियंका अपनी चाची मेनका गांधी और चचेरे भाई वरूण गांधी से समय-बेसमय मेल-मुलाकात करके हालचाल ले लिया करती थीं। इसी के चलते दोनों परिवारों के बीच रिश्तों की खाई काफी हद तक पट गई थी। एक तरफ गांधी परिवार के बीच की दूरियां सिमट रही थीं तो दूसरी तरफ बीजेपी में रहकर अपनी सियासत चमका रहे वरूण गांधी का बीजेपी से मोह भंग होता जा रहा था। इसकी सबसे बड़ी वजह प्रियंका वाड्रा को ही बताया जाता है। अब तो यहां तक चर्चा होने लगी है कि जल्द ही वरूण गांधी की घर ही नहीं कांग्रेस में भी एंट्री हो सकती है। इस बात का अहसास बीजेपी आलाकमान को भी हो गया है, इसलिए वह वरूण गांधी की नाराजगी को ज्यादा गंभीरता से नहीं ले रही है।
य़दि बात नये कृषि कानून के विरोध में किसान मोर्चा द्वारा मोदी के खिलाफ चलाए जा रहे आंदोलन में किसानों के पक्ष में वरूण गांधी की लगातार जारी बयानबाजी की, की जाए तो यह वरूण की सियासी मजबूरी भी है। वरूण गांधी उत्तर प्रदेश के किसान बाहुल्य क्षेत्र पीलीभीत से भारतीय जनता पार्टी के सांसद हैं। यानी किसान रूठ गया तो वरूण के लिए अपनी संसदीय सीट बचाना आसान नहीं रह जाएगा। इसीलिए किसानों को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार के साथ ही केन्द्र सरकार को वरूण लगातार सलाह देने के साथ ही पत्र भी लिख रहे हैं। गत दिनों वरूण ने उत्तर प्रदेश में धान की फसल को लेकर मंडियों में किसानों की उपेक्षा को लेकर भी ट्वीट किया था। इससे पहले वरुण गांधी ने उत्तर प्रदेश में बाढ़ के हालात को लेकर योगी आदित्यनाथ सरकार की आलोचना की थी। वरुण गांधी ने अपने संसदीय निर्वाचन क्षेत्र पीलीभीत में भारी बारिश के कारण आई जबरदस्त बाढ़ को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार पर हमला करते हुए कहा कि अगर आम आदमी को उसके हाल पर ही छोड़ दिया जाएगा तो फिर किसी प्रदेश में सरकार का क्या मतलब है। पीलीभीत से सांसद वरुण ने ट्वीट किया था, कि तराई का ज्यादातर इलाका बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित है। बाढ़ से प्रभावित लोगों को सूखा राशन उपलब्ध कराया है ताकि इस विभीषिका के खत्म होने तक कोई भी परिवार भूखा ना रहे। यह दुखद है कि जब आम आदमी को प्रशासनिक तंत्र की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तभी उसे उसके हाल पर छोड़ दिया जाता है। जब सब कुछ अपने आप ही करना है तो फिर सरकार का क्या मतलब है। लब्बोलुआब यह है कि वरूण गांधी अपनी ही पार्टी और सरकार पर हमलावर होकर मोदी-योगी के खिलाफ दबाव की राजनीति कर रहे थे, उन्हें लग रहा था कि पार्टी को उनकी बेहद जरूरत होगी, लेकिन बीजेपी आलाकमान ने दबाव में आने के बजाए वरूण से बात करना भी उचित नहीं समझा। ऐसे में वरूण गांधी या तो जो हालात बने हुए हैं, उसी में अपने आप को एडजेस्ट कर लें, वर्ना उनके लिए बाहर के दरवाजे भी खुले हुए हैं।

संजय सक्सेना, लखनऊ

विशिखा मीडिया

विशिखा ने जनवरी 2019 से राजस्थान की राजधानी जयपुर से हिंदी मासिक पत्रिका के रूप में अपनी नींव रखी। राजस्थान में सफलता का परचम फहराने के बाद विशिखा प्रबंधन ने अप्रैल 2021 से उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से मासिक पत्रिका के रूप में अपना प्रकाशन आरम्भ करने का निर्णय लिया। इसी बीच लोगों की प्रतिक्रियाएं आईं कि विशिखा का प्रकाशन दैनिक समाचार पत्र के रूप में भी होना चाहिये। पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए विशिखा प्रबंधन ने 1 जनवरी 2022 से जयपुर से दैनिक समाचार पत्र के रूप में भी अपना प्रकाशन आरम्भ किया। विशिखा में प्रमुख रूप से राजनैतिक गतिविधियों सहित, कला, समाज, पर्यटन, एवं अन्य विषयों से संबंधित विस्तृत आलेख प्रकाशित होते हैं। विशिखा पत्रिका ने अपने विस्तृत आलेखों और दैनिक न्यूज़ विश्लेषण के माध्यम से अपने पाठकों को जानकारी और ज्ञान की दुनिया में ले जाने का महत्वपूर्ण काम किया है। अपनी सटीक खबरों, विस्तृत रिपोर्टों और विशेष विषयों पर आधारित लेखों के साथ, विशिखा ने लगातार अपनी विश्वसनीयता बनायी हुई है। विशिखा मासिक पत्रिका की खबरों की गुणवत्ता, नवीनता और सटीकता को ध्यान में रखते हुए इस पत्रिका ने अपने पाठकों का दिल जीता है। यह पत्रिका न केवल जानकारी उपलब्ध कराती है, बल्कि लोगों के बीच अपने विचारों के आदान प्रदान के लिए एक मंच भी उपलब्ध करती है। इसके लेखक, संपादक और टीम का प्रयास निरंतर यह होता है कि पाठकों को एक अच्छा अनुभव देने के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक मुद्दों के साथ-साथ समस्याओं के समाधान पर ध्यान केंद्रित करें। विशिखा का लक्ष्य आपको विभिन्न विषयों पर अद्भुत लेखों से परिचित कराना है। पत्रिका के माध्यम से हम लेखकों, संगठनों, एवं समाज के प्रतिष्ठित और सामान्य लोगों को उनकी रचनात्मक योग्यताओं के आधार पर साझा करने का प्रयास करना है। पत्रिका टीम का मूल मंत्र है- रचनात्मकता, नैतिकता और उच्चतम गुणवत्ता। विशिखा हिंदी मासिक पत्रिका है जो 2019 में शुरू हुई थी। वर्तमान में यह राजस्थान और उत्तराखंड से प्रकाशित की जाती है। इसमें विभिन्न विषयों पर लेख शामिल होते हैं जैसे कि करंट अफेयर्स, साहित्य, महिलाएं, यात्रा और अधिक। हमारी पत्रिका उन लोगों के लिए है जो ज्ञान और सूचना की तलाश में होते हैं और उन्हें उन विषयों से रुबरु कराने का एक मंच प्रदान करती हैं।

Discover more from

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading