तेलंगाना के यद्रादि में बन रहा है, विशाल मंदिर

2 जून 2014 को आंध्र प्रदेश से अलग होकर तेलंगाना भारत का 29 वां राज्य बना है। जिसकी राजधानी हैदराबाद है। भारत में एक नए राज्य के रूप में उभर कर आये तेलंगाना के लिए युवाओं ने  कई बलिदान दिए थे, और उनका यह बलिदान व्यर्थ नहीं गया। तेलंगाना राज्य अपने वजूद में आते ही  देश का नंबर एक राज्य बनने के करीब हैं। तेलंगाना की राजकीय भाषा तेलगु और उर्दू है। इस राज्य की आबादी करीबन साढ़े तीन करोड़ है, इसमें 70 फीसदी लोग तेलगु 12 फीसदी उर्दू और 12 फीसदी लोग अन्य भाषायें बोलते हैं। यहाँ के सबसे बड़े शहर हैदराबाद, वारंगल, निज़ामाबाद और करीमनगर हैं। आज तेलंगाना लाखो पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता हैं। तेलंगाना शब्द का मतलब तेलगु भाषियों की भूमि हैं। यहाँ की प्रमुख नदियां कृष्णा और गोदावरी हैं, ये भारत का 12वां सबसे बड़ा राज्य हैं। तेलंगाना की अर्थ व्यवस्था में कृषि का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। तेलंगाना आज भारत का सबसे महत्वपूर्ण राज्य है। इसी के साथ तेलंगाना सरकार का एक बहुत बड़ा सपना पूरा होने जा रहा हैं। आंध्र प्रदेश में स्थित तिरुपति बालाजी जैसा एक मंदिर तेलंगाना के लोगों के लिए भी होना चाहिए। 2016 में  तेलंगाना के मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव ने ये प्रस्ताव दिया था। क्योंकि तेलंगाना के अलग राज्य बनने के बाद तिरुपति मंदिर तेलंगाना राज्य में नहीं आ रहा है। यह मंदिर तेलंगाना के यादगिरिगुट्टा में बन रहा है। 

यादगिरिगुट्टा हैदराबाद से करीबन 80 किलोमीटर दूर हैं। हिन्दुओं का मानना है, कि भगवान विष्णु ने यहाँ एक गुफा में लक्ष्मी-नरसिंह स्वामी के रूप में दर्शन दिये थे। तेलंगाना के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने इसके पूर्ण निर्माण की योजना बनाई और पांच नरशी क्षेत्र को विकसित करने के लिए 1200 करोड़ रुपये का बजट रखा। तेलंगाना स्थित इस मंदिर के मूर्तिकारों का कहना है कि यह मंदिर पूरी दुनिया का अनोखा हिन्दू मंदिर है, जिसे बनाने के लिये काले पत्थरों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस मंदिर की दीवारों और गुम्बदों में अंदर और बाहर से सुन्दर नक्काशी देखी जा सकती हैं। इस मंदिर में दक्षिण भारत की अलग-अलग आर्किटेक्चर शैली भी देखी जा सकती है। इस मंदिर को कुछ ऐसे बनाया गया है, कि इसे देखने वालों को लगेगा कि यह सैकड़ों साल पुराना मंदिर हैं।   

ऐसे मंदिर और भी हैं लेकिन वो इतने बड़े पैमाने पर नहीं बने हैं। इसका आर्किटेक्चरल स्टाइल काकतिया, पल्लवा चोला और विजयनगर शैली से अलग होगा। इस मंदिर में सभी शैलियों का मिश्रण तो होगा पर यह मंदिर अपनी एक अलग तरह की शैली का होगा। मुख्य मंदिर में परिसर की दो बड़ी दीवारें, शेर की मूर्तियां, हाती की मूर्तियां, पवित्र त्रिशूल, शंख और चक्र, पारंपरिक चिन्ह, मंदिर के अंदर और बाहर मंडप, परिक्रमा के लिए जगह, पैदल मार्ग पर मीनारें, चौड़े रास्ते जिनमें रथ घुमाया जा सके, ये सब वहां मौजूद हैं। जिधर से भी आप देखोगे, मंदिर अपने शानदार आर्किटेक्चर से बेहद खूबसूरत दिखता है। इस मंदिर के निर्माण में काला पत्थर जिसे कृष्ण शीला भी कहते हैं उसका इस्तेमाल हुआ है। मंदिर के लिए 600 मूर्तियों का प्रबंध किया गया। 5 साल की कड़ी मेहनत से बन रहे इस मंदिर में सैकड़ों कामगारों, इंजीनियरों, आर्किटेक्ट, पंडित और डिज़ाइनर इस मंदिर निर्माण में जुटे हुए हैं। प्राचीन काल में इस तरह के भव्य मंदिर के निर्माण में हजारों लोग लग जाते थे, लेकिन अब आधुनिक मशीनों के सहारे से इसे 5 साल में ही बना दिया गया। हालाँकि इस मंदिर में कहीं भी ब्रिक , सीमेंट और रेत का इस्तेमाल नहीं किया गया हैं। सीमेंट की जगह एक चिपकने वाले पारंपिक मिश्रण का इस्तेमाल किया गया हैं। यह मिश्रण गुड़, चूना, एलोवेरा, जुट आदि को मिलाकर बनाया गया है। इन सभी को मिलाकर एक महीने के लिए रख दिया जाता है। उसके बाद इसे सीमेंट की तरह पथरों को चिपकाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस मिश्रण से पत्थर मजबूती से चिपक जाते हैं। हमारे पूर्वज भी इसी का ही इस्तेमाल करते थे। तेलंगाना सरकार ने मंदिर के ढांचे में कई अहम बदलाव किये हैं। मंदिर परिसर में कई तरह की चीज़ें बनाई जा रही हैं, जैसे कि बाकी मंदिर, पवित्र कुंड, प्रसाद व अन्न के लिये हॉल, और त्योहारों के लिए मंडपों का निर्माण कराया जा रहा है, और इसके लिए कई कमेटियाँ भी बनाई गई हैं। इस कमेटी में वो लोग हैं जिन्हे मंदिर में उपयोग होने वाले पत्थरों की जानकारी हैं। जियोलॉजिस्ट इसकी मजबूती को देख रहे हैं। ये सब कुछ वैष्णो परंपरा के मुताबिक ही हो रहा है। इस मंदिर के लिए किसी तरह का दान नहीं लिया गया है। यह पूरी तरह सरकार द्वारा बनवाया जा रहा है। इस पूरे निर्माण में करीबन 1200 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। अभी तक इसमें 840 करोड़ रुपये ख़र्च हो चुके हैं। जिसमे से 248 करोड़ रुपए मुख्य मंदिर पर खर्च हुए हैं। हम इस मंदिर में अतीत की महिमा और आधुनिक ज्ञान की श्रेष्ठता दोनों को ही देख सकते हैं। यदाद्रि का यह मंदिर, पारंपरिक मंदिर के निर्माण, और वास्तु कला के इतिहास में अपना एक अनोखा स्थान बनाने जा रहा है। धार्मिक पर्यटन के लिहाज से भी इस मंदिर का अहम स्थान होगा। जब मंदिर पूरी तरह से तैयार होने के बाद, लोगों के लिए खोलने से पहले मंदिर में एक भव्य विशाल आयोजन होगा।

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