लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनावों से पहले, ओडिशा में बीजद और भाजपा के बीच राजनीतिक खींचतान शुरू हो गई है। राज्य में सत्तारूढ़ दल बीजू जनता दल भाजपा के ‘जय श्रीराम’ का मुकाबला करने के लिए ‘जय जगन्नाथ’ का उद्घोष कर रही है। अयोध्या में 22 जनवरी को होने वाले राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह से ठीक पहले ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पुरी में जगन्नाथ मंदिर के नवनिर्मित गलियारे का उद्घाटन किया।
बीजद के एक नेता ने कहा कि पटनायक के हाथों में 23 से अधिक साल से राज्य की बागडोर है और वह हर उस खतरे से वाकिफ हैं जो प्रतिद्वंद्वियों की ओर से पेश किया जा सकता है। उन्होंने कहा, ‘‘भाजपा राम मंदिर और प्राण प्रतिष्ठा समारोह के जरिए क्या करना चाहती है, नवीन बाबू इससे बेखबर नहीं हैं।’’ उन्होंने भाजपा के लिए कहा, ‘‘तुम करो ‘जय श्री राम’ तो हमारे पास हैं प्रभु जगन्नाथ, जय जगन्नाथ।’ दिलचस्प बात यह है कि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर जिस तरह का रवैया बाकी विपक्ष का है, वैसा ही यहां जगन्नाथ मंदिर परिक्रमा प्रकल्प के उद्घाटन पर भाजपा का है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनमोहन सामल ने आरोप लगाया है कि परिक्रमा प्रकल्प का उद्घाटन राज्य सरकार द्वारा इस तरह किया जा रहा है जैसे कि यह बीजद का कार्यक्रम हो। यही कारण है कि भाजपा ने इस कार्यक्रम से दूरी बनाए रखी।’ पिछले विधानसभा चुनाव में कुल 146 में से बीजद को 112 सीट, भाजपा को 23 और कांग्रेस को सिर्फ नौ सीट मिली थीं जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजद ने 21 में से 12, भाजपा ने आठ और कांग्रेस ने एक सीट पर कब्जा किया था। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, पुरी देश के चार पवित्र धामों में से एक है। यहां भगवान जगन्नाथ यानि श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं।
जगन्नाथ मंदिर के पुजारी मुन्ना पांडा ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि प्रभु राम तो सभी के रोम-रोम में बसे हैं लेकिन ओडिशा के लोगों के मन में प्रभु जगन्नाथ का विशेष स्थान है। उन्होंने कहा, ‘‘बस अंतर यह है कि पुरी में जगन्नाथ मंदिर का गलियारा बना है, अयोध्या में लंबी लड़ाई के बाद राम मंदिर बन रहा है।’’ हालांकि कांग्रेस नेता और ओडिशा मामलों के उसके केंद्रीय प्रभारी डॉक्टर अजोय कुमार इससे इत्तेफाक नहीं रखते, उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘हमारे लिए भगवान राम और प्रभु जगन्नाथ दोनों ही आस्था के केंद्र हैं। चुनावी फायदे के लिए भगवान को विषय वस्तु बनाने से बड़ा कोई अधर्म नहीं है। जिस दिन राजनीति ने धर्म की चादर अपने पापों को ढकने के लिए ओढ़ी, वह दिन कलयुग का ही प्रतीक होगा।’’



