06 सितंबर 1946 को विवादास्पद गुलाम सरवर हुसैन को मोहम्मद अली जिन्ना के आदेश पर “मुस्लिम लीग” ज्वाइन करवाया जाता है और वे 07 सितंबर को शाहपुर बाजार में एक जनसभा कर हिंदुओं का कत्लेआम का आहृवान करते हैं। सभा में दंगा शुरुआत करने की तारीख 12 सितंबर मुकर्रर की जाती है। सभा में गुलाम सरवर हुसैन अपने समर्थकों से खूलेआम कहते हैं कि हर मुसलमान हथियार उठाएगा और हिंदुओं को किसी भी हाल में बख्शा नही जाएगा।
गुलाम सरवर हुसैन की घोषणा को प्रशासन ने भी सुना मगर कारर्वाई तो दूर 10 अक्टूबर को जिला मजिस्ट्रेट एन.जी. रे जिनके कंधे पर पूरे जिले की सुरक्षा थी वे परिवार समेत ढाका चले जाते हैं और अपने परिवार की जान बचाते हैं। दरअसल 10 अक्टूबर को लक्ष्मी पूजा था और इस वजह से बंगालियों के घरों में उत्सव की तैयारी हो रही थी कि कुछ मनबढ मुसलमानों के लड़कों ने मारकर शुरू कर दी। उन दिनों नोआखाली जिले में 70% मुस्लिम आबादी थी और 30% हिंदू थे। मुस्लिमों के वर्चस्व वाले इलाकों में भी अधिकांश जमींदारी बंगाली हिंदुओं के पास थी। जमींदारों ने संभ्रांत मुस्लिमों को बुलाकर हिंसा रोकने की भी अपील की मगर मुसलमान तो जिन्ना के अलग राष्ट्र की थ्योरी मानने के लिए दृढसंकल्पित थे। वे नही माने या उन्होंने बंगाली जमींदारों की बात को अनसुना कर दिया। 12 अक्टूबर जिस दिन गुलाम सरवर हुसैन ने दंगे करने की घोषणा की थी, दंगा अपने शबाब पर पहुंच गया।
12 अक्टूबर को जिले के कई नामचीन हस्तियों का कत्ल कर दिया गया। जमींदारों को उनके घरों से निकालकर उनके परिवार के सामने मार डाला गया। हिंदुओं की लड़की और औरतों को जबरन धर्म परिवर्तित कर मुसलमान बना दिया गया। उनकी संपत्तियों को लूटा गया, घरों में आग लगा दी गई। बताते हैं कि हिंदू औरतों के साथ कई कई दिनों तक सामूहिक बलात्कार होते रहे। उन पर लगातार दवाब डाला जा रहा था कि वे इस्लाम स्वीकार कर लें तो वे बच जाएंगी, बहुत सी औरतों ने दवाब में आकर ये स्वीकार भी कर लिया था।
प्रशासन के नाम पर जिले में कोई भी न था, जब जिला मजिस्ट्रेट ही जिला छोड़कर भाग गया था तब और किससे उम्मीद की जा सकती थी। जिले के जितने भी मुस्लिम अधिकारी और पुलिस थे वे दंगाइयों के साथ मिल चुके थे। दरअसल उस समय ये माहौल बन गया था कि दंगे से ब्रिटिश हुकूमत भारत का विभाजन कर एक अलग राष्ट्र पाकिस्तान बना देगी।
पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग ने 1937 में ये तय कर लिया था कि वे मुसलमानों के लिए एक अलग देश की मांग करेंगे। मुस्लिम लीग का सोचना था कि हिंदुस्तान में मुसलमान महफूज नही रहेंगे। जिन्ना ने अंग्रेजों पर दवाब बनाने के लिए 1946 में “डायरेक्ट एक्शन” प्लान की घोषणा की और इसे अमलीजामा पहनाने के लिए बंगाल के मुख्यमंत्री शहीद सोहरावर्दी को ये महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई कि वे बंगाल में बडे पैमाने पर साम्प्रदायिक दंगे करवाएं। सोहरावर्दी ने इसके लिए मुस्लिम बहुल जिला नोआखाली को चुना। कहा जाता है कि जिन्ना की सहमति पर ही सोहरावर्दी ने गुलाम सरवर हुसैन को मुस्लिम लीग ज्वाइन करवाया था। दरअसल सरवर हुसैन हिंदुओं से बेहद नफरत करता था और कई बार दंगा कराने की कोशिशें भी कर चुका था।
बंगाल के मुख्यमंत्री सोहरावर्दी ने नोआखाली दंगा रोकने की कोई भी कोशिश नही की बल्कि वहाँ की खबरों को पंद्रह दिनों तक दबाये रखा। इस दंगे का सबसे दुखद पहलू ये था कि बहुत से युवा जिन्होंने इस दंगे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी वो पचास साल पहले हिंदू से ही मुसलमान बने थे। उन्होंने अपने भाई-बहन,ताऊ-चाचा को ही दंगे में मार डाला था। बाद में जब इसकी हकीकत सामने आई तो उन्होंने खेद भी प्रकट किया था। नोआखाली नरसंहार पर पूरा देश स्तब्ध था, इसकी खबर इंग्लैंड तक पहुंच गई थी। मुस्लिम लीग और जिन्ना अपने मकसद में कामयाब हो गए थे। कहते हैं कि नोआखाली दंगे ने ही विभाजन पर अंतिम मुहर लगा दी थी।
लगभग पचास हजार से एक लाख हिंदुओं को कोमिला, चांदपुर, अगरतला और अन्य स्थानों के राहत शिवरों में आश्रय दिया गया। बहुत से परिवार जो मुसलमानों के रहमोकरम पर गाँव में रह गए उन्हें गाँव से बाहर जाने के लिए मुस्लिम दबंगों से बकायदा आदेश लेना पड़ता था। जबरन धर्म परिवर्तित हुऐ हिंदुओं को लिखित घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करना पड़ा कि उन्होंने स्वंय अपनी मर्जी से इस्लाम कबूला है। हिंदुओं को मुस्लिम लीग को जजिया टैक्स भी देने के लिए मजबूर किया गया।
19 अक्टूबर 1946 को ब्रिटिश-भारतीय सेना को नोआखाली भेजा गया। हर तरफ चीख पुकार मची थी, सेना एक जगह जाती तो दूसरी ओर से खबर आ जाती कि फलां इलाके में हिंदुओं को परेशान किया जा रहा है। फौज के सहयोग से 22 अक्टूबर 1946 को गुलाम सरवर हुसैन को गिरफ्तार किया गया। उन्होंने कलकत्ता में एक संवाददाता सम्मेलन के सामने लूटपाट और जबरन धर्म परिवर्तन की बात तो कबूला था मगर सामूहिक दुष्कर्म, हत्या और जबरन निकाह की बात से वो मुकर गया।
07 नवंबर 1946 को महात्मा गांधी ने शांति और साम्प्रदायिक सद्भाव बहाल करने करने के लिए नोआखाली का दौरा किया। वे वहां चार महीने लगातार जमे रहे और हर रात मुसलमानों के घर गुजारते। गाँधीजी के इस प्रयास से हिंसा में तो कमी आई मगर आपसी विश्वास बहाल न हो सका। पीडित हिंदुओं ने गाँधीजी के अहिंसक विचारों को लगभग खारिज कर दिया था। गाँधीजी के विचारों से न तो पीडित हिंदू सहमत थे और न ही मुस्लिम। अधिकांश हिंदू विस्थापित होकर पश्चिम बंगाल के हिंदू इलाके, असम और त्रिपुरा चले गए।
नोआखाली की ही घटना देश विभाजन का मुख्य कारण बनी और देश के कांग्रेस नेतृत्व को विभाजन स्वीकार करना पडा था। जिन्ना अपने मकसद में कामयाब हो चुके थे।
अजय श्रीवास्तव
वरिष्ठ पत्रकार






